लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् वाला = नेता ।) नीशब्द एकाच् है अनेकाच् नहीं, अतः इस में यण् आदेश न हो सकेगा, अचि श्नु० (१६६) सूत्र से इयङ् हो जायेगा । इस की समग्र रूपमाला यथा— प्र० नी † नियौ नियः | प० नियः * नीभ्याम् नीभ्यः द्वि० नियम् ‡ ,, ,, ‡ | ष० ,, * नियोः नियाम् * तृ० निया नीभ्याम् नीभिः | स० नियाम् @ ,, नीषु च० निये * ,, नीभ्यः | स० हे नी ! √ हे नियौ ! हे नियः ! †ङ्यन्त न होने से सुँलोप नहीं होता । ‡अम् और शस् में क्रमशः अमि पूर्वं (१३५) तथा प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) सूत्र को परत्व के कारण अचि श्नु० (१६६) सूत्र बाध कर लेता है । इसी प्रकार एरनेकाच० (२००) द्वारा विहित यण् भी इन का बाधक समझ लेना चाहिये । *सब लिङ्गों में साधारण होने से 'नी' शब्द की नदीसञ्ज्ञा नहीं होती । अतः आट् आदि नदीकार्य नहीं होते । @डेराम्नद्याम्नीभ्यः (१६८) में 'नी' के विशेष उल्लेख के कारण ङि को आम् हो जाता है । √नदीत्व न होने के कारण अम्बार्थ० (१६५) द्वारा ह्रस्व न होगा । [लघु०] असंयोगपूर्वस्य किम् ? सुधियौ, यवक्रियौ ॥ व्याख्या—एरनेकाच० (२००) सूत्र में कहा गया था कि धातु के इवर्ण से पूर्वं संयोग नहीं होना चाहिये—यह क्यों कहा है ? इस का फल है 'सुधियौ' और 'यवक्रियौ' में यण् का न होना । इन स्थानों पर धातु के इवर्ण से पूर्वं संयोग है अतः यण् न हुआ, तब इयङ् हो कर रूप बना । [ध्यान रहे कि संयोग भी जब धातु का अवयव होगा, तभी यण् का निषेध होगा । 'सुधी' आदि शब्दों में संयोग धातु का अवयव है । 'उन्नी' शब्द में संयोग धातु का अवयव नहीं, उपसर्ग के तकार को मिला कर बना है अतः निषेध न होगा यण् हो जायेगा । 'उन्यौ, उन्यः' आदि रूप बनेंगे ।] सुष्ठु श्रयतीति सुश्रीः (अच्छी तरह आश्रय करने वाला) । सुपूर्वक श्रिञ् सेवायाम् (भ्वा० उ०) धातु से विब्वेञ्चिप्रादिभ्य० (वा० ४८) इस वार्तिक से क्विप् प्रत्यय और दीर्घ करने पर 'सुश्री' शब्द निष्पन्न होता है । तीनों लिङ्गों में साधारण होने के कारण इस की नदीसञ्ज्ञा न होगी । 'सुश्री' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० सुश्रीः * सुश्रियौ सुश्रियः | प० सुश्रियः † सुश्रीभ्याम् सुश्रीभ्यः द्वि० सुश्रियम् ,, ,, | ष० ,, † सुश्रियोः सुश्रियाम् † तृ० सुश्रिया सुश्रीभ्याम् सुश्रीभिः | स० सुश्रियि ‡ ,, सुश्रीषु च० सुश्रिये † ,, सुश्रीभ्यः | स० हे सुश्री ! हे सुश्रियौ ! हे सुश्रियः ! *अङ्यन्त होने से सुँलोप नहीं होता । †नदीसञ्ज्ञा न होने से आट् आदि नदीकार्य नहीं होते । ‡यहाँ न तो नदीसञ्ज्ञा है और न ही नीशब्द, अतः ङि को आम् न होगा ।