भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 270, कुल 633 में से

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पृष्ठ 270

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २५५ वक्तव्य—सु=शोभना श्रीर्यस्य स सुश्रीः। इस प्रकार विग्रह मानने पर भी 'सुश्री' शब्दों के रूपों में कोई अन्तर नहीं आता। प्रथमलिङ्गग्रहणञ्च (वा० १७) वार्त्तिक की सहायता से यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) द्वारा नदीसञ्ज्ञा प्राप्त होने पर इयङ्स्थानी होने के कारण नेयँडुवँङ्स्थानावस्त्री (२२६) सूत्र से निषेध हो जाता है। इसी प्रकार आगे 'शुद्धधी, सुधी' आदि शब्दों में भी समझ लेना चाहिये। यहां ङिति ह्रस्वश्च (२२२) से ङित् विभक्तियों में तथा वाऽऽमि (२३०) से आम् में वैकल्पिक नदीत्व की भी आशङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योंकि जिस स्त्रीलिङ्ग अङ्ग से ङित् वा आम् का विधान हो उस की उन सूत्रों से वैकल्पिक नदीसञ्ज्ञा की जाती है (देखो— शेखर में ङिति ह्रस्वश्च)। यहां ङित् और आम् का विधान तो सुश्री, सुधी आदि पुंल्लिङ्ग शब्दों से किया गया है और नदीसञ्ज्ञा उन के अवयव श्री, धी आदि शब्दों की करनी है। अतः नदीसञ्ज्ञा सर्वथा न होगी। लघुकौमुदी और मध्यकौमुदी के विवृत्तिकार श्री पण्डित विश्वनाथ जी शास्त्री तथा लघुकौमुदी के हिन्दी व्याख्याकार श्री पण्डित श्रीधरानन्द जी शास्त्री को 'सुश्री' शब्द पर महती भ्रान्ति हो गयी है। वे यहां नदीसञ्ज्ञा करना बतलाते हैं। यदि वैसा हो तो सुधी आदि शब्दों में भी नदीत्व प्रसक्त होगा, जो उन के मत में भी अनिष्ट है। यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) के महा- भाष्य पर श्रियै अतिश्रियै ब्राह्मण्यै, क्व मा भूत्—श्रिये अतिश्रिये ब्राह्मणाय ये वचन यहां विशेष मननीय हैं। इसी प्रकार 'यवक्री' (जौ खरीदने वाला) शब्द के रूप होते हैं। यह भी 'असंयोगपूर्वस्य' का प्रत्युदाहरण है। यवान् क्रीणातीति—यवक्रीः, यवकर्मोपपदात् डुक्रीञ् द्रव्यविनिमये (क्रया० उ०) इति धातोः क्विँप् च (८०२) इति क्विँप्प्रत्ययः। इस की समग्र रूपमाला यथा— प्र० यवक्रीः यवक्रियौ यवक्रियः | प० यवक्रियः यवक्रीभ्याम् यवक्रीभ्यः द्वि० यवक्रियम् " " | ष० " यवक्रियोः यवक्रियाम् तृ० यवक्रिया यवक्रीभ्याम् यवक्रीभिः | स० यवक्रियि " यवक्रीषु च० यवक्रिये " यवक्रीभ्यः | सं० हेयवक्रीः! हेयवक्रियौ! हेयवक्रियः! इस शब्द की सम्पूर्ण प्रक्रिया 'सुश्री' शब्द के समान होती है। सर्वत्र अजादि प्रत्ययों में इयङ् हो जाता है। नदीसञ्ज्ञा कहीं नहीं होती। [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(२०१) गतिश्च ।१।४।५६॥ प्रादयः क्रियायोगे गतिसञ्ज्ञाः स्युः ॥ अर्थः—क्रियायोग में प्रादि शब्द गतिसञ्ज्ञक होते हैं। व्याख्या—प्रादयः ।१।३। (प्रादयः से)। क्रियायोगे ।७।१। (उपसर्गाः क्रिया- योगे से)। गतिः ।१।१। च इत्यव्ययपदम्। अर्थः—(प्रादयः) प्र आदि बाईस शब्द (क्रियायोगे) क्रिया के योग में (गतिः) गतिसञ्ज्ञक (च) भी होते हैं। यह सूत्र एकसञ्ज्ञाधिकार (१६६) के अन्तर्गत पढ़ा गया है। इस अधिकार में उपसर्गाः क्रियायोगे (३५) सूत्र द्वारा क्रियायोग में प्रादियों की उपसर्गसञ्ज्ञा कह आये हैं।

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