लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 271, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ें२४६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् एक की दो सञ्ज्ञा न हो सकने से पुनः इन की गतिसञ्ज्ञा सिद्ध नहीं हो सकती अतः दोनों सञ्ज्ञाओं के समावेश के लिये मुनि ने सूत्र में 'च' शब्द का ग्रहण किया है। ध्यान रहे कि प्राग्रीश्वरान्निपाताः (१.४.५६) के अधिकार में पठित होने से इन दो सञ्ज्ञाओं के साथ निपातसञ्ज्ञा का भी समावेश होता है। निपातसञ्ज्ञा का फल स्वरादिनिपातमव्ययम् (३६७) द्वारा अव्ययसञ्ज्ञा करना है। प्रश्न—क्रियायोग में प्रादियों की गतिसञ्ज्ञा करना अनावश्यक है। क्योंकि क्रियायोग में इन की उपसर्ग सञ्ज्ञा है ही। जहां २ गति को कार्य कहा है वहां २ उपसर्ग का नाम कर देना चाहिये। इस से सर्वत्र कार्य चल सकता है। उत्तर—गतिसञ्ज्ञा केवल इन बाईस प्रादियों की ही नहीं, जिस से आप सर्वत्र काम चलाने की ठान रहे हैं। गतिसञ्ज्ञा तो बहुत से अन्य शब्दों की भी इस शास्त्र में की गई है। यथा-ऊर्यादिच्विडाचश्च (१.४.६०) [ऊर्यादि, च्व्यन्त तथा डाजन्त शब्द क्रियायोग में गतिसञ्ज्ञक हों।], अनुकरणञ्चानिति परम् (१.४.६१) [इति परे न हो तो क्रियायोग में अनुकरण की गतिसञ्ज्ञा हो] इत्यादि। तो अब यदि सर्वत्र 'गति' के स्थान पर 'उपसर्ग' रख कर काम चलाते हैं तो अन्य गतिसञ्ज्ञकों की क्या गति होगी? उन के लिये पुनः गतिग्रहण करना पड़ेगा। अतः प्रादियों की भी क्रियायोग में गतिसञ्ज्ञा कर सब को एक कोटि में रख समान भाव से कार्य करना उचित है। अब गतिसञ्ज्ञा करने का यहां फल दर्शाते हैं - [लघु०] वा०-(१८) गतिकारकेतरपूर्वपदस्य यण् नेष्यते ॥ शुद्धधियो ॥ अर्थः-जिस शब्द का पूर्वपद गतिसञ्ज्ञक या कारक से भिन्न हो उस के स्थान पर एरनेकाच ० (२००) द्वारा यण् नहीं होता। व्याख्या-कर्ता, कर्म, करण, सम्प्रदान, अपादान और अधिकरण ये छः कारक हैं। इन का विशेष विवेचन आगे 'कारकप्रकरण' में किया जायेगा। जिस शब्द में एरनेकाच ० (२००) सूत्र प्रवृत्त हो उस का पूर्वपद या तो गतिसञ्ज्ञक होना चाहिये अथवा कारक। यदि इन दोनों से भिन्न कोई अन्य होगा तो एरनेकाचः० द्वारा यण् न होगा। शुद्धा धीर्यस्य स शुद्धधीः (शुद्ध बुद्धि वाला), बहुव्रीहिसमास। यहां 'शुद्धा' शब्द पूर्वपद और 'धी' शब्द उत्तरपद है। पूर्वपद न तो गतिसञ्ज्ञक है और न ही कारक। यह तो 'धी' का विशेषण है। अतः सब शर्तें पूर्ण होने पर भी अजादि प्रत्यय में एरने- काच ० (२००) द्वारा यण् न होगा, अचि श्नु० (१६६) से इयङ् हो जायेगा। 'शुद्धधी' शब्द में समास से पूर्व 'धी' शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग था, अतः अब प्रथम- लिङ्गग्रहणञ्च (वा० १७) की सहायता से यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) द्वारा इस की नदीसञ्ज्ञा प्राप्त होती है। इस पर नेयैङ्वस्थान० (२२६) से निषेध हो जाता है। 'शुद्धधी' शब्द की सम्पूर्ण रूपमाला यथा—