भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 266

अजन्त-पुलूँल्लिङ्ग-प्रकरणम् २५१ प्रत्यय परे हो तो। तात्पर्य—अजादि प्रत्यय परे होने पर उस अनेकाच् अङ्ग को यण् आदेश होता है, जिस के अन्त में इवर्णान्त धातु है। परन्तु धातु के इवर्ण से पूर्व धातु का अवयव संयोग नहीं होना चाहिये । 'प्रधी+औ' यहां 'धी' इवर्णान्त धातु है। इस के इवर्ण से पूर्व धातु का कोई अवयव संयोगयुक्त नहीं। [यद्यपि 'प्र्' संयोग है, तथापि वह धातु का अवयव नहीं, उपसर्ग का है। किञ्च वह इवर्ण से पूर्व भी नहीं है, अकार और धकार का व्यवधान पड़ता है ।] यह धातु जिस के अन्त में है ऐसा अनेकाच् अङ्ग 'प्रधी' है। इस से परे 'औ' यह अजादि प्रत्यय वर्त्तमान है। अतः अलोऽन्त्यपरिभाषा द्वारा प्रकृतसूत्रे से ईकार को यण्=यकार आदेश हो कर—प्रध्य्+औ='प्रध्यौ' प्रयोग सिद्ध होता है। प्रधी+अस् (जस्) । यहां सर्वप्रथम इको यणचि (१५) से प्राप्त यण् का प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) से वाध हो जाता है। अब दीर्घाज्जसि च (१६२) से इस का भी निषेध हो कर पुनः पूर्ववत् यण् की प्राप्ति होने लगती है। इस पर अचि श्नु० (१६६) से इस का वाध हो कर इयङ् की प्रसक्ति होती है। पर अन्त में एरने- काचः० (२००) से इसे भी बाधित कर यण् हो जाता है—प्रध्य्+अस् । अब सकार को रुँत्व तथा रेफ को विसर्ग आदेश करने पर 'प्रध्यः' प्रयोग सिद्ध होता है। 'प्रधी+अम्' यहां भी सर्वप्रथम इको यणचि (१५) से यण्, उस का वाध कर अमि पूर्वः(१३५) से पूर्वरूप प्राप्त था। उस का परत्व के कारण अचि श्नुधातु० (१६६) सूत्र वाध कर लेता है। तब उस के भी अपवाद एरनेकाचः० (२००) से यण् हो कर 'प्रध्यम्' प्रयोग सिद्ध होता है। 'प्रधी+अस्' (शस्) यहां पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है। इस का परत्व के कारण अचि श्नुधातु० (१६६) सूत्र वाध कर लेता है। पुनः एरनेकाचः० (२००) से यण् करने पर सकार को रुँत्व विसर्ग हो 'प्रध्यः' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि यहां पूर्वसवर्णदीर्घ न होने से तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७) द्वारा सकार को नकार भी नहीं होता। 'प्रधी+आ' (टा) यहां इयँङ् प्राप्त होने पर एरनेकाचः० (२००) से यण् हो कर 'प्रध्या' प्रयोग सिद्ध होता है। तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी के द्विवचन में—'प्रधीभ्याम्' । तृतीया के बहुवचन में—'प्रधीभिः'। 'प्रधी+ए' (ङे) यहां भी पूर्ववत् इयँङ् का वाध कर यण् करने से—'प्रध्ये'। चतुर्थी और पञ्चमी के बहुवचन में—'प्रधीभ्यः'। 'प्रधी+अस्' (ङसिँ वा ङस्) यहां भी इयँङ् का वाध कर एरनेकाचः० (२००) से यण् हो जाता है—'प्रध्यः'। इसी प्रकार ओस् में—'प्रध्योः'। 'प्रधी+आम्' यहां नदीसञ्ज्ञा न होने से नुट् प्राप्त नहीं होता। तब एरने- काचः० (२००) से यण् हो कर 'प्रध्याम्' रूप सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि एरने-