लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
धातु रूप तथा भ्रू शब्द (अङ्गानाम्) इन अङ्गा के स्थान पर (इयङ्हुवेंडौ) इयङ् और उवँङ् आदेश होते हैं। ङिच्च (४६) सूत्र द्वारा ये आदेश अङ्ग के अन्त्य इकार उकार के स्थान पर होते हैं। स्थानेऽन्तरतम (१७) से इवर्ण को इयङ् तथा उवर्ण को उवँङ् आदेश होगा। इन आदेशों में ङ् की इत्संज्ञा हो जाती है इय्, उव् शेष रहते हैं। 'प्रधी+औ' यहाँ औ' यह अजादि प्रत्यय परे है, प्रधी में 'धी' इवर्णान्त धातु है। [यद्यपि धातु 'ध्यै' था तो भी एकदेशविकृतमनन्यवत् के अनुसार इसे भी धातु मान लिया जाता है। इसी प्रकार यद्यपि कृत्प्रत्ययान्त हो जाने से यह प्राति- पदिक हो गया है, तथापि णिब्वन्ता धातुत्वं न जहति इस से इस का धातुत्व भी अक्षत रह जाता है।] तो प्रकृतसूत्र से इस के ईकार के स्थान पर इयङ् आदेश प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र निषेध कर यण् विधान करता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२००) एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य ।६।४।८२॥ धात्ववयवसंयोगपूर्वो न भवति य इवर्णः, तदन्तो यो धातुः, तदन्त- स्यानेकाचोऽङ्गस्य यण् स्याद् अजादौ प्रत्यये परे । प्रध्यौ । प्रध्यम् । प्रध्यः । प्रध्यि । शेषं पपीवत् ॥ अर्थ —धातु का अवयव जो संयोग वह पूर्व में नहीं है जिस इवर्ण के, वह इवर्ण है अन्त में जिस धातु के, वह धातु है अन्त में जिस के, ऐसा जो अनेक अचो वाला अङ्ग, उस के स्थान पर यण् हो अजादि प्रत्यय परे होने पर। व्याख्या—एः ।६।१। अनेकाचः ।६।१। असंयोगपूर्वस्य ।६।१। यण् ।१।१। (इणो यण् से) । धातोः ।६।१। (अचि श्नुधातुभ्रुवाम्० से। श्नु और भ्रू का— उवर्णान्त होने से 'एः' के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता अतः उन का अनुवर्त्तन नहीं किया जाता) । अचि ।७।१। (अचि श्नुधातु० से) । 'एः' यह षष्ठी का एकवचन है। इस का अर्थ है—'इवर्णस्य'। 'धातोः' पद आवर्तित [दो बार पढ़ा हुआ] किया जाता है। एक 'धातोः' पद 'एः' का विशेष्य बन जाता है जिस से 'एः' से तदन्तविधि होकर 'इवर्णान्तस्य धातोः' ऐसा हो जाता है। दूसरा 'धातोः' पद 'असंयोगपूर्वस्य' पद के 'संयोग' अंश के साथ अन्वित होता है। अङ्गस्य यह अधिकृत है। इस का 'एर्धातोः' (इवर्णान्तस्य धातोः) यह विशेषण है। अतः विशेषण से तदन्तविधि हो कर—'इवर्णा- न्तधात्वन्तस्य अङ्गस्य' ऐसा अर्थ होता है। 'अनेकाचः' पद 'अङ्गस्य' का विशेषण है। अनेके अचो यस्य यस्मिन् वा सोऽनेकाच्, तस्य = अनेकाचः, बहुव्रीहिसमास। 'असंयोग- पूर्वस्य' का 'एः' के साथ सामानाधिकरण्य है। नास्ति संयोगः पूर्वो यस्य सोऽसंयोगपूर्वः, नञ्बहुव्रीहिसमास। इस प्रकार यह अर्थ हुआ—(धातोः, असंयोगपूर्वस्य) धातु का अवयव संयोग जिस के पूर्व में नहीं ऐसा (एः) जो इवर्ण, वह है अन्त में जिस में ऐसी (धातोः) जो धातु, वह है अन्त में जिस के ऐसा (अनेकाचः) जो अनेक अचो वाला (अङ्गस्य) अङ्ग, उस के स्थान पर (यण्) यण् आदेश होता है (अचि) अजादि