लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २४५ व्याख्या—यू ।१।२। स्त्र्याख्यौ ।१।२। नदी ।१।१। समासः—ईश्च ऊश्च = यू ['यू+औ' इत्यत्र पूर्वसवर्णदीर्घः, दीर्घाज्जसि च इति निषेधाभावश्छान्दसः], इतरेतर- द्वन्द्वः । स्त्रियम् आचक्षाते इति स्त्र्याख्यौ [स्त्रीकर्मोपपदाद् आङ्पूर्वात् चक्षिङ्धातोः कर्तरि मूलविभुजादित्वात् कप्रत्यये, ख्यावादेशे, आकारलोपे, उपपदसमासे च कृते 'स्त्र्या- ख्य'शब्दो निष्पद्यते ] । यहां शब्दशास्त्र के प्रस्तुत होने से 'यू' का विशेष्य 'शब्दौ' अध्याहृत किया जाता है अतः विशेषण से तदन्तविधि हो जायेगी । 'स्त्र्याख्यौ' का अर्थ 'स्त्रियाम्' कहने से भी सिद्ध हो सकता है अतः यहां इस के फलस्वरूप 'नित्य' शब्द का अध्याहार किया जाता है । अर्थः— (स्त्र्याख्यौ) नित्यस्त्रीलिङ्गी (यू) ईदान्त और ऊदन्त शब्द (नदी) नदीसञ्ज्ञक होते हैं । जिन शब्दों का केवल स्त्रीलिङ्ग में ही प्रयोग होता है वे शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग कहाते हैं । 'ग्रामणी, खलपू' आदि शब्द पुंल्लिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग दोनों में देखे जाते हैं अतः ये नित्यस्त्रीलिङ्ग नहीं, इन की नदीसञ्ज्ञा न होगी । नदी, गौरी, वधू आदि शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग हैं वे यहां उदाहरण समझने चाहियें । [वस्तुतः नित्यस्त्रीलिङ्ग शब्दों के विषय में विस्तारपूर्वक विचार सिद्धान्तकौमुदी के अजन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण में देखें ] । श्रेयसी शब्द ङ्यन्त होने से नित्यस्त्रीलिङ्ग है, अतः इस की तो इस सूत्र से नदीसञ्ज्ञा निर्बाध होगी ही; परन्तु बहुश्रेयसी में श्रेयसीशब्द गौण हो जाता है, इस की इस सूत्र से नदीसञ्ज्ञा नहीं हो सकती—इस पर अग्रिम वार्तिक प्रवृत्त होता है— [लघु०] वा०—(१७) प्रथमलिङ्गग्रहणञ्च ॥ पूर्वं स्त्र्याख्यस्योपसर्जनत्वेऽपि नदीत्वं वक्तव्यमित्यर्थः ॥ अर्थः—यहां नदीसञ्ज्ञा में प्रथमलिङ्ग का भी ग्रहण होता है अर्थात् जो शब्द पहले नित्यस्त्रीलिङ्ग हैं और बाद में समासवशात् गौण हो जाने से अन्य लिङ्ग में चले गये हैं उन की भी पहले के लिङ्ग के द्वारा नदीसञ्ज्ञा कर लेनी चाहिये । व्याख्या—इस वार्तिक से 'बहुश्रेयसी' में स्थित 'श्रेयसी' शब्द की नदीसञ्ज्ञा हो जाती है । अब इस का फल अग्रिमसूत्र में दर्शाते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६५) अम्बार्थनद्योर्ह्रस्वः ।७।३।१०७॥ सम्बुद्धौ । हे बहुश्रेयसि ! ॥ अर्थः—अम्बार्थ तथा नद्यन्त अङ्गों को सम्बुद्धि परे रहते ह्रस्व हो जाता है । व्याख्या—अम्बार्थनद्योः ।६।२। अङ्गयोः ।६।२। (अङ्गस्य यह अधिकृत है) । ह्रस्वः ।१।१। सम्बुद्धौ ।७।१। (सम्बुद्धौ च से) । अम्बा अर्थो यस्य सः=अम्बार्थः, बहुव्रीहिसमासः । अम्बार्थश्च नदी च=अम्बार्थनद्यौ, तयोः=अम्बार्थनद्योः, इतरेतर- १. इस सूत्र से वर्णों की भी नदीसञ्ज्ञा हो जाती है; अन्यथा 'तुदन्ती' आदि उदा- हरणों में आच्छीनद्योर्नुम् (३६५) से नुम् न हो सकेगा [इसी सूत्र पर तत्त्वबोधिनी यहां द्रष्टव्य है] ।