लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् चतुर्थी के एकवचन में—'पप्ये'। इको यणचि (१५) से यण् हो जाता है। पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन 'पपी + अस्' में यण् हो—'पप्यः'। 'पपी + ओस्' इस अवस्था में यण् हो कर 'पप्योः' बनता है। 'पपी + आम्' इस स्थिति में दीर्घ होने से नुट् का आगम नहीं होता। पुंल्- लिङ्ग होने से नदीसञ्ज्ञा भी नहीं होती। तब यण् (१५) हो कर 'पप्याम्' प्रयोग सिद्ध होता है। 'पपी + ङि' (ङि) यहां अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ हो कर 'पपी' बनता है। 'पपी + सु' (सुप्) यहां सकार को षकार (१५०) हो कर 'पपीषु' बनता है। 'पपी' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० पपी पप्यौ पप्यः | प० पप्यः पपीभ्याम् पपीभ्यः द्वि० पपीम् ,, पपीन् | ष० ,, पप्योः पप्याम् तृ० पप्या पपीभ्याम् पपीभिः | स० पपी , पपीषु च० पप्ये ,, पपीभ्यः | सं० हेपपी ! हे पप्यौ ! हे पप्यः ! इसी प्रकार—ययी (मार्ग), वातप्रमी (मृग-विशेष) आदि के रूप होते हैं। [लघु०] बह्व्यः श्रेयस्यो यस्य स बहुश्रेयसी ॥ व्याख्या—'बहु' शब्द से स्त्रीलिङ्ग में बह्वादिभ्यश्च (१२५६) द्वारा ङीष् प्रत्यय करने पर 'बह्वी' शब्द निष्पन्न होता है। इसी प्रकार 'प्रशस्य' शब्द से द्विवचन- विभाज्योपपदे० (१२१८) सूत्र द्वारा 'ईयसुन्' प्रत्यय करने तथा प्रशस्यस्य श्रः (१२१६) से 'श्र' आदेश और उगितश्च (१२४६) से ङीप् प्रत्यय करने पर 'श्रेयसी' शब्द बनता है। अतिशयेन प्रशस्या = श्रेयसी। बह्व्यः श्रेयस्यो यस्य स = बहुश्रेयसी। अतिप्रशस- नीय बहुत स्त्रियों वाला पुरुष 'बहुश्रेयसी' कहाता है। यहां 'बह्वी' और 'श्रेयसी' पदों का बहुव्रीहिसमास हो गया है। स्त्रियाः पुंवत्० (६६८) सूत्र से समास में बह्वी पद को पुंवत् अर्थात् 'बहु' शब्द हो जाता है। ईयसो बहुव्रीहेर्नेति वाच्यम् (वा०) इस निषेध के कारण उपसर्जनह्रस्व नहीं होता। समासान्त 'कप्' प्रत्यय प्राप्त था, परन्तु ईयसश्च (५।४।१५६) सूत्र से निषिद्ध हो गया। समास होने के कारण प्रातिपदिक सञ्ज्ञा हो कर सुं आदि प्रत्यय आते हैं— 'बहुश्रेयसी + स्' (सुं)। यहां 'श्रेयसी' शब्द ङ्यन्त है, अतः ङी से परे सुं का हल्ङ्याब्भ्यो दीर्घात्० (१७६) सूत्र से लोप हो कर 'बहुश्रेयसी' बनता है। प्रथमा के द्विवचन में 'बहुश्रेयस्यौ' तथा बहुवचन में 'बहुश्रेयस्यः' बनता है। दोनों स्थानों पर पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध (१६२) हो कर यण् हो जाता है। सम्बुद्धि में 'हे बहुश्रेयसी + स्' इस स्थिति में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम् (१६४) यू स्त्र्याख्यौ नदी ।१।४।३॥ ईदूदन्तौ नित्यस्त्रीलिङ्गौ नदीसञ्ज्ञौ स्तः ॥ अर्थ—ईदन्त और ऊदन्त नित्यस्त्रीलिङ्ग शब्द नदीसञ्ज्ञक होते हैं।