भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 258, कुल 633 में से

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पृष्ठ 258

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २४३ (६) इस व्याकरण में एक की एक सञ्ज्ञा होती है या अनेक ? सप्रमाण लिखें। (७) ह्यत्स्यात् परस्य सूत्र में 'परस्य' ग्रहण का क्या प्रयोजन है ? (८) 'अपत्य' आदि शब्दों से परे ङसिं या ङस् के अकार को ह्यत्स्यात्परस्य द्वारा उकार आदेश होगा या नहीं ? स्पष्ट करें। (६) संयोगान्तस्य लोपे हि—इस श्लोक की व्याख्या करें। (१०) हरौ, त्रयाणाम्, सख्युः, पत्ये, हरिणा, कति, सखा, हरेः, भूपतये, द्वौ, सखायौ, हे सखे, प्रियययः—इन रूपों की सूत्रनिर्देशपूर्वक साधनप्रक्रिया लिखें। (११) नलोपः प्रातिपदिकान्तस्य, शेषो घ्यसखि इन सूत्रों की व्याख्या करें। [यहां ह्रस्व इकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है] —:०:— अब ईकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का वर्णन किया जाता है— [लघु०] पाति लोकमिति पपीः=सूर्यः। दीर्घाज्जसि च (१६२)—पप्यौ २। पप्यः। हे पपीः। पपीम्। पपीन्। पप्या। पपीभ्याम् ३। पपीभिः। पप्ये। पपीभ्यः २। पप्यः २। पप्योः। दीर्घात्वान्न नुट्—पप्याम्। ङौ तु सवर्ण-दीर्घः —पपी। पप्योः। पपीषु। एवं वातप्रम्यादयः॥ व्याख्या—पा रक्षणे (अदा०) धातु से औणादिक 'ई' प्रत्यय कर द्वित्व और आकार का लोप करने से 'पपी' शब्द सिद्ध होता है[देखें—पापोः किद् द्वे च (उणा० ४३६)]। जगत् का रक्षक होने से सूर्य 'पपी' कहाता है। प्रातिपदिक सञ्ज्ञा हो कर इस से सुँ आदि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं— पपी+स् (सुँ) इस स्थिति में सकार को रेफ और रेफ को विसर्ग करने पर 'पपीः' रूप बनता है। ध्यान रहे कि यहां 'ङी' के न होने से हल्ङ्याब्भ्यो दीर्घात्० (१७६) सूत्र द्वारा सुँ का लोप नहीं होता। 'पपी+औ' यहां प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) सूत्र से प्राप्त पूर्वसवर्णदीर्घ का दीर्घाज्जसि च (१६२) सूत्र से निषेध हो कर इको यणचि (१५) से ईकार को यण्=यकार करने से 'पप्यौ' प्रयोग सिद्ध होता है। 'पपी+अस्' (जस्) यहां पूर्व- सवर्णदीर्घ का निषेध हो ईकार को यण्=यकार करने से 'पप्यः' रूप बनता है। 'पपी+अम्' यहां पूर्वसवर्णदीर्घ का बाध कर अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप एकादेश करने पर 'पपीम्' प्रयोग सिद्ध होता है। 'पपी+अस्' (शस्) यहां पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७) से सकार को नकार करने से 'पपीन्' रूप बनता है। 'पपी+आ' (टा) यहां इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'पप्या' रूप बनता है। तृतीया, चतुर्थी और पञ्चमी के द्विवचन में 'पपीभ्याम्' बनता है। तृतीया के बहुवचन में 'पपीभिः'। सकार को रुँत्व विसर्ग हो जाते हैं।

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