भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 255, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 255

२४० भैमोव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् पं० ० ० कतिभ्यः | स० ० ० कतिषु ष० ० ० कतीनाम् | सं० ० ० हे कति ! [लघु०] युष्मदस्मत्षट्सञ्ज्ञकास्त्रिषु सरूपा ॥ अर्थ — युष्मद् अस्मद् और षट्सञ्ज्ञक शब्द तीनों लिङ्गो में समान रूप वाले होते हैं। व्याख्या—समानानि रूपाणि येषां ते सरूपाः, बहुव्रीहिसमासः । ज्योतिर्जनपद० (६ ३ ८४) इति समानस्य सभावे । 'कति' शब्द षट्सञ्ज्ञक है, अतः तीनों लिङ्गों में एक समान रूप बनेंगे। यथा—कति पुरुषाः ? कति नार्यः ? कति फलानि ? । इसी प्रकार युष्मद् और अस्मद् के भी—'अहम्पुरुषः, अहं नारी, अहं मित्रम्, त्वं पुरुषः त्वं नारी, त्वं मित्रम्' इत्यादि समान रूप बनते हैं। [लघु०] त्रिशब्दो नित्यं बहुवचनान्तः । त्रयः । त्रीन् । त्रिभिः । त्रिभ्यः २ ॥ अर्थ—'त्रि' शब्द नित्य बहुवचनान्त है। व्याख्या—'त्रि' शब्द का अर्थ 'तीन' है। तीन—बहुसङ्ख्या का वाचक है अतः एकत्व और द्वित्व का प्रकृति के अर्थ—बहुत्व के साथ अन्वय न हो सकने के कारण एकवचन द्विवचन नहीं आते। ध्यान रहे कि प्रधान होने पर ही 'त्रि' शब्द नित्य बहुवचनान्त होता है, गौण अवस्था में तो इस में एकवचन और द्विवचन भी हुआ करते हैं जैसा कि आगे 'प्रियत्रि' शब्द में किया गया है। 'त्रि+अस्' (जस्) इस अवस्था में जसि च (१६८) सूत्र से गुण हो एचोऽय- वायाव (२२) से अय् आदेश करने पर—त्रयस्— 'त्रयः' रूप बनता है। 'त्रि+अम्' (शस्) इस स्थिति में पूर्वसवर्णदीर्घ हो शकार को नकार करने पर 'त्रीन्' प्रयोग सिद्ध होता है। त्रि+भिस् = त्रिभिः । त्रि+भ्यस् = त्रिभ्यः । सकार को रुत्व विसर्ग हो जाते हैं। 'त्रि+आम्' इस दशा में अग्रिम-सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(१६२) त्रेस्त्रयः ।७।१।५३॥ त्रि-शब्दस्य त्रयादेशः स्यादामि। त्रयाणाम् । त्रिषु । गौणत्वेऽपि - प्रियत्रयाणाम् ॥ अर्थ—आम् पर हो तो 'त्रि' शब्द के स्थान पर 'त्रय' आदेश हो। व्याख्या—त्रेः ।६।१। त्रयः ।१।१। आमि ।७।१। (आमि सर्वनाम्नः सुट् से)। अर्थ —(आमि) आम् परे होने पर (त्रेः) त्रिशब्द के स्थान पर (त्रयः) त्रय आदेश हो। अनेकाल् होने से यह आदेश अनेकाल्शित्सर्वस्य (४५) द्वारा सर्वादेश होगा। सूत्र में त्रिशब्द सङ्ख्यावाचक नहीं शब्दवाचक है अतः हरिवत् उच्चारण होने से 'त्रेः' यहाँ एकवचन हो गया है। 'त्रि+आम्' यहाँ आम् परे है अतः त्रिशब्द को प्रकृतसूत्र से त्रय आदेश हो