भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 254

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २३६ अर्थः—लु वाले (लुक्, श्लु, लुप्) शब्दों से यदि प्रत्यय का लोप हुआ हो तो तन्निमित्तक (उस प्रत्यय को निमित्त मान कर होने वाला) अङ्ग-कार्य नहीं होता। व्याख्या—लुमता ।१।१। प्रत्ययलोपे ।७।१। (प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् से)। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। प्रत्ययलक्षणम् ।१।१। न इत्यव्ययपदम्। समासः— लु इत्येकदेशोऽस्त्यस्य स लुमान्, तेन लुमता। तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुँप् (११८४) इति मतुँप्प्रत्ययः। प्रत्ययस्य लोपः=प्रत्ययलोपः, तस्मिन् = प्रत्ययलोपे, षष्ठीतत्पुरुषः। अर्थः—(लुमता) लु वाले शब्द से (प्रत्ययलोपे) प्रत्यय का लोप होने पर (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (प्रत्ययलक्षणम्) उस प्रत्यय को मान कर होने वाला कार्य (न) नहीं होता। ‘लु’ वाले शब्द तीन हैं—१. लुक्, २. श्लु, ३. लुप्। यह सूत्र पूर्वकथित प्रत्ययलक्षण सूत्र का अपवाद है। ‘कति’ में जस् प्रत्यय का लु वाले शब्द = लुक् से अदर्शन हुआ है तो यहां प्रत्ययलक्षण कार्य (गुण) न होगा। ध्यान रहे कि यह निषेध तभी होगा जब अङ्ग के स्थान पर प्रत्ययलक्षण कार्य करना होगा। यदि अङ्ग के स्थान पर कार्य न होगा तो ‘लु’ वाले शब्दों से अदर्शन होने पर भी प्रत्ययलक्षण हो जायेगा। यथा—‘पञ्चन्, सप्तन्’ यहां षड्भ्यो लुक् (१८४) से जस् और शस् का लुक् होने पर भी सुप्तिङन्तं पदम् (१४) सूत्र से पद- सञ्ज्ञा हो जाती है। पदसञ्ज्ञा हो जाने से न लोपः प्रातिपदिकान्तस्य (१८०) द्वारा नकार का लोप हो जाता है। पदसञ्ज्ञा केवल अङ्ग की ही नहीं होती किन्तु प्रत्यय- विशिष्ट अङ्ग की हुआ करती है; इस से प्रत्ययलक्षण में कोई बाधा उपस्थित नहीं होती। इसी प्रकार यङ्लुगन्त प्रक्रिया में यङ्लुक् होने पर भी यङन्तमूलक द्वित्व हो ही जाता है। यह विषय विस्तारपूर्वक रोऽसुंपि (११०) सूत्र पर लिख आए हैं वहीं देखें। द्वितीया के बहुवचन शस् में भी जस् की तरह ‘कति’ प्रयोग बनता है। प्रत्यय- लक्षण द्वारा गुणप्राप्ति तथा उस का निषेध यहां नहीं होता। कति + भिस् = कतिभिः। कति + भ्यस् = कतिभ्यः। यहां सकार को रुँ और रेफ को विसर्ग आदेश हो जाते हैं। ‘कति + आम्’ यहां ह्रस्वनद्यापो नुट् (१८४) सूत्र से ह्रस्वान्त अङ्ग को नुट् आगम, अनुबन्धलोप तथा नामि (१४६) से दीर्घ होकर—‘कतीनाम्’ प्रयोग सिद्ध होता है। [अथवा षट्त्व के कारण षट्चतुर्भ्यश्च (२६६) सूत्र से नुट् का आगम कर दीर्घ कर लेना चाहिये। इस की स्पष्टता ‘रामाणाम्’ प्रयोग पर सिद्धान्तकौमुदी की टीकाओं में देखनी चाहिये।] सप्तमी के बहुवचन में आदेश-प्रत्यययोः (१५०) से मूर्धन्य षकार होकर ‘कतिषु’ रूप बनता है। विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन | विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्र० ० ० कति | तृ० ० ० कतिभिः द्वि० ० ० ,, | च० ० ० कतिभ्यः