लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् [लघु०] परिभाषा सूत्रम्—(१६०) प्रत्यय-लोपे प्रत्यय-लक्षणम्। १।१।६१॥ प्रत्यये लुप्ते तदाश्रितं कार्यं स्यात् । इति जसि च (१६८) इति गुणे प्राप्ते— अर्थ—प्रत्यय के लुप्त हो जाने पर भी तदाश्रित कार्य हो जाते हैं। इस सूत्र से जसि च (१६८) द्वारा 'कति' में गुण प्राप्त होता है। इस पर [अग्रिमसूत्र निषेध कर देता है]। व्याख्या—प्रत्यय लोपे ।७।१। प्रत्यय-लक्षणम् ।१।१। समास—प्रत्ययस्य लोप = प्रत्ययलोप, तस्मिन् = प्रत्ययलोपे। षष्ठीतत्पुरुषसमास । प्रत्ययो लक्षणं (निमित्तम्) यस्य तत् प्रत्ययलक्षणम् कार्यम् इत्यर्थः । बहुव्रीहिसमास । अर्थ — (प्रत्ययलोपे) प्रत्यय का लोप हो जाने पर भी (प्रत्ययलक्षणम्) प्रत्यय को मान कर होने वाला कार्य हो जाता है। कई कार्य प्रत्यय को मान कर हुआ करते हैं। यथा—जसि च (१६८) यह ‘जस्’ प्रत्यय को मान कर ह्रस्वान्त अङ्ग के स्थान पर गुण करता है। सुपि च (१४१) यह यत्रादि सुप् प्रत्यय को मान कर अदन्त अङ्ग को दीर्घ करता है। सुप्तिङन्तं पदम् (१४) यह सुप् तथा तिङ् प्रत्यय को मान कर ही पद सञ्ज्ञा करता है। इस प्रकार के कार्य उस प्रत्यय के लुप्त हो जाने पर भी हो जाते हैं—यह इस सूत्र का तात्पर्य है। यथा—'राम' यहां जिस प्रकार सुप् प्रत्यय के रहते पदसञ्ज्ञा हो जाती है वैसे 'लिट्, विद्वान्, भगवान्' आदियों में सुप् प्रत्यय के लुप्त हो जाने पर भी पदसञ्ज्ञा सिद्ध हो जाती है। 'कति' यहां जस् प्रत्यय का लोप हो चुका है, अब इस सूत्र से उस के न रहने पर भी उस को मान कर जसि च (१६८) द्वारा गुण प्राप्त होता है। इस पर अग्रिम- सूत्र निषेध करता है : प्रश्न—इस सूत्र द्वारा प्रत्यय के लोप में ही प्रत्ययलक्षण होता है, परन्तु 'कति' में प्रत्यय का लुक् हुआ है, लोप नहीं, तो यहां कैसे प्रत्ययलक्षण (गुण) प्राप्त हो सकता है ? उत्तर—जैसे लोक में एक व्यक्ति की अनेक सञ्ज्ञाएं देखी जाती हैं वैसा इस शास्त्र में भी होता है। तव्यत्, तव्य, अनीयर् आदि प्रत्ययों की कृत् और कृत्य दोनों सञ्ज्ञाएं हैं। जहां शास्त्र में एक सञ्ज्ञा करना अभीष्ट होता है वहां स्पष्ट कह दिया जाता है यथा—आकडारादेका सञ्ज्ञा (१४१)। यहां प्रत्यय के अदर्शन की अदर्शनं लोपः (२) से लोप-सञ्ज्ञा की गई है। उसी अदर्शन की पुनः प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः (१८६) सूत्र से लुक्, श्लु और लुप्-सञ्ज्ञाएं की जाती हैं। तो इस प्रकार लुक्, श्लु और लुप् तीनों सञ्ज्ञाओं के साथ 'लोप' सञ्ज्ञा भी वर्तमान रहती है। इस से 'कति' में प्रत्यय-लक्षण प्राप्त होता है। [लघु०] निषेध सूत्रम्—(१६१) न लुमताऽङ्गस्य ।१।१।६२॥ लुमता शब्देन लुप्ते तन्निमित्तमङ्गकार्यं न स्यात् । कति २। कतिभिः । कतिभ्यः २ । कतीनाम् । कतिषु ॥