भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २३७ अधिकार से बहिर्भूत होने के कारण यहां एक की दो सञ्ज्ञाएं हुईं । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है । [लघु०] विधि-सूत्रम् - (१८८) षड्भ्यो लुक् ।७।१।२२॥ जश्शसोः ॥ अर्थः-षट्सञ्ज्ञकों से परे जस् और शस् का लुक् हो जाता है । व्याख्या - षड्भ्यः ।५।३। जश्शसोः ।६।२। (जश्शसोः शिः से) । लुक् ।१।१। अर्थः - (षड्भ्यः) षट्सञ्ज्ञकों से परे (जश्शसोः) जस् और शस् का (लुक्) लुक् हो जाता है । 'कति + अस्' यहां 'कति' शब्द की षट्सञ्ज्ञा है । इस से परे जस् विद्यमान है, अतः जस् का लुक् होगा । अब यहां यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि लुक् किसे कहते हैं ? इस का समाधान अग्रिमसूत्र से करते हैं- [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम् - (१८६) प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः ।१।१।६०॥ लुक्-श्लु-लुपूशब्दैः कृतं प्रत्ययादर्शनं क्रमात् तत्तत्सञ्ज्ञं स्यात् ॥ अर्थः-लुक्, श्लु और लुपू शब्दों से जो प्रत्यय का अदर्शन किया जाता है, वह (अदर्शन) क्रमशः लुक्, श्लु और लुपू सञ्ज्ञक होता है । व्याख्या-प्रत्ययस्य ।६।१। अदर्शनम् ।१।१। (अदर्शनं लोपः से) । लुक्श्लुलुपः ।१।३। यहां 'प्रत्यय का अदर्शन लुक्, श्लु, लुपू सञ्ज्ञक हो' ऐसा अर्थ प्रतीत होता है । इस से एक ही प्रत्यय के अदर्शन की 'लुक्, श्लु, लुपू' ये तीन सञ्ज्ञाएं हो जाती हैं । इस से 'हन्ति' में शप् का लुक् होने पर श्लौ (६०५) से द्वित्व प्राप्त होता है। 'जुहोति' में शप् का श्लु होने से उतो वृद्धिलुकि हलि (५६६) से वृद्धि प्राप्त होती है । अतः इन के साङ्कर्य की निवृत्ति के लिये 'लुक्-श्लु-लुपः' पद की आवृत्ति (दो वार पाठ) कर एक स्थान पर उस का तृतीयान्ततया विपरिणाम कर लेना चाहिये । अर्थः- (लुक्- श्लु-लुब्भिः) लुक्, श्लु और लुपू शब्दों से जो (प्रत्ययस्य) प्रत्यय का (अदर्शनम्) अदर्शन किया जाता है, वह क्रमशः (लुक्-श्लु-लुपः) लुक्, श्लु और लुपू सञ्ज्ञक होता है । भावः-१. प्रत्यय का अदर्शन 'लुक्' सञ्ज्ञक होता है । २. प्रत्यय का अदर्शन 'श्लु' सञ्ज्ञक होता है । ३. प्रत्यय का अदर्शन 'लुपू' सञ्ज्ञक होता है । अब इस अर्थ से 'हन्ति' आदि में कोई दोष नहीं आता; क्योंकि 'हन्ति' में शप्प्रत्यय का अदर्शन लुक्- सञ्ज्ञक है श्लुसञ्ज्ञक नहीं, अतः श्लौ (६०५) से द्वित्व नहीं होता । 'जुहोति' में शप्प्रत्यय का अदर्शन श्लुसञ्ज्ञक है लुक्सञ्ज्ञक नहीं, अतः उतो वृद्धिलुकि हलि (५६६) से वृद्धि नहीं होती । इसी प्रकार अन्यत्र भी जान लेना चाहिये । तो अब हमें विदित हो गया कि प्रत्यय के अदर्शन को ही 'लुक्' कहते हैं । 'कति + अस्' यहां अस् (जस्) प्रत्यय का लुक् अर्थात् अदर्शन हो कर 'कति' प्रयोग सिद्ध होता है । अब यहां जसि च (१६८) द्वारा गुण की आशङ्का करने के लिये प्रथम जस् की स्थापना करते हैं-