भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 294

अजन्त-पुल्लिङ्ग-प्रकरणम् २७६ तृन्नन्त वा तृजन्त मानते हैं । अतः इन के मत में 'अप्सृन्तृच्स्वसृ' इतने मात्र से ही दीर्घ सिद्ध हो सकता है । इस लिये इन के मत में इन शब्दों का सूत्र में ग्रहण व्यर्थ हो जाता है । इस पर ग्रन्थकार यह उत्तर देते हैं कि इन का ग्रहण नियम के लिये है । अभिप्राय यह है कि आचार्य पाणिनि को यहां तृन्-तृच् प्रत्ययों से अष्टाध्यायीस्थ तृन्- तृच् प्रत्ययों का ही ग्रहण अभीष्ट है औणादिक तृन्-तृच् प्रत्ययों का नहीं अत एव उन्होंने नप्तृ-नेष्टृ आदि सात औणादिक तृन्नन्त तृजन्त शब्दों का पृथक् उल्लेख किया है । यदि आचार्य की दृष्टि में वे भी तृन्नन्त तृजन्त होते तो आचार्य इन का पृथक् उल्लेख न करते । इस से इस नियम की उपलब्धि हुई कि औणादिक तृन्नन्त तृजन्त शब्दों को यदि उपधादीर्घ करना हो तो केवल नप्तृ आदि सात शब्दों को ही हो, अन्य किसी शब्द को नहीं । तात्पर्य यह है कि नप्तृ, नेष्टृ आदि सात औणादिक तृन्नन्त तृजन्त शब्दों के अतिरिक्त अन्य किसी औणादिक तृन्नन्त, तृजन्त शब्द की उपधा को दीर्घ न होगा । सूत्रगत 'तृन्, तृच्' से अष्टाध्यायीस्थ तृन्नन्त तृजन्त शब्दों का ग्रहण हो कर केवल उन की उपधा को ही दीर्घ होगा । ऋकारान्त औणादिक शब्द

(उपधादीर्घ हो जाता है)(उपधादीर्घ नहीं होता)
१. नप्तृ । २. नेष्टृ । ३. त्वष्टृ । ४. क्षत्तृ । ५. होतृ । ६. पोतृ । ७. प्रशास्तृ । ८. उद्गातृ । ९. स्वसृ ।<br>[यद्यपि सूत्र में 'उद्गातृ' का उल्लेख नहीं तथापि भाष्यकार के उद्गातारः (२.१.१ पर) प्रयोग से इसे भी उपधादीर्घ हो जाता है]१. शंस्तृ । २. शास्तृ । ३. क्षोत्तृ । ४. उन्नेतृ । ५. प्रतिहर्तृ । ६. हन्तृ । ७. मन्तृ । ८. प्रतिप्रस्थातृ । ९. प्रस्तोतृ । १०. दस्तृ । ११. शस्तृ । १२. अप्तृ । १३. भ्रातृ । १४. जामातृ । १५. मातृ । १६. पितृ । १७. दुहितृ । १८. नृ । १६. यातृ । २०. देवृ । २१. ननान्दृ । २२. सव्येष्टृ ।

औणादिक ऋदन्त पितृ (पिता) शब्द की रूपमाला यथा— प्र० पिता पितरौ पितरः प० पितुः पितृभ्याम् पितृभ्यः द्वि० पितरम् ,, पितॄन् ष० ,, पित्रोः पितॄणाम् तृ० पित्रा पितृभ्याम् पितृभिः स० पितरि ,, पितृषु च० पित्रे ,, पितृभ्यः सं० हे पितः! हे पितरौ! हे पितरः!


१. यदि इन शब्दों में कहीं अष्टाध्यायीस्थ तृन्नन्त वा तृजन्त मानेंगे तो तब दीर्घ हो जायेगा । निषेध केवल औणादिकों के लिये ही है । यथा—माता (मापने वाला), मातारौ, मातारः । हन्ता (मारने वाला), हन्तारौ, हन्तारः । मन्ता (मनन करने वाला), मन्तारौ, मन्तारः ।