लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् इस की सम्पूर्ण प्रक्रिया 'धातृ' शब्द के समान होती है। केवल सर्वनामस्थान में उपधादीर्घ का अभाव होता है। सुँ में सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) से उपधा- दीर्घ हो जाता है। इसी प्रकार पूर्वोक्त शस्तृ, जामातृ आदि शब्दों के उच्चारण होते हैं। निदर्शनार्थ 'भ्रातृ' शब्द का उच्चारण यथा— प्र० भ्राता भ्रातरौ भ्रातरः | प० भ्रातुः भ्रातृभ्याम् भ्रातृभ्यः द्वि० भ्रातरम् ,, भ्रातॄन् | ष० ,, भ्रात्रोः भ्रातॄणाम् तृ० भ्रात्रा भ्रातृभ्याम् भ्रातृभिः | स० भ्रातरि ,, भ्रातृषु च० भ्रात्रे ,, भ्रातृभ्यः | सं० हे भ्रातः ! हे भ्रातरौ ! हे भ्रातरः ! पूर्वोक्त उपधादीर्घाभाव वाले औणादिक शब्दों में 'मातृ, दुहितृ, ननान्दृ और यातृ' ये चार शब्द स्त्रीलिङ्गी हैं अतः इन का विवेचन आगे अजन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण में किया जायगा। अब नृ (मनुष्य) शब्द का वर्णन करते हैं। णीञ् प्रापणे (भ्वा० उ०) इत्य- स्माद् नयेर्डिडिच्व (उणा० २।५७) इति ऋप्रत्यये डित्त्वाट् टिलोपं च कृत नृशब्द सिध्यति । नयति कार्याणीति ना=पुरुषो नेता वा। नृशब्द की सम्पूर्ण प्रक्रिया पितृ शब्द के समान होती है। सर्वनामस्थान में इस उपधादीर्घ नहीं हुआ करता। षष्ठी के बहुवचन में यहां केवल अन्तर हुआ करता है— 'नृ+आम्' इस दशा में ह्रस्व को नुट् का आगम हो कर 'नृ+नाम्'। अब नामि (१४६) से नित्य दीर्घ प्राप्त होने पर अग्रिमसूत्र विकल्प करता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१२) नृ च ।६।४।६॥ अस्य नामि वा दीर्घः । नॄणाम् । नृणाम् ॥ अर्थ—नाम् परे हो तो 'नृ' शब्द के ऋकार को विकल्प कर के दीर्घ हो। व्याख्या—नृ ।६।१। (यहां षष्ठी का लुक् समझना चाहिये)। च इत्यव्य- पदम् । उभयथा इत्यव्ययपदम् (छन्दस्युभयथा से) । दीर्घः ।१।१। (ढ्रलोपे० से) । नामि ।७।१। (नामि स) । अर्थ—(नामि) नाम् परे होने पर (नृ) नृशब्द के स्थान पर (उभयथा) विकल्प कर के (दीर्घः) दीर्घ आदेश हो जाता है। अचश्च (१।२।२८) परिभाषा द्वारा ऋवर्ण को ही दीर्घ होगा। 'नृ+नाम्' यहां प्रकृतसूत्र से वैकल्पिक दीर्घ हो कर दोनों पक्षों में ऋवर्णा- न्नस्य णत्वं वाच्यम् (वा० २१) वार्त्तिक की सहायता से रषाभ्यां नो णः समानपदे (२६७) सूत्र से णत्व हो कर 'नॄणाम्' और 'नृणाम्' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। नृशब्द की रूपमाला यथा— प्र० ना नरौ नरः | प० नुः नृभ्याम् नृभ्यः द्वि० नरम् ,, नॄन् | ष० ,, न्रोः नॄणाम्, नृणाम् तृ० न्रा नृभ्याम् नृभिः | स० नरि ,, नृषु च० न्रे ,, नृभ्यः | सं० हे न ! हे नरौ ! हे नरः !