लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २८१ नोट—'नरो गच्छन्ति' इत्यादि वाक्यों में अकारान्त 'नर' शब्द का प्रयोग नहीं, इसी नृशब्द के प्रथमा के बहुवचन का प्रयोग है अतः वाक्य शुद्ध है। विशेष—इस शब्द पर दो श्लोक बहुत प्रसिद्ध हैं— लक्ष्म्या वै जायते भानुः, सरस्वत्यापि जायते। अत्र षष्ठीपदं गुप्तं, यो जानाति स पण्डितः ॥१॥ [भा=कान्तिः, नुः=पुरुषस्य।] एकोना विंशतिः स्त्रीणां स्नानार्थं सरयूं गता। विंशतिः पुनरायाता, एको व्याघ्रेण भक्षितः ॥२॥ [एकोना इति विंशतेर्विशेषणेन विरोधः, एको ना=नर इति परिहारः।] अभ्यास (३३) (१) (क) 'नॄन्' मे नकार को णकार क्यों नही होता ? (ख) 'ऋ' और 'ॡ' शब्दों का उच्चारण लिखें। (ग) 'धातर्देहि, पितरत्र, नगंगच्छ' इत्यादि में उत्व क्यों नही होता ? (घ) नृ च यहां 'नृ' में कौन सी विभक्ति है ? (ङ) औणादिक तृजन्त होने पर भी 'उद्गातृ' शब्द को क्यों उपधादीर्घ हो जाता है ? (२) इन शब्दों में उपधादीर्घ कहां करना चाहिये और कहां नहीं ? १. श्रोतृ । २. पोतृ । ३. दातृ । ४. नेतृ । ५. प्रशास्तृ । ६. हन्तृ । ७. उद्गातृ । ८. भ्रातृ । ६. सवितृ । १०. जामातृ । ११. स्तोतृ । १२. नेष्टृ । १३. नृ । १४. त्वष्टृ । १५. पितृ । (३) नप्त्रादिग्रहणं व्युत्पत्तिपक्षे नियमार्थम् इस पङ्क्ति का भाव स्पष्ट करते हुए यह लिखें कि इस का रूपसिद्धि पर क्या प्रभाव पड़ता है ? (४) मातृ और हन्तृ शब्द यदि औणादिक न मान कर अष्टाध्यायी के तृच् प्रत्यय से निष्पन्न मानें तो रूपमाला में क्या अन्तर होगा ? (५) क्या व्यवधान में ऋवर्णान्निस्थ णत्वं वाच्यम् से णत्व हो जायेगा ? (६) शतृशब्द का सुं, ङस्, ङि में क्या रूप बनेगा ? (यहां ऋदन्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) -::-०-::- संस्कृतसाहित्य में ॡदन्त, लृदन्त और एदन्त ऐसा कोई प्रसिद्ध शब्द नहीं जिस का बालकों के लिये वर्णन करना उपयोगी हो; अतः ग्रन्थकार ओकारान्त पुंल्लिङ्ग 'गो' शब्द का वर्णन करते हैं— [लघु०] अतिदेश-सूत्रम्—(२१३) गोतो णित् ।७।१।६०॥ ओकाराद् विहितं सर्वनामस्थानं णिद्वत् । गौः, गावौ, गावः ॥ अर्थः—ओकारान्त शब्द से विधान किया हुआ सर्वनामस्थान णिद्वत् हो।