लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् व्याख्या—गोतः ५।१। सर्वनामस्थानम् १।१। (इतोऽत् सर्वनामस्थाने से विभक्तिविपरिणाम द्वारा) । णित् १।१। यह अतिदेशसूत्र है, अतः 'णित्' का तात्पर्य होगा—णिद्वत् । अर्थात् जो २ कार्य णित् के परे होने से होते हैं वे सब सर्वनामस्थान के परे होने पर भी हो जायेंगे । यहां पर कात्यायनजी ने दो वार्तिक लिखे हैं । (१) ओतो णिद् इति वाच्यम् । (२) विहितविशेषणञ्च । इन का अभिप्राय यह है कि— यदि केवल गोशब्द से परे ही सर्वनामस्थान णित् हो तो 'सुद्यो' शब्द से—'सुद्यौः, सुद्यावौ, सुद्यावः' ये रूप सिद्ध न हो सकेंगे । अतः सूत्र में 'गोतः' पद को हटा कर उस के स्थान पर 'ओतः' यह सामान्यनिर्देश करना ही उचित है । परन्तु केवल उस 'ओतः' से भी पूरा काम नहीं चल सकता, क्योंकि तब 'हे भानो + सु, हे वायो + सु' इत्यादि स्थानों पर भी णिद्वत् हो कर वृद्धि आदि अनिष्ट प्रसक्त होगा । अतः यहां 'विहितम्' यह भी 'सर्वनामस्थानम्' का विशेषण कर देना चाहिये । 'हे वायो + सु, हे भानो + सु' आदि प्रयोगों में सर्वनामस्थान, ओकारान्त से विधान नहीं किया गया अपितु भानु, वायु आदि उकारान्त शब्दों से विधान किया गया है । अतः णिद्भाव न होने से कोई दोष नहीं आता । अर्थ—(गोतः = ओतः) ओकारान्त से (विहितम्, सर्वनामस्थानम्) विधान किया हुआ सर्वनामस्थान (णित्) णिद्वत् होता है । 'गो + स्' (सुँ) यहां ओकारान्त शब्द 'गो' है, इस से विहित सर्वनामस्थान 'सुँ' है । अतः प्रकृतसूत्र से सर्वनामस्थान णिद्वत् हुआ । णिद्वत् होने पर अचो ञ्णिति (१९२) सूत्र से गो के अन्त्य ओकार को औकार वृद्धि हो कर रुत्व-विसर्ग करने से 'गौः' प्रयोग सिद्ध हुआ । प्रथमा और द्वितीया के द्विवचन में 'गो + औ' इस दशा में प्रकृतसूत्र से णिद्वत्, अचो ञ्णिति (१९२) से औकार वृद्धि और औकार को एचोऽयवायावः (२२) से आव् आदेश हो कर 'गावौ' प्रयोग सिद्ध हुआ । जस् में भी इसी तरह णिद्वत्, वृद्धि और आव् आदेश हो कर 'गावः' बना । 'गो + अम्' यहां गोतो णित् (२१३) से णिद्भाव प्राप्त होने पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१४) औतोऽम्शसोः।६।१।९३॥ ओतोऽम्शसोरचि आकार एकादेशः। गाम्, गावौ, गाः । गवा । गवे । गोः २ । इत्यादि ॥ अर्थः—ओकार से अम् या शस् का अच् परे हो तो पूर्व + पर के स्थान पर आकार एकादेश हो । व्याख्या—आः १।१। (यहां विभक्ति का लुक् हुआ है)। ओतः ५।१। अम्शसोः ।६।२। अचि ।३।१। (इको यणचि से) । पूर्वपरयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्व- परयोः यह अधिकृत है)। अर्थ—(ओतः) ओकार से (अम्शसोः) अम् वा शस् का (अचि) अच् परे हो तो (पूर्व-परयोः) पूर्व + पर के स्थान पर (आ) आकार (एकः) एकादेश हो ।