भारतकोश
संग्रह पर लौटें

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

२८२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् व्याख्या—गोतः ५।१। सर्वनामस्थानम् १।१। (इतोऽत् सर्वनामस्थाने से विभक्तिविपरिणाम द्वारा) । णित् १।१। यह अतिदेशसूत्र है, अतः 'णित्' का तात्पर्य होगा—णिद्वत् । अर्थात् जो २ कार्य णित् के परे होने से होते हैं वे सब सर्वनामस्थान के परे होने पर भी हो जायेंगे । यहां पर कात्यायनजी ने दो वार्तिक लिखे हैं । (१) ओतो णिद् इति वाच्यम् । (२) विहितविशेषणञ्च । इन का अभिप्राय यह है कि— यदि केवल गोशब्द से परे ही सर्वनामस्थान णित् हो तो 'सुद्यो' शब्द से—'सुद्यौः, सुद्यावौ, सुद्यावः' ये रूप सिद्ध न हो सकेंगे । अतः सूत्र में 'गोतः' पद को हटा कर उस के स्थान पर 'ओतः' यह सामान्यनिर्देश करना ही उचित है । परन्तु केवल उस 'ओतः' से भी पूरा काम नहीं चल सकता, क्योंकि तब 'हे भानो + सु, हे वायो + सु' इत्यादि स्थानों पर भी णिद्वत् हो कर वृद्धि आदि अनिष्ट प्रसक्त होगा । अतः यहां 'विहितम्' यह भी 'सर्वनामस्थानम्' का विशेषण कर देना चाहिये । 'हे वायो + सु, हे भानो + सु' आदि प्रयोगों में सर्वनामस्थान, ओकारान्त से विधान नहीं किया गया अपितु भानु, वायु आदि उकारान्त शब्दों से विधान किया गया है । अतः णिद्भाव न होने से कोई दोष नहीं आता । अर्थ—(गोतः = ओतः) ओकारान्त से (विहितम्, सर्वनामस्थानम्) विधान किया हुआ सर्वनामस्थान (णित्) णिद्वत् होता है । 'गो + स्' (सुँ) यहां ओकारान्त शब्द 'गो' है, इस से विहित सर्वनामस्थान 'सुँ' है । अतः प्रकृतसूत्र से सर्वनामस्थान णिद्वत् हुआ । णिद्वत् होने पर अचो ञ्णिति (१९२) सूत्र से गो के अन्त्य ओकार को औकार वृद्धि हो कर रुत्व-विसर्ग करने से 'गौः' प्रयोग सिद्ध हुआ । प्रथमा और द्वितीया के द्विवचन में 'गो + औ' इस दशा में प्रकृतसूत्र से णिद्वत्, अचो ञ्णिति (१९२) से औकार वृद्धि और औकार को एचोऽयवायावः (२२) से आव् आदेश हो कर 'गावौ' प्रयोग सिद्ध हुआ । जस् में भी इसी तरह णिद्वत्, वृद्धि और आव् आदेश हो कर 'गावः' बना । 'गो + अम्' यहां गोतो णित् (२१३) से णिद्भाव प्राप्त होने पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१४) औतोऽम्शसोः।६।१।९३॥ ओतोऽम्शसोरचि आकार एकादेशः। गाम्, गावौ, गाः । गवा । गवे । गोः २ । इत्यादि ॥ अर्थः—ओकार से अम् या शस् का अच् परे हो तो पूर्व + पर के स्थान पर आकार एकादेश हो । व्याख्या—आः १।१। (यहां विभक्ति का लुक् हुआ है)। ओतः ५।१। अम्शसोः ।६।२। अचि ।३।१। (इको यणचि से) । पूर्वपरयोः ।६।२। एकः ।१।१। (एकः पूर्व- परयोः यह अधिकृत है)। अर्थ—(ओतः) ओकार से (अम्शसोः) अम् वा शस् का (अचि) अच् परे हो तो (पूर्व-परयोः) पूर्व + पर के स्थान पर (आ) आकार (एकः) एकादेश हो ।

अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २८३ 'गो+अम्' यहां ओकार से परे अम् का अच् वर्त्तमान है; अतः प्रकृतसूत्र से ओकार और अकार के स्थान पर आकार एकादेश हो कर 'गाम्' रूप सिद्ध हुआ। 'गो+अस्' (शस्) यहां भी प्रकृतसूत्र से आकार एकादेश हो रुत्व विसर्ग करने से 'गाः' रूप बनता है। ध्यान रहे कि आकार पूर्वसवर्णदीर्घघटित नहीं अतः तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७) से सकार को नकार न होगा। तृतीया और चतुर्थी के एकवचन में एचोऽयवायावः (२२) से अव् आदेश हो कर क्रमशः 'गवा' और 'गवे' बना। पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन में ङसिङसोश्च (१७३) से पूर्वरूप हो— 'गोः'। पदान्त न होने से (४३) द्वारा पूर्वरूप नहीं होता। गोशब्द की रूपमाला यथा— गो=बैल [गमेर्डोः (उणा० २२५)] प्र० गोः गावौ गावः प० गोः गोभ्याम् गोभ्यः द्वि० गाम् ,, गाः ष० ,, गवोः गवाम् तृ० गवा गोभ्याम् गोभिः स० गवि ,, गोषु च० गवे ,, गोभ्यः सं० हे गौः ! हे गावौ ! हे गावः! (यहां ओकारान्त पुलिंङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) —:०:— अब ऐकारान्त पुलिंङ्ग 'रै' शब्द का वर्णन करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१५) रायो हलि ।७।२।८५॥ अस्याकारादेशो हलि विभक्तौ। राः, रायौ, रायः। राभ्यामित्यादि ॥ अर्थः—हलादि विभक्ति परे होने पर रै शब्द के ऐकार को आकार आदेश हो। व्याख्या—रायः ।६।१। आ ।१।१। (अष्टन आ विभक्तौ से)। हलि ।७।१। विभक्तौ ।७।१। 'हलि' पद 'विभक्तौ' पद का विशेषण है, अतः तदादिविधि हो कर 'हलादौ विभक्तौ' बन जायेगा। अर्थः—(हलि=हलादौ) हलादि (विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (रायः) रै शब्द के स्थान पर (आ) आकार आदेश होता है। अलो- ऽन्त्यपरिभाषा से 'रै' के अन्त्य ऐकार को आकार होगा। रा दाने (अदा० प०) धातु से रातेर्डैः (उणा० २२४) सूत्र द्वारा डै प्रत्यय कर टिलोप करने से 'रै' शब्द निष्पन्न होता है। राति=ददाति श्रेयोऽर्थं वा पात्रेभ्य इति राः। रायते=दीयते इति रा इति वा। धन, सूर्य या सुवर्ण को 'रै' कहते हैं। सुं, भ्याम् ३, भिस्, भ्यस् २, सुप्—ये आठ हलादि विभक्तियां हैं। इन में प्रकृतसूत्र से रै को आकार आदेश हो जायेगा। अन्यत्र अजादियों में एचोऽयवायावः (२२) से ऐकार को आय् आदेश होगा। रूपमाला यथा— प्र० राः रायौ रायः तृ० राया राभ्याम् राभिः द्वि० रायम् ,, ,, च० राये ,, राभ्यः

२८४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् प० राय् राभ्याम् राभ्यः । स० रायि रायोः रासु ष० ,, रायोः रायाम् । सम्० हे राः । हे रायौ । हे रायः । (यहां ऐकारान्त पुल्लिंग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) ० [लघु०] ग्लौः । ग्लावौ । ग्लावः । ग्लौभ्यामित्यादि ॥ व्याख्या—म्लै हर्षक्षये (भ्वा० प०) धातु से ग्ला-म्नोर्डिच्च डो (उणा० २२२) सूत्र द्वारा डो प्रत्यय कर टिलोप करने से ग्लौ शब्द निष्पन्न होता है। ग्लायंति= कमलस्य चौरादीना वा हर्षक्षयं करोति (अन्तर्भावितण्यर्थ) इति ग्लौ =चन्द्रः। ग्लौर्मृगाङ्कः कलानिधिरित्यमरः। 'ग्लौ' शब्द के औकार को सर्वत्र अजादि प्रत्यया में एचोऽयवायाव (२२) से आव् आदेश हो जाता है। हलादि विभक्तियों मे कोई अन्तर नहीं होता। सुप् मे केवल षत्व (१५०) विशेष है। रूपमाला यथा— प्र० ग्लौः ग्लावौ ग्लावः प० ग्लावः ग्लौभ्याम् ग्लौभ्यः द्वि० ग्लावम् ,, ,, ष० ,, ग्लावोः ग्लावाम् तृ० ग्लावा ग्लौभ्याम् ग्लौभिः स० ग्लावि , ग्लौषु च० ग्लावे , ग्लौभ्यः स० हे ग्लौ ! हे ग्लावौ ! हे ग्लाव ! इसी प्रकार 'जनौ' (जनान् अवतीति जनौ) प्रभृति शब्दों के रूप होंगे। (यहा औकारान्त पुल्लिंग शब्दो का विवेचन समाप्त होता है।) [लघु०] इत्यजन्ताः पुंल्लिङ्गाः [शब्दाः] ॥ अर्थ—यहां 'अजन्तपुंल्लिङ्ग' शब्द समाप्त होते हैं। व्याख्या—'अजन्त' शब्द में स्पष्टप्रतिपत्ति के लिए कुत्व नहीं किया गया। यहां 'अजन्त पुल्लिंग प्रकरण' समाप्त होता है। इस के अनन्तर 'अजन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण' आरम्भ किया जायेगा। अभ्यास (३४) (१) गोतो णित् सूत्र म कात्यायन के वचनो के अनुसार दोषा की उद्भावना कर उन का समाधान करें। (२) क्या कारण है कि ग्रन्थकार ने ऋदन्तो के आगे ओदन्त शब्द लिखे हैं? (३) रायो हलि सूत्र म 'हलि' पद ग्रहण न करें तो क्या दोष उत्पन्न होगा? (४) औतोऽम्शसो सूत्र का पदच्छेद कर यह बतायें कि यह सूत्र 'ग्लौ' शब्द म क्यो प्रवृत्त (?) होता है? (५) 'गो+अस्' (ङसिं वा ङस्) यहा एचोऽयवायाव और एङ पदान्तादति सूत्रा म कौन सा प्रवृत्त (?) होगा? कारण साथ लिखें।

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २८५ (६) गो, रै और ग्लौ शब्दों का उच्चारण लिखते हुए गाः, गौः, राभ्याम् और ग्लावि प्रयोगों की ससूत्र साधनप्रक्रिया लिखें। (७) 'गोः' और 'गो:' इन दो में कौन सा पद व्याकरणसम्मत है? (८) 'अजन्ताः' यहां कुत्व क्यों नहीं होता? -----:: ० ::----- इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु-सिद्धान्त- कौमुद्याम् अजन्त-पुंल्लिङ्ग- प्रकरणं समाप्तम् ॥ अथाऽजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् अजन्त-पुंल्लिङ्ग शब्दों के अनन्तर अब अजन्त-स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन प्रारम्भ किया जाता है। शब्दों का विवेचन प्रत्याहारक्रम से हुआ करता है। यथा— अ = अकारान्त, आकारान्त। इ = इकारान्त, ईकारान्त। उ = उकारान्त, ऊकारान्त। ऋ = ऋकारान्त, ॠकारान्त। ऌ = ॡकारान्त। ए = एदन्त। ओ = ओदन्त। ऐ = ऐदन्त। औ = औदन्त। तो इस प्रकार सर्वप्रथम अकारान्तों का नम्बर आता है, परन्तु स्त्रीलिङ्ग में कोई शब्द अकारान्त नहीं रह सकता; क्योंकि सर्वत्र अजाद्यतष्टाप् (१२४५) द्वारा अदन्तों से 'टाप्' प्रत्यय हो जाता है। 'टाप्' के अनुबन्धों का लोप हो कर सवर्णदीर्घ करने से आकारान्त शब्द बन जाता है। अतः सर्वप्रथम आकारान्त शब्दों का ही विवेचन किया जायेगा। [लघु०] रमा ॥ व्याख्या—रमुँ क्रीडायाम् (भ्वा० आ०) धातु से नन्दिग्रहिपचादिभ्यो ल्युणि- न्यचः (७८६) सूत्र द्वारा 'अच्' प्रत्यय करने पर 'रम' शब्द बन जाता है। तब स्त्रीत्व की विवक्षा में 'टाप्' प्रत्यय हो कर अनुबन्धों का लोप और सवर्णदीर्घ करने से 'रमा' शब्द निष्पन्न होता है। 'रमा' का अर्थ है 'लक्ष्मी'। 'रमा' शब्द से स्वादिप्रत्ययों की उत्पत्ति प्रातिपदिकसञ्ज्ञा किये बिना ही हो जाती है; क्योंकि स्वादिप्रत्यय जैसे प्रातिपदिक से परे होते हैं वैसे ङ्यन्त और आवन्त से परे भी होते हैं (देखें सूत्र ११६)। 'रमा + स्' (सुँ) यहां 'रमा' शब्द आवन्त (टावन्त) है, अतः इस से परे हल्ङ्याब्भ्यो० (१७६) सूत्र द्वारा अपृक्त सकार का लोप हो कर 'रमा' प्रयोग सिद्ध होता है। यहां विभक्ति का लोप होने पर भी प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् (१६०) द्वारा पदसञ्ज्ञा तो रहेगी ही। विभक्ति लाने का फल भी यही है।

२८६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् 'रमा + औ' यहां पूर्वसवर्णदीर्घ का दीर्घाज्जसि च (१६२) से निषेध हो वृद्धि- रेचि (३३) से वृद्धि प्राप्त होती है। इस पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१६) औङ आपः ।७।१।१८॥ आवन्तादङ्गात् परस्य औङः शी स्यात् । 'औङ्' इत्यौकारविभक्तेः सञ्ज्ञा । रमे । रमाः ॥ अर्थः—आवन्त अङ्ग से परे औङ् को शी आदेश हो। 'औङ्' यह औकार- विभक्ति—'औ' और 'औट्' की प्राचीन सञ्ज्ञा है। व्याख्या—आपः ।५।१। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य इस अधिकृत का विभक्ति- विपरिणाम हो जाता है)। औङः ।६।१। शी ।१।१। (जसः शी से)। 'आपः' यह 'अङ्गात्' पद का विशेषण है अत इस से तदन्तविधि हो कर 'आवन्ताद् अङ्गात्' बन जाता है। अर्थ—(आप ) आवन्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (ओङ ) ओङ् के स्थान पर (शी) शी आदेश होता है। पाणिनि से पूर्ववर्ती आचार्य प्रथमा तथा द्वितीया के द्विवचन को 'ओङ्' कहते थे। महामुनि पाणिनि ने भी उसी सञ्ज्ञा का यहां अपने शास्त्र में व्यवहार किया है। 'रमा + औ' यहां आवन्त अङ्ग रमा से परे औङ् को शी आदेश हुआ। अब स्थानिवद्भाव से 'शी' में प्रत्ययत्व ला कर प्रत्यय के आदि शकार की लशक्वतद्धिते (१३६) से इत्सञ्ज्ञा और तस्य लोपः (३) से लोप हो—रमा + ई। पुनः आद् गुणः (२७) से गुण एकादेश करने से 'रमे' प्रयोग सिद्ध होता है। 'रमा + अस्' (जस्) यहां पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है, उस का दीर्घाज्जसि च (१६२) से निषेध हो जाता है। अब अकः सवर्णे दीर्घ (४२) से सवर्णदीर्घ हो कर रुत्व विसर्ग करने से 'रमा' प्रयोग सिद्ध होता है। 'हे रमा + स्' यहां सम्बुद्धि में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१७) सम्बुद्धौ च ।७।३।१०६॥ आप एकारः स्यात् सम्बुद्धौ। एङ्घ्रस्वात्० (१३४) इति सम्बुद्धि- लोपः । हे रमे !, हे ग्‍मे !, हे रमाः ! । रमाम्र् । रमे । रमाः ॥ अर्थ —सम्बुद्धि परे होने पर 'आप्' को 'ए' आदेश हो। व्याख्या—सम्बुद्धौ ।७।१। च इत्यव्ययपदम्। आप ।६।१। (आङि चापः से)। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। एत् ।१।१। (बहुवचने झल्येत् से)। 'अङ्गस्य' का विशेषण होने से 'आपः' से तदन्तविधि हो कर 'आवन्तस्य अङ्गस्य' बन जायेगा। अर्थ—(सम्बुद्धौ) सम्बुद्धि परे होने पर (आप = आवन्तस्य) आवन्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (एत्) एकार आदेश हो। अलोऽन्त्यपरिभाषा से अन्त्य आकार को एकार आदेश होगा। 'हे रमा + स्' यहां 'स्' यह सम्बुद्धि परे है ही अत प्रवृत्तसूत्र से आकार को

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २८७ एकार हो गया । तब 'हे रमे + स्' इस स्थिति में एङ्ह्रस्वात्० (१३४) सूत्र से सम्बुद्धि के सकार का लोप करने से 'हे रमे !' रूप सिद्ध होता है। सम्बोधन के द्विवचन और बहुवचन में प्रथमा के समान प्रक्रिया होती है— हे रमे !, हे रमाः । ध्यान रहे कि सम्बोधन के एकवचन और द्विवचन में एक समान रूप बनने पर भी प्रक्रिया में बड़ा अन्तर है। 'रमा + अम्' यहां अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप हो कर—रमाम् । द्वितीया के द्विवचन में प्रथमावत् 'रमे' रूप बनता है। द्वितीया के बहुवचन में 'रमा + अस्' (शस्) इस स्थिति में दीर्घ से परे जस् वा इच्छ् वर्त्तमान न होने से दीर्घाज्जसि च (१६२) से पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध न हुआ। अतः पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर रुत्व विसर्ग करने से—'रमाः' प्रयोग सिद्ध हुआ। ध्यान रहे कि तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७) सूत्र पुंल्लिङ्ग में ही शस् के सकार को नकार आदेश करता है अतः यहां स्त्रीलिङ्ग में उस की प्रवृत्ति न होगी। 'रमा + आ' (टा) यहां सवर्णदीर्घ प्राप्त होने पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१८) आङि चापः। ७।३।१०५॥ आङि ओसि चाप एकारः । रमया । रमाभ्याम् । रमाभिः ॥ अर्थः—आङ् अथवा ओस् परे हो तो 'आप्' को 'ए' आदेश हो । व्याख्या—आङि ।७।१। ओसि ।७।१। (ओसि च से)। च इत्यव्ययपदम् । आपः ।६।१। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। एत् ।१।१। (बहुवचने झल्येत् से) 'आपः' यह 'अङ्गस्य' पद का विशेषण है, अतः तदन्तविधि हो कर 'आवन्तस्य अङ्गस्य'। बन जायेगा । अर्थः—(आङि) आङ् (च) अथवा (ओसि) ओस् परे होने पर (आपः =आवन्तस्य) आवन्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर एकार आदेश हो। अलोऽन्त्यपरिभाषा से अन्त्य आकार के स्थान पर ही एकार आदेश होगा। 'टा' विभक्ति को ही पूर्वाचार्य 'आङ्' कहते हैं—यह पीछे (१७१) सूत्र पर स्पष्ट हो चुका है। 'रमा + आ' इस दशा में आङ् परे रहने पर आवन्त अङ्ग 'रमा' के अन्त्य आकार को एकार हुआ। तब एचोऽयवायावः (२२) सूत्र से एकार को 'अय्' हो कर 'रमया' रूप सिद्ध हुआ। रमा + भ्याम् = रमाभ्याम् । रमा + भिस् = रमाभिः । यहां अत् = ह्रस्व अकार से परे न होने के कारण 'भिस्' को 'ऐस्' नहीं हुआ। 'रमा + ए' (ङे) यहां वृद्धि के प्राप्त होने पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१६) याडापः ।७।३।११३॥ आपो ङितो याट् । वृद्धिः--रमायै । रमाभ्याम् २ । रमाभ्यः २ । रमायाः २ । रमयोः २ । रमाणाम् । रमायाम् । रमासु ॥ अर्थः—आवन्त अङ्ग से परे ङित् वचनों को 'याट्' आगम हो । व्याख्या—याट् ।१।१। आपः ।५।१। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य इस अधिकृत का

२८८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् विभक्तिविपरिणाम हो जाता है)। ङित् ।६।१। (घेङिति से विभक्तिविपरिणामद्वारा)। अर्थ -(आप् = आवन्तात्) आवन्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (ङित्) ङित् का अवयव (याट्) याट् हो। याट् में टकार इत्सञ्ज्ञक है, अतः उस का लोप हो जाता है। टित् होने से याट् ङित् का आद्यवयव होता है। ङे, ङसिँ, ङस्, ङि -ये चार ङित् होते हैं। 'रमा+ए' इस अवस्था में आवन्त अङ्ग 'रमा' से परे ङित् प्रत्यय 'ङे' को 'याट्' का आगम हुआ। तब 'रमा+या ए' इस स्थिति में वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश हो कर 'रमायै' रूप सिद्ध हुआ।¹ पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन में 'रमा+अस्' इस अवस्था में प्रकृतसूत्र से याट् आगम हो अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ करने पर 'रमायाः' रूप बनता है। षष्ठी और सप्तमी के द्विवचन में 'रमा+ओस्' इस दशा में आङि चापः (२१९) से मकारोत्तर आकार को एकार हो अय् आदेश करने से 'रमयोः' सिद्ध होता है। षष्ठी के बहुवचन में 'रमा+आम्' इस अवस्था में आवन्त होने से ह्रस्व- नद्यापो नुट् (१४८) से नुट् आगम तथा अट्कुप्वाङ्० (१३८) से नकार को णकार हो कर 'रमाणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है।² सप्तमी के एकवचन में 'रमा+ङि' इस अवस्था में ङेराम्नद्याम्नीभ्यः (१६८) सूत्र से 'ङि' को 'आम्' आदेश हो आम् में स्थानिवद्भाव से ङित्त्व ला कर याडापः (२१६) से याट् का आगम हो जाता है। तब 'रमा+या आम्' इस स्थिति में सवर्ण- दीर्घ करने से 'रमायाम्' प्रयोग सिद्ध होता है। ―― सप्तमी के बहुवचन में 'रमा+सु' इस दशा में इण् या कवर्ग न होने से आदेश- प्रत्यययोः (१५०) से षत्व नहीं होता―'रमासु'। रमाशब्द की रूपमाला यथा― प्र० रमा रमे रमाः प० रमायाः रमाभ्याम् रमाभ्यः द्वि० रमाम् " " ष० " रमयोः रमाणाम् तृ० रमया रमाभ्याम् रमाभिः म० रमायाम् " रमासु च० रमायै " रमाभ्यः स० हे रमे ! हे रमे ! हे रमा ! [लघु०] एवं दुर्गाऽम्बिकादयः ॥ अर्थ ―इसी प्रकार दुर्गा, अम्बिका आदि आकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप बनेंगे। १. ध्यान रहे कि यहा आगम 'याट्' है, आट् नही, अत आटश्च (१६७) सूत्र प्रवृत्त न होगा। समुदायो ह्यर्थवान् तस्यैकदेशोऽनर्थकः (समुदाय ही सार्थक होता है उस का एकदेश अनर्थक होता है)। २. 'रमा+नाम्' इत्यत्र पर्जन्यवल्लक्षणप्रवृत्ति रितिपरिभाषया दीर्घस्यापि दीर्घं इति केचिदाहुः। वस्तुतस्तु नैतादृशेषु मुधा सूत्रप्रवृत्तिः।

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २८१ व्याख्या—हम बालकों के लिये अत्यन्त उपयोगी कुछ शब्दों का सङ्ग्रह यहां दे रहे हैं। इन का उच्चारण रमावत् होता है। इन में भी पूर्ववत् '' इस चिह्न वाले स्थानों में णत्वविधि जान लेनी चाहिये— शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ अङ्गना = स्त्री | उपमा = सादृश्य | गवेषणा = खोज अचला = पृथ्वी | उपेक्षा = लापरवाही | गुञ्जा = रत्ती अजा = बकरी | उमा = पार्वती | गुटिका = गोली अट्टालिका = अटारी | उर्वरा* = उपजाऊ भूमि | गुडाका = निद्रा अनित्यता = नश्वरता | उषा* = प्रभात | गुहा = गुफ़ा अनुज्ञा = आज्ञा | एला = इलायची | गोशाला = गो-स्थान अमावस्या = अमावस | कथा = कहानी | ग्रीवा* = गर्दन अयोध्या = प्रसिद्ध नगर | कनीनिका = नेत्र-पुतली | घटा = मेघमाला अर्चा = पूजा, मूर्ति | कन्था = गोदड़ी | घृणा = दया, अरुचि अवस्था = हालत | कन्या = कुंवारी लड़की | घोषणा = ढिंढोरा अविद्या = अज्ञान | कपर्दिका = कौड़ी | चन्द्रिका* = चान्दनी अशनाया = भूख | कला = अंश | चपला = विद्युत् असिधेनुका = छुरी | कल्पना = रचना | चर्चा = लेप, विचार अहिंसा = हिंसा न करना | कविका = लगाम | चर्या* = चालचलन आकाङ्क्षा* = इच्छा | कशा = चाबुक | चिकित्सा = इलाज आख्या = नाम | कस्तूरिका* = कस्तूरी | चिकीर्षा* = करणेच्छा आज्ञा = हुक्म | कान्ता = मनोहरा | चिता = चिता आत्मजा = पुत्री | काष्ठा = दिशा | चिन्ता = फ़िकर आपगा = नदी | कुत्सा = निन्दा | चूड़ा = चोटी आशङ्का = शक | कुलटा = व्यभिचारिणी | चेतना = समझ, ज्ञान आशा = दिशा, आशा | कुल्या = नहर | चेष्टा = हरकत आस्था = पूज्यबुद्धि | कृपा* = दया | छटा = चमक इच्छा = चाह | केका = मयूर-वाणी | छाया = छाया इज्या = यज्ञ | कौशल्या = राममाता | छिक्का = छींक इन्दिरा* = लक्ष्मी | क्षपा* = रात्रि | छुरिका* = छुरी ईप्सा = पाने की इच्छा | क्षमा* = माफ़ी | जटा = जटा ईर्ष्या* = डाह | क्षुधा = भूख | जडता = मूर्खता ईहा = इच्छा, चेष्टा | क्ष्मा* = पृथिवी | जनता = जनसमूह उग्रता = भयानकता | खेला = खेल | जलौका = जोंक उत्कण्ठा = प्रबल इच्छा | गङ्गा = प्रसिद्ध नदी | जाया = स्त्री उपकार्या* = तम्बू | गदा = गदा | जिज्ञासा = ज्ञानेच्छा ल० प्र० (१६)

२६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

शब्द—अर्थशब्द—अर्थशब्द—अर्थ
जिह्वा = जीभदीर्घिका* = बावड़ीपिपासा = प्यास
जीविका = गुजारादुर्गा* = पार्वतीपिपीलिका = चींटी
जुगुप्सा = निन्दादूषिका* = नेत्रों का मलपीडा = दुःख
ज्या = धनुष की डोरीदेवता = इन्द्र आदिपूर्णिमा = पूर्णमासी
ज्योत्स्ना = चाँदनीदोला = पालकी, पींगप्रतिज्ञा = प्रण
झञ्झा = तूफानद्राक्षा* = अगूरप्रतिपदा = पड़वा तिथि
तनया = पुत्रीधरा* = पृथ्वीप्रतिभा = प्रत्युत्पन्न बुद्धि
तन्द्रा* = ऊँघनाधारणा = विचारप्रतिमा = मूर्ति
तपस्या = तपस्याधारा* = धारप्रतिष्ठा = इज्जत
तमिस्रा* = अन्धेरी रातनवोढा = नवविवाहिताप्रभा* = दीप्ति
तारा* = तारानासा = नासिकाप्रसन्नता = खुशी
तितिक्षा* = सहनशीलतानित्यता = सदा होनाप्रसूता = प्रसूत हुई
तुला = तराजूनिद्रा* = नींदप्रहेलिका = पहेली
तृषा* = प्यासनिन्दा = शिकायतबाधा = रुकावट
तृष्णा = लालचनिशा = रात्रिबुभुक्षा* = भूख
त्रपा* = लज्जानिष्ठा = स्थितिभाषा* = बोली
त्रिपथगा = गङ्गानौका = किश्तीभ्रातृजाया = भ्रातृपत्नी
त्रियामा* = रात्रिपताका = झण्डीमज्जा = अस्थिसार
त्रेता = त्रेतायुगपतिव्रता = पतिव्रतामञ्जूषा* = पेटी
त्वरा* = शीघ्रतापद्मा = लक्ष्मीमथुरा* = प्रसिद्ध नगरी
दया = रहमपरम्परा* = सिलसिलामदिरा* = शराब
दशा = हालतपरिचर्या* = सेवामन्दुरा* = अश्वशाला
दंष्ट्रा* = दाढ़परीक्षा* = जाँचमरीचिका = मृगतृष्णा
दारा* = स्त्री¹पाठशाला = विद्यालयमाया = प्रकृति, छल
१ संस्कृतसाहित्य में स्त्रीवाची 'दार' शब्द ही बहुधा प्रयुक्त होता है । तब यह अदन्त
पुंल्लिङ्ग तथा नित्यबहुवचनान्त हुआ करता है । यथा—
आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद्धनैरपि ।
आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि ॥ (महाभारत १.१५६ २७)
दशरथदारानधिष्ठाय भगवान् वसिष्ठः प्राप्त । (उत्तररामचरित, अङ्क ४)
एते वयममी दाराः । (कुमार० ६ ६३)
परन्तु यह क्वचित् आबन्त भी मिलता है । तब यह बहुवचनान्त नहीं होता ।
यथा—
क्रोडा हारा तथा दारा त्रय एते यथाक्रमम् ।
क्रोडे हारे च दारेषु शब्दाः प्रोक्ता मनीषिभिः ॥

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २६१ शब्द — अर्थ | शब्द — अर्थ | शब्द — अर्थ माला = माला | वन्ध्या = वाञ्झ | शारदा = सरस्वती मुद्रा* = मोहर | वरटा = हंस-मादा | शाला = घर मूषा* = कुठाली | वर्त्तिका = बटेर | शिक्षा* = उपदेश मृत्सा = अच्छी मिट्टी | वसा = चरबी | शिञ्जा = भूषणध्वनि मृत्स्ना = अच्छी मिट्टी | वसुधा = पृथ्वी | शिला = पत्थर मृद्वीका = द्राक्षा | वाटिका = फुलबगिया | शिवा = दुर्गा, गीदड़ी मेखला = कमरबन्द | वात्या = आंधी | शिविका = पालकी यवनिका = पर्दा | वामा = सुन्दरी | शोभा = चमक यातना = तीव्र वेदना | वाराङ्गना = वेश्या | श्रद्धा = विश्वास यात्रा* = प्रस्थान | वार्त्ता = संवाद | श्लाघा = प्रशंसा रक्षा* = पालना | वालुका = रेत | सङ्ख्या = सङ्ख्या रचना = बनाना, कृति | विचिकित्सा = संशय | सञ्ज्ञा = नाम रजस्वला = रजस्वला स्त्री | विजया = भांग | सत्क्रिया* = सत्कार रथ्या = गली | विद्या = विद्या | सधवा = जीवितभर्तृका रसना = जीभ | विधवा = पतिरहिता | सन्ध्या = साझ राका* = पूर्णमासी | विसूचिका = हैज़ा रोग | सपर्या* = सेवा राधा = प्रसिद्ध गोपी | विष्ठा = टट्टी, मल | सभा = सभा रुजा = रोग, पीड़ा | वीणा = वाद्यविशेष | समझ = यश रेखा* = लकीर | वेदना = दुःख | सरघा* = मधुमक्खी लक्षणा = शक्ति-विशेष | वेला = समुद्रतट | सरटा = छिपकली लता = वेल | वेश्या = पण्य-स्त्री | सहायता = मदद लाक्षा* = लाख | व्यथा = दुःख | सहिष्णुता = सहनशीलता लालसा = अभिलाषा | व्यवस्था = नियम | सास्ना = गलकम्बल लाला = लार | शकुन्तला = दुष्यन्त-पत्नी | सीमा¹ = हद लिप्सा = लाभेच्छा | शङ्का = शक | सुता = लड़की लीला = क्रीडा | शय्या = शयनस्थान | सुधा = अमृत लेखा = रेखा | शर्करा* = शक्कर | सुरा* = शराब वडवा = घोड़ी | शलाका = सलाई | सुषमा* = बहुत शोभा वनिता = स्त्री | शाखा = टहनी | सेना = फ़ौज श्रीमद्भागवत में एकवचनान्त दारा शब्द प्रयुक्त भी हुआ है। यथा— अप्येकाम् आत्मनो दारां नृणां स्वत्वग्रहो यथा। (भागवत ७.१४.११) श्रीहेमचन्द्राचार्य 'दार' शब्द को एकवचनान्त भी मानते हैं। उन्होंने किसी ग्रन्थ का प्रयोग भी उद्धृत किया है—धर्मप्रजासम्पन्ने दारे नान्यं कुर्वीत इति। १. यह शब्द नकारान्त स्त्रीलिङ्ग भी होता है।

२६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ सेवा=सेवा | स्पृहा*=इच्छा | हिक्का=हिचकी सोदर्या*=सगी बहन | स्वतन्त्रता=आज़ादी | हिमाद्रिजा=पार्वती स्पर्धा=बराबरी करना | हरिद्रा*=हल्दी | हेषा*=हिनहिनाहट २६२—होरा*=एक घण्टा। आकारान्तस्त्रीलिङ्गो मे 'रमा' शब्द की अपेक्षा सर्वनाम तथा कुछ अन्य शब्दो मे थोडा अन्तर पडता है, अब उस प्रसग मे प्रथम सर्वनामशब्दो का वर्णन करते हैं— 'सर्व' शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा मे 'टाप्' प्रत्यय करने से 'सर्वा' शब्द निष्पन्न होता है। लिङ्गविशिष्टपरिभाषा¹ से इस की भी सर्वत्र सर्वनामसञ्ज्ञा हो जाती है। ङित् विभक्तियो और आम् को छोड़ कर शेष सब विभक्तियो मे इस की 'रमा'शब्दवत् प्रक्रिया तथा उच्चारण होता है। 'सर्वा+ए' (ङे)। यहा याडाप (२१६) द्वारा याट् का आगम प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि सूत्रम्—(२२०) सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च ।७।३।११४॥ आवन्तात् सर्वनाम्नो ङित स्याट् स्याद्, आपश्च ह्रस्व.। सर्वस्यै। सर्वस्याः २। सर्वासाम्। सर्वस्याम्। शेष रमावत् ॥ अर्थः—आवन्त सर्वनाम से परे ङित् प्रत्ययो को 'स्याट्' का आगम हो और साथ ही आवन्त अङ्ग के आप् को ह्रस्व भी हो। व्याख्या—आपः ।५।१। (याडापः से)। सर्वनाम्न ।५।१। ङित ।६।१। (घेङिति से विभक्तिविपरिणाम द्वारा)। स्याट् ।१।१। ह्रस्व ।१।१। [सूत्रपाठे तु—झलां जशोऽन्ते इति जश्त्वे झयो होऽन्यतरस्याम् इति पूर्वसवर्णत्वे च कृते 'स्याड्ढ्रस्व' इति प्रयोग प्रयुज्यते] । च इत्यव्ययपदम्। 'सर्वनाम्न' का विशेषण होने मे 'आप' मे १ युवा खलति-पलित-वलिन-जरतीभि (२ १ ६७) इस सूत्र द्वारा 'युवन्' शब्द का 'खलति, पलित, वलिन, जरती' इन समानाधिकरण शब्दो के साथ कर्मधारयसमास बताया गया है। इन शब्दो मे 'जरती' शब्द स्त्रीलिङ्ग है। 'जरती' शब्द का 'युवन्' इस पुल्लिङ्ग के साथ तब तक सामानाधिकरण्य नही हो सकता जब तक 'युवन्' को 'युवति' न बना दिया जाये। इस प्रकार 'जरती' शब्द के ग्रहण से यह प्रतीत होता है कि आचार्य पाणिनि—'युवन्' के ग्रहण से 'युवति' इस स्त्रीलिङ्ग का भी ग्रहण चाहते हैं। अत एव यह परिभाषा निष्पन्न होती है—प्रातिपदिकग्रहणे लिङ्ग- विशिष्टस्यापि ग्रहणम्। अर्थात् प्रातिपदिक के ग्रहण होने पर उस प्रातिपदिक के विशेष लिङ्गो का भी ग्रहण हो जाता है। यथा—'युवन्' के ग्रहण से 'युवति' का ग्रहण होता है। इसी प्रकार सर्वनामसञ्ज्ञा करते समय सर्वादिगण मे सर्वा आदि स्त्रीलिङ्गो का भी समावेश समझ लेना चाहिये। इस परिभाषा का सङ्क्षिप्त नाम लिङ्गविशिष्टपरिभाषा है।

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २६३ तदन्तविधि हो कर ‘आवन्तात्’ बन जाता है। अर्थ करते समय इस की आवृत्ति की जाती है। अर्थः— (आपः = आवन्तात्) आवन्त (सर्वनाम्नः) सर्वनाम से परे (ङितः) ङित् वचनों का अवयव (स्याट्) ‘स्याट्’ हो जाता है (च) और साथ ही (आपः= आवन्तस्य) आवन्त के स्थान पर (ह्रस्वः) ह्रस्व आदेश हो जाता है। ङे, ङसिं, ङस्, ङि—ये चार ङित् विभक्तियां हैं; इन में याट् का आगम प्राप्त था, इस सूत्र से स्याट् का आगम विधान किया जाता है। अतः यह सूत्र याडापः (२१६) सूत्र का अपवाद है। ‘स्याट्’ में टकार इत्सञ्ज्ञक है, अतः टित् होने से ङित् प्रत्यय का आद्यवयव होता है। अलोऽन्त्यपरिभाषा से आवन्त के अन्त्य आकार को ह्रस्व होता है। ‘सर्वा+ए’ (ङे) यहां प्रकृतसूत्र से ‘स्याट्’ का आगम तथा आप् को ह्रस्व हो कर ‘सर्व+स्या ए’ हुआ। अब वृद्धिरेचि (३३) सूत्र से वृद्धि एकादेश करने पर ‘सर्वस्यै’ प्रयोग सिद्ध होता है। पञ्चमी वा षष्ठी के एकवचन में ‘सर्वा+अस्’ (ङसिं वा ङस्)। अब स्याट् का आगम और आप् को ह्रस्व हो कर सवर्णदीर्घ करने से—‘सर्वस्याः’। षष्ठी के बहुवचन में ‘सर्वा+आम्’ इस स्थिति में आमि सर्वनाम्नः सुँट् (१५५) से सुँट् आगम हो कर अनुबन्धलोप करने से ‘सर्वासाम्’ प्रयोग सिद्ध होता है। ‘ङि’ में ‘सर्वा+ङि’ इस दशा में ङेराम्नद्याम्नीभ्यः (१६८) से ङि को आम् आदेश और प्रकृतसूत्र से ‘स्याट्’ का आगम और आप् को ह्रस्व हो कर सवर्णदीर्घ करने से ‘सर्वस्याम्’ रूप बनता है। ‘सर्वा’ शब्द की रूपमाला यथा— *प्र० सर्वा सर्वे सर्वाः प० सर्वस्याः सर्वाभ्याम् सर्वाभ्यः द्वि० सर्वाम् ,, ,, ष० ,, सर्वयोः सर्वासाम् तृ० सर्वया सर्वाभ्याम् सर्वाभिः स० सर्वस्याम् ,, सर्वासु च० सर्वस्यै ,, सर्वाभ्यः सं० हे सर्वै! हे सर्वे! हे सर्वाः! [लघु०] एवं विश्वादय आवन्ताः ॥ अर्थः—इसीप्रकार ‘विश्वा’ आदि आवन्त सर्वनामों की प्रक्रिया होती है। व्याख्या—निम्नलिखित आवन्त सर्वनामों के रूप ‘सर्वा’ शब्दवत् होते हैं— १. विश्वा। २. उभा¹। ३. कतरा²। ४. कतमा। ५. यतरा। ६. यतमा। १. ‘उभा’ शब्द सदा द्विवचनान्त ही प्रयुक्त होता है। अतः यहां इस में कोई सर्व- नामकार्य नहीं होता। अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम् (पञ्चतन्त्र १.४३८)। ‘उभय’ शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा में ‘टाप्’ प्रत्यय नहीं होता किन्तु गौरादिगण में पाठ होने के कारण अथवा तयप्प्रत्ययान्त होने से टिड्ढाणञ्० (१२४७) सूत्र से ‘ङीप्’ प्रत्यय हो कर ‘उभयी’ शब्द निष्पन्न होता है। इस का द्विवचन में प्रयोग नहीं होता, उच्चारण ‘नदी’ शब्दवत् होता है। उभयीं सिद्धिमु- भाववापतुः (रघुवंश ८.२३)। २. ‘कतरा’ आदि आठ शब्द डतरप्रत्ययान्त और डतमप्रत्ययान्त हैं। इन का पीछे

३६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् ७. ततरा । ८. ततमा । ६. एकतरा । १०. एकतमा । ११. अन्या । १२. अन्यतरा¹ । १३. इतरा । १४. त्वा । १५ नेमा² । १६. समा³ । १७ सिमा । १८. पूर्वा⁴ । १६. परा । २०. अवरा । २१. दक्षिणा । २२. उत्तरा । २३ अपरा । २४. अधरा । २५. स्वा । २६ अन्तरा । २७ एका⁵ । उत्तरस्याश्च पूर्वस्याश्च दिशोर अन्तराला दिक् = उत्तरपूर्वा⁶ । दिङ्नामान्य- न्तराले (२२२६) इति बहुव्रीहि, सर्वनाम्नो वृत्तिमात्रे पुंवद्भाव. इति पुंवद्भाव । १. पूर्व, २ पश्चिम, ३ उत्तर और ४ दक्षिण ये चार दिशाए होती हैं । दो दिशाओ के बीच मे आने वाला कोना 'उपदिशा' कहलाता है । इस प्रकार उपदिशाए भी चार हो जाती हैं । यथा— (१६६) पृष्ठ पर स्पष्टीकरण कर चुके हैं । १. इसे इतरप्रत्ययान्त नही समझना चाहिये । 'अन्य' शब्द से डतर और डतम प्रत्ययो का विधान नही । अन्यतर और अन्यतम शब्द स्वतन्त्र अव्युत्पन्न है । इन मे से प्रथम 'अन्यतर' शब्द सर्वादिगण मे पठित होने से सर्वनामसञ्ज्ञक है, दूसरा नही । अत 'अन्यतमा' शब्द का 'रमा'शब्दवत् उच्चारण होता है । २. 'अर्ध' अर्थ मे ही इस की सर्वनामत्ता इष्ट है, अन्यथा 'रमा'शब्दवत् उच्चारण होगा । प्रथमचरम० (१६०) सूत्र का स्त्रीलिङ्ग मे कुछ प्रभाव नही पडता । ३. 'सर्व' अर्थ मे ही सर्वनामत्ता इष्ट है । 'तुल्य' अर्थ मे 'रमा'शब्दवत् उच्चारण होगा । ४. पूर्वा' आदि नौ शब्दो का उच्चारण सर्वावत् ही होता है, कुछ भी अन्तर नही पडता । यद्यपि जस् मे इन की सर्वनामसञ्ज्ञा (१५६, १५७, १५८) सूत्रो से विकल्प कर के होती है, तथापि इस से यहा स्त्रीलिङ्ग मे कोई भेद नही पडता; क्योकि यहा अदन्त न होने से जसः शी (१५२) सूत्र प्रवृत्त नही हो सकता । ध्यान रहे कि पूर्वादिभ्यो नवभ्यो वा (१५६) सूत्र ङसिं और ङि मे सर्वनाम- सञ्ज्ञा का विकल्प नही करता किन्तु स्मात् और स्मिन् आदेशो का ही विकल्प करता है। सर्वनामसञ्ज्ञा तो—इन मे भी नित्य बनी रहती है। अत एव 'पूर्वस्या', पूर्वस्याम्' आदि प्रयोगो मे सर्वनामतामूलक स्याट् आदि कार्य करने मे कोई बाधा उपस्थित नही होती । पाणिनि की बुद्धिमत्ता का यह एक ज्वलन्त प्रमाण है। ५ सङ्ख्येयवाची 'एका' शब्द एकवचनान्त ही प्रयुक्त होगा । अन्य, मुख्य आदि अर्थों मे इस का सब वचनो मे उच्चारण होगा । ६. प्राय. सब वैयाकरण यहा 'उत्तरस्याश्च पूर्वस्याश्च दिशोर्यदन्तरालम्' इस प्रकार विग्रह करते हैं । परन्तु बालको के लिये यह विग्रह कुछ कठिन है, क्योकि वे 'यद् अन्तरालम्' इस नपुंसक का 'उत्तरपूर्वा' इस स्त्रीलिङ्ग के साथ सम्बन्ध नही समझ सकते । अत उन के सौकर्यार्थ उपर्युक्त विग्रह रखा गया है ।

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २६५ उत्तर और पूर्व दिशा की मध्यवर्ती उपदिशा 'उत्तरपूर्वा' कहलाती है। 'उत्तर- पूर्वा' शब्द की प्रथम तीन विभक्तियों में रमाशब्दवत् प्रक्रिया होती है। चतुर्थी के एकवचन में 'उत्तरपूर्वा + ए' (ङे) इस स्थिति में सर्वादीनि सर्व- नामानि (१५१) सूत्र से नित्य सर्वनामसञ्ज्ञा होने के कारण सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च (२२०) से स्याट् का आगम और आप् को ह्रस्व नित्य प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र से सर्वनामसञ्ज्ञा का विकल्प किया जाता है— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(२२१) विभाषा दिक्समासे बहुव्रीहौ ।१।१।२७॥ सर्वनामता वा। उत्तरपूर्वस्यै, उत्तरपूर्वायै ॥ अर्थः—दिशाओं के बहुव्रीहिसमास में सर्वादि विकल्प से सर्वनामसञ्ज्ञक हों। व्याख्या—दिक्समासे ।७।१। बहुव्रीहौ ।७।१। सर्वादीनि ।१।३। विभाषा ।१।१। सर्वनामानि ।१।३। (सर्वादीनि सर्वनामानि से)। समासः—दिशां समासः = दिक्- समासः, तस्मिन् = दिक्समासे, षष्ठीतत्पुरुषः। अर्थः—(दिक्समासे बहुव्रीहौ) दिशाओं के बहुव्रीहिसमास में (सर्वादीनि) सर्वादिगणपठित शब्द (विभाषा) विकल्प कर के (सर्वनामानि) सर्वनामसञ्ज्ञक होते हैं। दिशाओं का बहुव्रीहिसमास दिङ्नामान्यन्तराले (२.२.२६) सूत्र से विधान किया जाता है। यहां उसी का ग्रहण अभीष्ट है। 'उत्तरपूर्वा' शब्द में दिशाओं का बहुव्रीहिसमास हुआ है, अतः प्रकृतसूत्र से इस की विकल्प कर के सर्वनामसञ्ज्ञा होगी। सर्वनामसञ्ज्ञापक्ष में सर्वाशब्दवत् स्याट् का आगम और आप् को ह्रस्व आदि कार्य होंगे। सर्वनामसञ्ज्ञा के अभाव में रमा- शब्दवत् याट् का आगम आदि कार्य होगे। आम् में सर्वनामपक्ष में सुट् आगम और तदभावपक्ष में नुट् आगम विशेष होगा। 'उत्तरपूर्वा' शब्द की रूपमाला यथा—

३६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् प्र० उत्तरपूर्वा उत्तरपूर्वे उत्तरपूर्वा द्वि० उत्तरपूर्वाम् " " तृ० उत्तरपूर्वया उत्तरपूर्वाभ्याम् उत्तरपूर्वाभिः च० उत्तरपूर्वस्यै, उत्तरपूर्वायै " उत्तरपूर्वाभ्यः प० उत्तरपूर्वस्या ,उत्तरपूर्वाया " " ष० " " उत्तरपूर्वयो उत्तरपूर्वासाम्,उत्तरपूर्वाणाम् स० उत्तरपूर्वस्याम्,उत्तरपूर्वायाम् " उत्तरपूर्वासु सं० हे उत्तरपूर्वे ! हे उत्तरपूर्वे ! हे उत्तरपूर्वा ! इसी प्रकार—दक्षिणपूर्वा, पूर्वोत्तरा, पश्चिमोत्तरा, पश्चिमदक्षिणा, पूर्वदक्षिणा आदि शब्दों के उच्चारण होते हैं¹। [लघु०] तीयस्येति वा सञ्ज्ञा । द्वितीयस्यै, द्वितीयायै । एव तृतीया ॥ व्याख्या—तीयस्य ङित्सु वा (वा० १६) द्वारा तीयप्रत्ययान्त द्वितीया (दूसरी) और तृतीया (तीसरी) शब्द केवल ङित् वचनों में ही विकल्प से सर्वनामसञ्ज्ञक होते हैं। अत 'ङे, ङसिं, ङस्, ङि' इन चार विभक्तियों मे दो दो रूप बनते हैं; अर्थात् जहा सर्वनामसञ्ज्ञा होती है वहा सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च (२२०) से स्याट् का आगम और आप् को ह्रस्व हो जाता है। सर्वनामसञ्ज्ञा के अभाव मे याडापः (२१६) से याट् का आगम हो जाता है। इस प्रकार ङिद्वचनों मे दो दो रूप बनते हैं। 'द्वितीया' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० द्वितीया द्वितीये द्वितीया द्वि० द्वितीयाम् " " तृ० द्वितीया द्वितीयाभ्याम् द्वितीयाभिः च० द्वितीयस्यै,द्वितीयायै " द्वितीयाभ्यः प० द्वितीयस्या.,द्वितीयायाः " " ष० " " द्वितीययो द्वितीयानाम् स० द्वितीयस्याम्, द्वितीयायाम् " द्वितीयासु सं० हे द्वितीये ! हे द्वितीये ! हे द्वितीया ! इसी प्रकार 'तृतीया' शब्द का उच्चारण होता है। ध्यान रहे कि तीयस्य ङित्सु वा (वा० १६) द्वारा आम् मे सर्वनामता नहीं होती; अतः पक्ष में सुँट् का यागम नही होता। 'उत्तरपूर्वा' और 'द्वितीया' के उच्चारण में यही अन्तर है। १. दिङ्नामान्यन्तराले (२ २.२६) सूत्र द्वारा होने वाले बहुव्रीहिसमास में पूर्वनिपात का कोई नियम नही होता। अत एव—दक्षिणपूर्वा, पूर्वदक्षिणा। पश्चिमदक्षिणा, दक्षिणपश्चिमा। पश्चिमोत्तरा, उत्तरपश्चिमा। उत्तरपूर्वा, पूर्वोत्तरा। इत्यादि रूप काशिका (२२२६) में दिये गये हैं। नक्षत्रत्रितय पादमाश्रित पूर्वदक्षिणम् (मार्कण्डेयपुराण ५८ २०) इत्यादि वचन भी इस मे प्रमाण हैं।

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २६७ [लघु०] अम्बार्थ० (१६५) इति ह्रस्वः—हे अम्ब!, हे अवक!, हे अल्ल !॥ व्याख्या—अम्बा, अक्का, अल्ला आदि शब्दों का अर्थ 'माता = पार्वती' है। इन की प्रक्रिया रमाशब्दवत् होती है; केवल सम्बुद्धि में ही कुछ विशेष है। सम्बुद्धि में अम्बार्थनद्योर्ह्रस्वः (१६५) से ह्रस्व हो कर एङ्ह्रस्वात् सम्बुद्धेः (१३४) से सुंलोप हो जाता है। इस प्रकार 'हे अम्ब!, हे अवक!, हे अल्ल !' आदि प्रयोग सिद्ध होते हैं। वक्तव्य—ध्यान रहे कि महाभाष्य में दो अच् वाले अम्बार्थकों को ही ह्रस्व करना बताया है। अम्बाडा, अम्बाला, अम्बिका आदि शब्द दो अच् वाले नहीं अपितु दो से अधिक अचों वाले हैं; अतः अम्बार्थक होने पर भी इन को ह्रस्व न होगा। हे अम्बाडे !, हे अम्बाले !, हे अम्बिके ! इत्यादिप्रकारेण रूप बनेंगे [दृश्यतां (७.३.१०७) सूत्रस्थं महाभाष्यम्—अम्बार्थे द्वयक्षरं यदि इति। सिद्धान्तकौमुद्यान्तु असंयुक्ता ये डलकास्तद्वतां ह्रस्वो न इति वार्त्तिकम्पठितम्, तदपि भाष्यानुसारि। परं सरलः पन्था- स्तु भाष्योक्त एव]। 'अम्बा' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० अम्बा अम्बे अम्बाः प० अम्बायाः अम्बाभ्याम् अम्बाभ्यः द्वि० अम्बाम् " " ष० " अम्बयोः अम्बानाम् तृ० अम्बया अम्बाभ्याम् अम्बाभिः स० अम्बायाम् " अम्बासु च० अम्बायै " अम्बाभ्यः सं० हे अम्ब ! हे अम्बे ! हे अम्बाः! इसी प्रकार—अक्का, अल्ला आदि शब्दों के रूप बनते हैं। नोट—'अल्ला' शब्द मुसलमानों ने बेतरह पकड़ रखा है; अम्बा, अल्ला आदि शब्द दुर्गा (शक्ति) के नाम माने जाते हैं। इसलिये सम्भव है कि मुसलमान शाक्त हिन्दुओं से निकले हों और कालक्रम से आचारादिभिन्नता के कारण इन से पृथक् हो गये हों—इस में आश्चर्य नहीं। इसी प्रकार ईसाइयों का 'गिरजाघर' भी शायद 'गिरिजा-गृह' ही हो; वे भी शाक्तों से निकले हों। [लघु०] जरा, जरसौ इत्यादि। पक्षे हलादौ च रमावत्॥ व्याख्या—जृष् वयोहानौ (दिवा० परस्मै०) धातु से स्त्रियाम्० (३.३.९४) : के अधिकार में ष्रिद्भिदादिभ्योऽङ् (३.३.१०४) सूत्र से अङ् प्रत्यय तथा ऋदृशोऽङि गुणः (७.४.१६) से अर् गुण हो कर टाप् प्रत्यय करने से 'जरा' शब्द निष्पन्न होता है। 'जरा' शब्द का अर्थ है—'बुढ़ापा'। अजादि विभक्तियों में सर्वत्र सर्वप्रथम जराया जरसन्यतरस्याम् (१६१) सूत्र से 'जरा' के स्थान पर 'जरस्' आदेश हो जाता है। जरस् के अभाव में रमाशब्दवत् प्रक्रिया होती है। रूपमाला यथा— प्र० जरा जरसौ, जरे जरसः, जराः द्वि० जरसम्, जराम् " " " " तृ० जरसा, जरया जराभ्याम् जराभिः

२६८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् च० जरसे, जरायै जराभ्याम् जराभ्यः प० जरसः, जरायाः जराभ्याम् जराभ्यः ष० " " जरसोः, जरयोः जरसाम्, जराणाम् स० जरसि, जरायाम् " " जरासु सं० हे जरे ! हे जरसौ!, हे जरे ! हे जरसः!, हे जराः ! नोट—'जरा+औ' यहां परत्व के कारण शी आदेश से पूर्व जरस् आदेश हो जाता है; यदि प्रथम शी आदेश होता तो 'जरसी' यह अनिष्ट रूप बन जाता । एवम् आगे भी जान लेना चाहिये । [लघु०] गोपा विश्वपावत् ॥ व्याख्या—गां पाति = रक्षतीति गोपाः । 'गो'कर्मोपपदात् पा रक्षणे (अदा० प०) इत्यस्माद्धातोः क्विपि लौकिके वा विचि 'गोपा'शब्दो निष्पद्यते । गौओ की रक्षा करने वाली स्त्री 'गोपा' कहाती है । 'गोपा' के अन्त में 'पा' धातु है आप् (टाप्) नही । 'गोपा+सुँ' । आवन्त न होने से हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सुँलोप नही होता । सकार को रुत्व विसर्ग हो कर—'गोपाः' सिद्ध होता है । 'गोपा+औ' यहां भी आवन्त न होने से औङ आपः (२१६) से शी आदेश । नही होता । पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होने पर उस का भी दीर्घाज्जसि च (१६२) से निषेध हो जाता है । अब वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश हो कर—'गोपौ' सिद्ध होता है । 'गोपा+अस्' (जस्) यहां भी पूर्ववत् पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध हो जाता है । तब अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ हो कर—'गोपाः' रूप बनता है । गोपा+अम् = गोपाम् । अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप होता है । 'गोपा+अस्' (शस्) यहां भसञ्ज्ञक आकार का आतो धातोः (१६७) से लोप हो कर 'गोपः' प्रयोग बनता है । इसी प्रकार आगे सर्वत्र भसञ्ज्ञको मे आकार का लोप हो जाता है । रूपमाला यथा— प्र० गोपा गोपौ गोपा | प० गोपः* गोपाभ्याम् गोपाभ्यः द्वि० गोपाम् " गोपः* | ष० " गोपोः* गोपाम्* तृ० गोपा* गोपाभ्याम् गोपाभिः | स० गोपि* " * गोपासु च० गोपे* " गोपाभ्यः | सं० हे गोपा ! हे गोपौ ! हे गोपाः !

  • इन स्थानो पर भसञ्ज्ञा हो कर आकार का लोप हो जाता है । इस की सम्पूर्ण प्रक्रिया अजन्तपुंल्लिङ्गान्तर्गत 'विश्वपा' शब्द के समान होती है । नोट—'क' प्रत्यय से सिद्ध 'गोप' शब्द से स्त्रीत्वविवक्षा में जातेरस्त्री० (१२६५) सूत्र से ङीष् प्रत्यय हो कर 'गोपी' शब्द बनता है । इस का अर्थ है—गोप जाति की स्त्री । इस का उच्चारण 'नदी' शब्द के समान होता है । (यहां आकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दो का विवेचन समाप्त होता है ।) ः ० ः

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २६६ अब ह्रस्व इकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का वर्णन करते हैं— [लघु०] मतीः। मत्या॥ व्याख्या—मनँ ज्ञाने(दिवा० आ०) धातु से 'क्तिन्' प्रत्यय करने पर 'मति' शब्द सिद्ध होता है। मन्यतेऽनयेति मतिः। मननं वा मतिः। बुद्धि या ज्ञान को 'मति' कहते हैं। इस की प्रक्रिया ङिद्वचनों से अन्यत्र प्रायः 'हरि' शब्द के समान होती है। तथाहि— मति+सुँ = मतिः। सकार को रुँत्व तथा रेफ को विसर्ग हो जाता है। मति+औ = मती। प्रथमयोः० (१२६) से पूर्वसवर्णदीर्घ हो जाता है। 'मति+अस्' (जस्) इस स्थिति में जसि च (१६८) से इकार को एकार गुण हो कर अय्-आदेश करने से 'मतयः' रूप सिद्ध होता है। द्वितीया के बहुवचन में 'मति+अस्' (शस्) इस दशा में पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर सकार को रुँत्व विसर्ग हो जाते हैं—मतीः। ध्यान रहे कि तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७) सूत्र में 'पुंसि' कहने से यहां स्त्रीलिङ्ग में नकार आदेश नहीं होता। 'मति+आ' (टा) यहां घिसञ्ज्ञा रहने पर भी आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) द्वारा टा को ना नहीं होता; 'अस्त्रियाम्' कथन के कारण उस की स्त्रीलिङ्ग में प्रवृत्ति नहीं होती। इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'मत्या' सिद्ध होता है। 'मति+ए' (ङे) यहां घिसञ्ज्ञा होने से घेर्ङिति (१७२) द्वारा गुण प्राप्त होता है। अब अग्रिमसूत्र द्वारा पक्ष में नदीसञ्ज्ञा का विधान करते हैं— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(२२२) ङिति ह्रस्वश्च ।१।४।६।। इयँडुवँङ्स्थानौ स्त्रीशब्दभिन्नौ नित्यस्त्रीलिङ्गावीदूतौ, ह्रस्वौ च इवर्णोवर्णां स्त्रियां वा नदीसञ्ज्ञौ स्तो ङिति। मत्यै, मतये। मत्याः २, मतेः २॥ अर्थः—'स्त्री' शब्द को छोड़ कर इयँङुवँङ्स्थानी नित्यस्त्रीलिङ्ग ईकार ऊकार ङिद्वचनों में विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञक होते हैं। किञ्च—स्त्रीलिङ्ग में ह्रस्व इका- रान्त और ह्रस्व उकारान्त शब्द भी ङिद्वचनों में विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञक होते हैं। व्याख्या—ङिति ।७।१। ह्रस्वः ।१।१। च इत्यव्ययपदम्। इस सूत्र के दो खण्ड हैं। प्रथम यथा—अस्त्री ।१।१। इयँडुवँङ्स्थानौ ।१।२। (नेयँडुवँङ्स्थानावस्त्री से)। स्त्र्याख्यौ ।१।२। यू ।१।२। नदी ।१।१। (यू स्त्र्याख्यौ नदी से)। वा इत्यव्ययपदम्। (वाऽऽमि से)। ङिति ।७।१। समासः—न स्त्री=अस्त्री, नञ्तत्पुरुषः। स्त्रीशब्दं वर्ज- यित्वेत्यर्थः। इयँङ् च उवंङ् च=इयँडुवँङौ, इतरेतरद्वन्द्वः। इयँडुवँङोः स्थानं स्थिति- र्ययोस्तौ इयँडुवँङ्स्थानौ, बहुव्रीहिसमासः। स्त्रियमाचक्षाते इति स्त्र्याख्यौ, नित्यस्त्री- लिङ्गादित्यर्थः। ईश्च ऊश्च=यू, इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः—(अस्त्री) 'स्त्री' शब्द को छोड़ कर (इयँडुवँङ्स्थानी) जिन के स्थान पर इयँङ् उवँङ् आदेश होते हैं ऐसे (स्त्र्याख्यौ) नित्यस्त्रीलिङ्गी (यू) ईकार और ऊकार (ङिति) ङिद्वचनों में (वा) विकल्प कर के (नदी) नदीसञ्ज्ञक होते हैं।

३०० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

भाव-जिस नित्यस्त्रीलिङ्ग शब्द के ईकार ऊकार के स्थान पर इयङ् उवङ् आदेश हों उन की ङिद्वचनों में विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञा हो जाती है। परन्तु यह नियम 'स्त्री' शब्द पर लागू नहीं होता। उदाहरण यथा- श्री, भ्रू' यहां क्रमशः ईकार ऊकार नित्यस्त्रीलिङ्गी हैं, इन के स्थान पर क्रमशः इयङ् उवङ् आदेश भी होते हैं, अतः ङित् विभक्तियों में इन की विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञा होगी। सूत्र के इस प्रथम खण्ड का उपयोग आगे इसी प्रकरण में 'श्री' आदि शब्दों में किया जायेगा। अब 'मति'शब्दोपयोगी द्वितीय खण्ड की व्याख्या करते हैं- स्त्र्याख्यौ ।१।२। ह्रस्व ।१।१। च इत्यव्ययपदम्। यू ।१।२। वा इत्यव्ययपदम्। नदी ।१।१। ङिति ।७।१। समास-स्त्रियम् आचक्षाते इति स्त्र्याख्यौ, स्त्रीलिङ्गा- न्वित्यर्थः। अत्र नित्यस्त्रीत्वमविवक्षितम्। 'ह्रस्व' इति यू' इत्यनेन सम्बध्यते। इश्च उश्च = यू। ह्रस्वौ इदुतावित्यर्थः। अर्थ-(स्त्र्याख्यौ) स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान (ह्रस्व. = ह्रस्वौ) ह्रस्व (यू) इकार उकार (च) भी (ङिति) ङित् परे होने पर (वा) विकल्प कर के (नदी) नदीसञ्ज्ञक होते हैं। भाव-यदि स्त्रीलिङ्ग में इकारान्त या उकारान्त शब्द आयेगा तो ङिद्वचनों में उस की विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञा हो जायेगी। यहां यह स्मरण रखना चाहिये कि ह्रस्व इकारान्त और ह्रस्व उकारान्त शब्द चाहे नित्यस्त्रीलिङ्ग हों या न हों, केवल स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान होने मात्र से ही उन की नदीसञ्ज्ञा हो जायेगी। इस नियम के प्रभाव से स्त्रीलिङ्ग में प्रत्येक ह्रस्व इकारान्त और ह्रस्व उका- रान्त शब्द ङिद्वचनों में विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञक हो जाता है। नदीत्वपक्ष में आट् आदि नदीकार्य और तदभावपक्ष में शेषो घ्यसखि (१७०) से घिसञ्ज्ञा हो कर गुण आदि घिकार्य होते हैं। 'मति + ङे' इस दशा में ह्रस्व इकारान्त स्त्रीलिङ्ग मति शब्द से परे ङित् प्रत्यय ङे के विद्यमान होने से वैकल्पिक नदीसञ्ज्ञा हुई। नदीत्वपक्ष में आण्नद्यः (१६६) द्वारा ङित् को आट् आगम, आटश्च (१६७) से वृद्धि तथा इकार को यण् करने से 'मत्यै' रूप बनता है। नदीसञ्ज्ञा के अभाव में घिसञ्ज्ञा हो जाती है। और तब घेर्ङिति (१७२) से इकार को एकार गुण हो कर अय् आदेश करने पर 'मतये' रूप बनता है। पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन में 'मति + ङस्' इस अवस्था में नदीसञ्ज्ञा, आट् का आगम, वृद्धि, यण् और सकार को रुत्व विसर्ग हो कर 'मत्याः' रूप सिद्ध होता है। नदीसञ्ज्ञा के अभाव में घिसञ्ज्ञा, गुण और ङसिङसोश्च (१७३) से पूर्व- रूप हो कर 'मतेः' रूप निष्पन्न होता है। षष्ठीबहुवचन 'मति + आम्' में ह्रस्वनद्याप० (१४८) से ह्रस्वमूलक नुट् आगम हो नामि (१४६) से दीर्घ करने पर- 'मतीनाम्' । 'मति + ङि' (ङि) यहां नदीसञ्ज्ञा के पक्ष में ङेराम्नद्याम्नीभ्यः (१६८) से ङि को आम् तथा औत् (१८४) सूत्र द्वारा ङि को औकार युगपत् प्राप्त होते हैं।

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ३०१ दोनों सावकाश है। ङेराम्० (१६८) को 'गौर्याम्' आदि में तथा औत् (१८४) को 'सख्यौ, पत्यौ' आदि में अवकाश प्राप्त हो चुका है। विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) के अनुसार परकार्य औकार ही होना चाहिये । परन्तु यह अनिष्ट है, इस पर अग्रिम- सूत्र द्वारा पुनः आम् आदेश का विधान करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२२३) इदुद्भ्याम् ।७।३।११७॥ इदुद्भ्यां नदीसञ्ज्ञकाभ्यां परस्य ङेराम् । मत्याम्, मतौ। शेषं हरिवत् ॥ अर्थ:—नदीसञ्ज्ञक ह्रस्व इकार उकार से परे ङि को आम् आदेश हो । व्याख्या—नदीभ्याम् ।५।२। (ङेराम्नद्याम्नीभ्यः से वचनविपरिणाम द्वारा) । इदुद्भ्याम् ।५।२। ङेः ।६।१। आम् ।१।१। (ङेराम्० से) । समासः—इच्च उच्च = इदुतौ, ताभ्याम् = इदुद्भ्याम् । इतरेतरद्वन्द्वः । अर्थः—(नदीभ्याम्) नदीसञ्ज्ञक (इदुद्भ्याम्) ह्रस्व इकार और ह्रस्व उकार से परे (ङेः) ङि के स्थान पर (आम्) आम् आदेश हो जाता है। यह सूत्र औत् (१८४) सूत्र का अपवाद है ।¹ 'मति+ङि' यहां प्रकृतसूत्र मे ङि को आम् हो कर 'मति+आम्' हुआ । अब आण्नद्याः (१६६) से आट् आगम और ह्रस्वनद्यापः० (१४८) से नुट् आगम दोनों युगपत् प्राप्त होते हैं। परन्तु परत्व के कारण आट् का आगम हो जाता है—मति+ आट् आम् । आटश्च (१६७) से वृद्धि और इकार को यण् करने पर 'मत्याम्' प्रयोग सिद्ध होता है । नदीसञ्ज्ञा के अभाव में घिसञ्ज्ञा हो कर अच्छ घेः (१७४) से ङि को औकार और घि को अकार अन्तादेश हो कर वृद्धि एकादेश करने से 'मतौ' रूप सिद्ध होता है । हे मति+सुँ । यहां ह्रस्वस्य गुणः (१६६) से एकार गुण और एङ्ह्रस्वात्० (१३४) से सम्बुद्धि का लोप हो 'हे मते !' सिद्ध होता है। रूपमाला यथा— प्र० मतिः मती मतयः प० मत्याः,मतेः मतिभ्याम् मतिभ्यः द्वि० मतिम् ,, मतीः ष० ,, ,, मत्योः मतीनाम् तृ० मत्या मतिभ्याम् मतिभिः स० मत्याम्,मतौ ,, मतिषु च० मत्यै,मतये ,, मतिभ्यः सं० हे मते! हे मती! हे मतयः! [लघु०] एवं बुद्ध्यादयः ॥ अर्थः—इसी प्रकार बुद्धि आदि शब्दों की प्रक्रिया होती है । व्याख्या—बालकों के लिए मतिवत् कुछ उपयोगी शब्दों का संग्रह यहां दे रहे हैं । '*’ यह चिह्न णत्वप्रक्रिया का ज्ञापक है । शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ अङ्गुलि = अङ्गुल | अवनि = पृथ्वी | आकृष्टि = आकर्षण अपकृति = अपकार | आकृति = आकार | आर्ति = दुःख १. यहां यह ध्यान में रखना चाहिये कि औत् (१८४) सूत्र उत्सर्ग अर्थात् सामान्य- सूत्र है। इस के दो अपवाद हैं—अच्छ घेः (१७४) और इदुद्भ्याम् (२२३) ।