लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ३०१ दोनों सावकाश है। ङेराम्० (१६८) को 'गौर्याम्' आदि में तथा औत् (१८४) को 'सख्यौ, पत्यौ' आदि में अवकाश प्राप्त हो चुका है। विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) के अनुसार परकार्य औकार ही होना चाहिये । परन्तु यह अनिष्ट है, इस पर अग्रिम- सूत्र द्वारा पुनः आम् आदेश का विधान करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२२३) इदुद्भ्याम् ।७।३।११७॥ इदुद्भ्यां नदीसञ्ज्ञकाभ्यां परस्य ङेराम् । मत्याम्, मतौ। शेषं हरिवत् ॥ अर्थ:—नदीसञ्ज्ञक ह्रस्व इकार उकार से परे ङि को आम् आदेश हो । व्याख्या—नदीभ्याम् ।५।२। (ङेराम्नद्याम्नीभ्यः से वचनविपरिणाम द्वारा) । इदुद्भ्याम् ।५।२। ङेः ।६।१। आम् ।१।१। (ङेराम्० से) । समासः—इच्च उच्च = इदुतौ, ताभ्याम् = इदुद्भ्याम् । इतरेतरद्वन्द्वः । अर्थः—(नदीभ्याम्) नदीसञ्ज्ञक (इदुद्भ्याम्) ह्रस्व इकार और ह्रस्व उकार से परे (ङेः) ङि के स्थान पर (आम्) आम् आदेश हो जाता है। यह सूत्र औत् (१८४) सूत्र का अपवाद है ।¹ 'मति+ङि' यहां प्रकृतसूत्र मे ङि को आम् हो कर 'मति+आम्' हुआ । अब आण्नद्याः (१६६) से आट् आगम और ह्रस्वनद्यापः० (१४८) से नुट् आगम दोनों युगपत् प्राप्त होते हैं। परन्तु परत्व के कारण आट् का आगम हो जाता है—मति+ आट् आम् । आटश्च (१६७) से वृद्धि और इकार को यण् करने पर 'मत्याम्' प्रयोग सिद्ध होता है । नदीसञ्ज्ञा के अभाव में घिसञ्ज्ञा हो कर अच्छ घेः (१७४) से ङि को औकार और घि को अकार अन्तादेश हो कर वृद्धि एकादेश करने से 'मतौ' रूप सिद्ध होता है । हे मति+सुँ । यहां ह्रस्वस्य गुणः (१६६) से एकार गुण और एङ्ह्रस्वात्० (१३४) से सम्बुद्धि का लोप हो 'हे मते !' सिद्ध होता है। रूपमाला यथा— प्र० मतिः मती मतयः प० मत्याः,मतेः मतिभ्याम् मतिभ्यः द्वि० मतिम् ,, मतीः ष० ,, ,, मत्योः मतीनाम् तृ० मत्या मतिभ्याम् मतिभिः स० मत्याम्,मतौ ,, मतिषु च० मत्यै,मतये ,, मतिभ्यः सं० हे मते! हे मती! हे मतयः! [लघु०] एवं बुद्ध्यादयः ॥ अर्थः—इसी प्रकार बुद्धि आदि शब्दों की प्रक्रिया होती है । व्याख्या—बालकों के लिए मतिवत् कुछ उपयोगी शब्दों का संग्रह यहां दे रहे हैं । '*’ यह चिह्न णत्वप्रक्रिया का ज्ञापक है । शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ अङ्गुलि = अङ्गुल | अवनि = पृथ्वी | आकृष्टि = आकर्षण अपकृति = अपकार | आकृति = आकार | आर्ति = दुःख १. यहां यह ध्यान में रखना चाहिये कि औत् (१८४) सूत्र उत्सर्ग अर्थात् सामान्य- सूत्र है। इस के दो अपवाद हैं—अच्छ घेः (१७४) और इदुद्भ्याम् (२२३) ।