लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ आलि = पङ्क्ति | तिथि = तारीख | भुशुण्डि = बन्दूक आवलि = पङ्क्ति | दीधिति = किरण | भूति = कल्याण आवृत्ति = दुहराना | दृष्टि = नज़र | भूमि = पृथ्वी आहति = आघात | द्युति = चमक | भृति = मज़दूरी आहुति = आहुति | धूलि = धूल | भेरि* = नगारा इष्टि = यज्ञ | धृति = धैर्य | भ्रान्ति = भ्रम उक्ति = वचन | निकृति = छल | मुक्ति = मोक्ष उन्नति = उन्नति | नियति = भाग्य | मूर्त्ति = प्रतिमा उपकृति = उपकार | निराकृति = खण्डन | यष्टि = छड़ी उपलब्धि = प्राप्ति, ज्ञान | नीति = नीति | युक्ति = उपाय ओषधि = जड़ी-बूटी | नुति = स्तुति | युवति = जवान स्त्री कटि = कमर | पङ्क्ति = कतार | योनि = उत्पत्तिस्थान कण्डूति = खुजली | पद्धति = मार्ग | रजनि = रात्रि कान्ति = सौन्दर्य | पीति = पीना | राजनीति = राजनीति कीर्ति = यश | प्रकृति = स्वभाव | रीति = तरीका, रिवाज धृति = धैर्य | प्रतिकृति = छाया, सादृश्य | रुचि = अनुराग कृत्ति = चमड़ा | प्रतिपत्ति = ज्ञान, प्राप्ति | रूढ़ि = प्रसिद्धि कृषि* = खेती | प्रतीति = अनुभव | लिपि = वर्णमाला कोटि¹ = कोना, करोड़ | प्रत्यासत्ति = समीपता | वमि = वमन खनि = खान | प्रत्युक्ति = उत्तर | वल्लि = लता ख्याति = प्रसिद्धि | प्रशस्ति = प्रशंसा | वसति = वास, घर गति = चाल, गमन | प्रसुप्ति = निद्रा | वस्ति = मूत्राशय गीति = गान | प्रसूति = प्रसव, सन्तान | वान्ति = वमन गुप्ति = छिपाना | प्रसृति = प्रसार, वृद्धि | विकृति = विकार ग्लानि = अवसाद | प्राप्ति = पाना | विगीति = निन्दा च्युति = गिरना | प्रीति = प्रेम | विज्ञप्ति = प्रार्थना छर्दि = वमन | प्लुति = छलाङ्ग | विधुति = कम्पन छवि = कान्ति, चमक | बुद्धि = बुद्धि | विनति = नम्रता जग्धि = सहभोज | भक्ति = श्रद्धा | विपत्ति = आपत्ति जनि = उत्पत्ति | भणिति = कथन | विरति = हटना जाति = जाति | भित्ति = दीवार | विवृति = व्याख्या तति = विस्तार | भीति = डर | विशुद्धि = विशेष शुद्धि तमि = अन्धेरी रात | भुक्ति = भोजन, खाना | विस्मृति = भूलना १. करोड़ अर्थ में 'कोटि' शब्द एकवचनान्त होता है।