भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 318

ःअजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ३०३ शब्द—अर्थ शब्द—अर्थ शब्द—अर्थ विहृति = मारना शान्ति = शान्ति संहति = समूह वीचि = तरङ्ग शिरोधि = गरदन सिद्धि = सिद्ध होना वृत्ति = जीविका शुक्ति = सीपी सूक्ति = सुन्दर वचन वृष्टि = वर्षा शुद्धि = सफ़ाई स्तुति = प्रशंसा वेणि = गुत्त श्रुति = वेद, कान स्थिति = ठहरना व्याकृति = व्याकरण सन्तति = सन्तान स्फूर्ति = फुर्ती व्रतति = लता सम्पत्ति = धन-दौलत स्मृति = स्मरण शक्ति = ताकत संस्तुति = परिचय हानि = हानि अब स्त्रीलिङ्ग में 'त्रि' (तीन) शब्द के रूप दर्शाते हैं। त्रिशब्दो नित्यं बहु- वचनान्तः—यह पीछे (२४०) पृष्ठ पर स्पष्ट कर चुके हैं। 'त्रि+अस्' (जस्) इस दशा में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२२४) त्रिचतुरोः स्त्रियां तिसृ-चतसृ ।७।२।९९॥ स्त्रीलिङ्गयोरेतयोरेतौ स्तो विभक्तौ ॥ अर्थः—विभक्ति परे होने पर स्त्रीलिङ्ग में 'त्रि' शब्द के स्थान पर 'तिसृ' और 'चतुर्' शब्द के स्थान पर 'चतसृ' आदेश हो। व्याख्या—विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से)। त्रिचतुरोः ।६।२। स्त्रियाम् ।७।१। तिसृचतसृ ।१।१। समासः—तिसृ च चतसृ च=तिसृचतसृ, समाहारद्वन्द्वः । अर्थः—(विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (स्त्रियाम्) स्त्रीलिङ्ग में (त्रिचतुरोः) त्रि और चतुर् शब्दों के स्थान पर क्रमशः (तिसृचतसृ) तिसृ और चतसृ आदेश होते हैं। 'त्रि+अस्' (जस्) यहां जस् विभक्ति परे है अतः प्रकृतसूत्र से 'त्रि' के स्थान पर 'तिसृ' आदेश हो 'तिसृ+अस्' इस स्थिति में पूर्वसवर्णदीर्घ (१२६) का बाध कर ऋतो ङिसर्वनामस्थानयोः (२०४) से गुण प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२२५) अचि र ऋतः¹ ।७।२।१००॥ तिसृचतसृ एतयोर्ऋकारस्य रेफादेशः स्यादचि । गुणदीर्घोत्त्वानाम- पवादः । तिस्रः २ । तिसृभिः । तिसृभ्यः २ । आमि नुट् ॥ अर्थः—अच् परे हो तो तिसृ और चतसृ के ऋकार को रेफ आदेश हो। व्याख्या—अचि ।७।१। रः ।१।१। (रेफादकार उच्चारणार्थः) । ऋतः ।६।१। १. अलोऽन्त्यपरिभाषायैव सिद्धे 'ऋत' इति अनुवर्त्तमान-'तिसृचतसृ' इत्यस्य षष्ठ्यन्त- त्वकल्पनाय । अन्यथा त्रिचतुरोरित्यस्यैवानुवृत्त्यापत्तौ रादेशेन तिसृचतस्रोर्बाधा- पत्तिरिति शेखरे नागेशः । वस्तुतस्तु तत्रैव स्वरितत्वं न तत्र। अन्यथा 'अचि रश्च' इत्येव वदेत् । योग्यतयैव तत्कल्पनासिद्ध्या तददृष्टार्थमेवेत्यन्ये ।