लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 319, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ें३०४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् तिसृचतस्रो ।६।२। (त्रिचतुरोः स्त्रियां तिसृचतसृ मे विभक्ति विपरिणाम द्वारा )। अर्थ — (अचि) अच् परे होने पर (तिसृचतस्रो ) तिसृ और चतसृ शब्दो के (ऋत ) ऋकार के स्थान पर (र ) 'र्' यह आदेश होता है। प्रश्न—अच् परे होने पर ऋकार को रेफ आदेश तो इको यणचि (१५) से ही सिद्ध है, पुन इस सूत्र की क्या आवश्यकता है ? उत्तर—गुणदीर्घोत्त्वानाम् अपवाद अर्थात् 'तिसृ +अस्' यहा जस् मे ऋतो ङि० (२०४) से प्राप्त होने वाले गुण के, तिसृ+अस्' यहा शस् मे प्रथमयो पूर्वसवर्णः (१२६) द्वारा प्राप्त होने वाले पूर्वसवर्णदीर्घ के तथा प्रियचतसृ+अस्' यहा ङसिं और ङस् मे ऋत उत् (२०८) से प्राप्त होने वाले उत्त्व के बाघ के लिये इस सूत्र से ऋकार के स्थान पर रेफ आदेश किया जाता है। इस प्रकार यह सूत्र गुण, दीर्घ और उत्त्व का अपवाद है। तिसृ+अस्' यहा गुण का बाघ कर रेफ आदेश कर सकार को रुत्व और रेफ को विसर्ग आदेश करने से—'तिस्र ' रूप बना । 'त्रि+अस्'(शस्) यहा तिसृ आदेश हो कर पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है; पुन उस का बाध कर प्रकृत-सूत्र से रेफ आदेश हो जाता है—'तिस्र' । त्रि+भिस्=तिसृ+भिस्=तिसृभि । त्रि+भ्यस्=तिसृ+भ्यस्=ति- सृभ्यः । 'त्रि+आम्' यहा त्रेस्त्रयः (१६२) से प्राप्त त्रय आदेश का बाध कर त्रिचतुरो ० (२२४) से तिसृ आदेश हो जाता है। 'तिसृ+आम्' इस स्थिति में ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) से नुट् आगम और अचि र ऋत (२२५) मे रेफ आदेश युगपत् प्राप्त होते हैं। विप्रतिषेधे पर कार्यम् (११३) के अनुसार परकार्य रेफ आदेश होना चाहिये। परन्तु नुम्-अचिर-तृज्वद्भावेभ्यो नुट् पूर्वविप्रतिषेधेन (वा० १६) इस कात्यायनवचन से यहा पूर्वविप्रतिषेध मान कर पूर्व कार्य नुट् आगम हो जाता है। अब 'तिसृ+नाम्' इस दशा मे नामि (१४६) से दीर्घ प्राप्त होता है, इस पर अग्रिमसूत्र से उस का निषेध करते हैं— [लघु०] निषेध-सूत्रम्—(२२६) न तिसृचतसृ ।६।४।४।। एतयोर्नामि दीर्घो न । तिसृणाम् । तिसृषु ।। अर्थ —नाम् परे होने पर तिसृ और चतसृ शब्दो को दीर्घ नही होता । व्याख्या—न इत्यव्ययपदम् । तिसृ-चतसृ ।६।२। (यहा सुपां सुलुक० सूत्र द्वारा षष्ठी का लुक समझना चाहिये)। नामि ।७।१। (नामि से) । दीर्घ ।१।१। (ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽण मे)। अर्थ —(नामि) नाम् परे होने पर (तिसृचतसृ) तिसृ और चतसृ शब्दो के स्थान पर (दीर्घ) दीर्घ (न) नही होता । 'तिसृ+नाम्' यहाँ दीर्घ का निषेध हो कर ऋवर्णान्नस्य णत्व वाच्यम् (वा० २०) से नकार को णकार करने से—'तिसृणाम्' । रूपमाला यथा—