लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३०० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
भाव-जिस नित्यस्त्रीलिङ्ग शब्द के ईकार ऊकार के स्थान पर इयङ् उवङ् आदेश हों उन की ङिद्वचनों में विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञा हो जाती है। परन्तु यह नियम 'स्त्री' शब्द पर लागू नहीं होता। उदाहरण यथा- श्री, भ्रू' यहां क्रमशः ईकार ऊकार नित्यस्त्रीलिङ्गी हैं, इन के स्थान पर क्रमशः इयङ् उवङ् आदेश भी होते हैं, अतः ङित् विभक्तियों में इन की विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञा होगी। सूत्र के इस प्रथम खण्ड का उपयोग आगे इसी प्रकरण में 'श्री' आदि शब्दों में किया जायेगा। अब 'मति'शब्दोपयोगी द्वितीय खण्ड की व्याख्या करते हैं- स्त्र्याख्यौ ।१।२। ह्रस्व ।१।१। च इत्यव्ययपदम्। यू ।१।२। वा इत्यव्ययपदम्। नदी ।१।१। ङिति ।७।१। समास-स्त्रियम् आचक्षाते इति स्त्र्याख्यौ, स्त्रीलिङ्गा- न्वित्यर्थः। अत्र नित्यस्त्रीत्वमविवक्षितम्। 'ह्रस्व' इति यू' इत्यनेन सम्बध्यते। इश्च उश्च = यू। ह्रस्वौ इदुतावित्यर्थः। अर्थ-(स्त्र्याख्यौ) स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान (ह्रस्व. = ह्रस्वौ) ह्रस्व (यू) इकार उकार (च) भी (ङिति) ङित् परे होने पर (वा) विकल्प कर के (नदी) नदीसञ्ज्ञक होते हैं। भाव-यदि स्त्रीलिङ्ग में इकारान्त या उकारान्त शब्द आयेगा तो ङिद्वचनों में उस की विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञा हो जायेगी। यहां यह स्मरण रखना चाहिये कि ह्रस्व इकारान्त और ह्रस्व उकारान्त शब्द चाहे नित्यस्त्रीलिङ्ग हों या न हों, केवल स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान होने मात्र से ही उन की नदीसञ्ज्ञा हो जायेगी। इस नियम के प्रभाव से स्त्रीलिङ्ग में प्रत्येक ह्रस्व इकारान्त और ह्रस्व उका- रान्त शब्द ङिद्वचनों में विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञक हो जाता है। नदीत्वपक्ष में आट् आदि नदीकार्य और तदभावपक्ष में शेषो घ्यसखि (१७०) से घिसञ्ज्ञा हो कर गुण आदि घिकार्य होते हैं। 'मति + ङे' इस दशा में ह्रस्व इकारान्त स्त्रीलिङ्ग मति शब्द से परे ङित् प्रत्यय ङे के विद्यमान होने से वैकल्पिक नदीसञ्ज्ञा हुई। नदीत्वपक्ष में आण्नद्यः (१६६) द्वारा ङित् को आट् आगम, आटश्च (१६७) से वृद्धि तथा इकार को यण् करने से 'मत्यै' रूप बनता है। नदीसञ्ज्ञा के अभाव में घिसञ्ज्ञा हो जाती है। और तब घेर्ङिति (१७२) से इकार को एकार गुण हो कर अय् आदेश करने पर 'मतये' रूप बनता है। पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन में 'मति + ङस्' इस अवस्था में नदीसञ्ज्ञा, आट् का आगम, वृद्धि, यण् और सकार को रुत्व विसर्ग हो कर 'मत्याः' रूप सिद्ध होता है। नदीसञ्ज्ञा के अभाव में घिसञ्ज्ञा, गुण और ङसिङसोश्च (१७३) से पूर्व- रूप हो कर 'मतेः' रूप निष्पन्न होता है। षष्ठीबहुवचन 'मति + आम्' में ह्रस्वनद्याप० (१४८) से ह्रस्वमूलक नुट् आगम हो नामि (१४६) से दीर्घ करने पर- 'मतीनाम्' । 'मति + ङि' (ङि) यहां नदीसञ्ज्ञा के पक्ष में ङेराम्नद्याम्नीभ्यः (१६८) से ङि को आम् तथा औत् (१८४) सूत्र द्वारा ङि को औकार युगपत् प्राप्त होते हैं।