लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २६६ अब ह्रस्व इकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का वर्णन करते हैं— [लघु०] मतीः। मत्या॥ व्याख्या—मनँ ज्ञाने(दिवा० आ०) धातु से 'क्तिन्' प्रत्यय करने पर 'मति' शब्द सिद्ध होता है। मन्यतेऽनयेति मतिः। मननं वा मतिः। बुद्धि या ज्ञान को 'मति' कहते हैं। इस की प्रक्रिया ङिद्वचनों से अन्यत्र प्रायः 'हरि' शब्द के समान होती है। तथाहि— मति+सुँ = मतिः। सकार को रुँत्व तथा रेफ को विसर्ग हो जाता है। मति+औ = मती। प्रथमयोः० (१२६) से पूर्वसवर्णदीर्घ हो जाता है। 'मति+अस्' (जस्) इस स्थिति में जसि च (१६८) से इकार को एकार गुण हो कर अय्-आदेश करने से 'मतयः' रूप सिद्ध होता है। द्वितीया के बहुवचन में 'मति+अस्' (शस्) इस दशा में पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर सकार को रुँत्व विसर्ग हो जाते हैं—मतीः। ध्यान रहे कि तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७) सूत्र में 'पुंसि' कहने से यहां स्त्रीलिङ्ग में नकार आदेश नहीं होता। 'मति+आ' (टा) यहां घिसञ्ज्ञा रहने पर भी आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) द्वारा टा को ना नहीं होता; 'अस्त्रियाम्' कथन के कारण उस की स्त्रीलिङ्ग में प्रवृत्ति नहीं होती। इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'मत्या' सिद्ध होता है। 'मति+ए' (ङे) यहां घिसञ्ज्ञा होने से घेर्ङिति (१७२) द्वारा गुण प्राप्त होता है। अब अग्रिमसूत्र द्वारा पक्ष में नदीसञ्ज्ञा का विधान करते हैं— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(२२२) ङिति ह्रस्वश्च ।१।४।६।। इयँडुवँङ्स्थानौ स्त्रीशब्दभिन्नौ नित्यस्त्रीलिङ्गावीदूतौ, ह्रस्वौ च इवर्णोवर्णां स्त्रियां वा नदीसञ्ज्ञौ स्तो ङिति। मत्यै, मतये। मत्याः २, मतेः २॥ अर्थः—'स्त्री' शब्द को छोड़ कर इयँङुवँङ्स्थानी नित्यस्त्रीलिङ्ग ईकार ऊकार ङिद्वचनों में विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञक होते हैं। किञ्च—स्त्रीलिङ्ग में ह्रस्व इका- रान्त और ह्रस्व उकारान्त शब्द भी ङिद्वचनों में विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञक होते हैं। व्याख्या—ङिति ।७।१। ह्रस्वः ।१।१। च इत्यव्ययपदम्। इस सूत्र के दो खण्ड हैं। प्रथम यथा—अस्त्री ।१।१। इयँडुवँङ्स्थानौ ।१।२। (नेयँडुवँङ्स्थानावस्त्री से)। स्त्र्याख्यौ ।१।२। यू ।१।२। नदी ।१।१। (यू स्त्र्याख्यौ नदी से)। वा इत्यव्ययपदम्। (वाऽऽमि से)। ङिति ।७।१। समासः—न स्त्री=अस्त्री, नञ्तत्पुरुषः। स्त्रीशब्दं वर्ज- यित्वेत्यर्थः। इयँङ् च उवंङ् च=इयँडुवँङौ, इतरेतरद्वन्द्वः। इयँडुवँङोः स्थानं स्थिति- र्ययोस्तौ इयँडुवँङ्स्थानौ, बहुव्रीहिसमासः। स्त्रियमाचक्षाते इति स्त्र्याख्यौ, नित्यस्त्री- लिङ्गादित्यर्थः। ईश्च ऊश्च=यू, इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः—(अस्त्री) 'स्त्री' शब्द को छोड़ कर (इयँडुवँङ्स्थानी) जिन के स्थान पर इयँङ् उवँङ् आदेश होते हैं ऐसे (स्त्र्याख्यौ) नित्यस्त्रीलिङ्गी (यू) ईकार और ऊकार (ङिति) ङिद्वचनों में (वा) विकल्प कर के (नदी) नदीसञ्ज्ञक होते हैं।