भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 313

२६८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् च० जरसे, जरायै जराभ्याम् जराभ्यः प० जरसः, जरायाः जराभ्याम् जराभ्यः ष० " " जरसोः, जरयोः जरसाम्, जराणाम् स० जरसि, जरायाम् " " जरासु सं० हे जरे ! हे जरसौ!, हे जरे ! हे जरसः!, हे जराः ! नोट—'जरा+औ' यहां परत्व के कारण शी आदेश से पूर्व जरस् आदेश हो जाता है; यदि प्रथम शी आदेश होता तो 'जरसी' यह अनिष्ट रूप बन जाता । एवम् आगे भी जान लेना चाहिये । [लघु०] गोपा विश्वपावत् ॥ व्याख्या—गां पाति = रक्षतीति गोपाः । 'गो'कर्मोपपदात् पा रक्षणे (अदा० प०) इत्यस्माद्धातोः क्विपि लौकिके वा विचि 'गोपा'शब्दो निष्पद्यते । गौओ की रक्षा करने वाली स्त्री 'गोपा' कहाती है । 'गोपा' के अन्त में 'पा' धातु है आप् (टाप्) नही । 'गोपा+सुँ' । आवन्त न होने से हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सुँलोप नही होता । सकार को रुत्व विसर्ग हो कर—'गोपाः' सिद्ध होता है । 'गोपा+औ' यहां भी आवन्त न होने से औङ आपः (२१६) से शी आदेश । नही होता । पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होने पर उस का भी दीर्घाज्जसि च (१६२) से निषेध हो जाता है । अब वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश हो कर—'गोपौ' सिद्ध होता है । 'गोपा+अस्' (जस्) यहां भी पूर्ववत् पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध हो जाता है । तब अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ हो कर—'गोपाः' रूप बनता है । गोपा+अम् = गोपाम् । अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप होता है । 'गोपा+अस्' (शस्) यहां भसञ्ज्ञक आकार का आतो धातोः (१६७) से लोप हो कर 'गोपः' प्रयोग बनता है । इसी प्रकार आगे सर्वत्र भसञ्ज्ञको मे आकार का लोप हो जाता है । रूपमाला यथा— प्र० गोपा गोपौ गोपा | प० गोपः* गोपाभ्याम् गोपाभ्यः द्वि० गोपाम् " गोपः* | ष० " गोपोः* गोपाम्* तृ० गोपा* गोपाभ्याम् गोपाभिः | स० गोपि* " * गोपासु च० गोपे* " गोपाभ्यः | सं० हे गोपा ! हे गोपौ ! हे गोपाः !

  • इन स्थानो पर भसञ्ज्ञा हो कर आकार का लोप हो जाता है । इस की सम्पूर्ण प्रक्रिया अजन्तपुंल्लिङ्गान्तर्गत 'विश्वपा' शब्द के समान होती है । नोट—'क' प्रत्यय से सिद्ध 'गोप' शब्द से स्त्रीत्वविवक्षा में जातेरस्त्री० (१२६५) सूत्र से ङीष् प्रत्यय हो कर 'गोपी' शब्द बनता है । इस का अर्थ है—गोप जाति की स्त्री । इस का उच्चारण 'नदी' शब्द के समान होता है । (यहां आकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दो का विवेचन समाप्त होता है ।) ः ० ः