भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 312, कुल 633 में से

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अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २६७ [लघु०] अम्बार्थ० (१६५) इति ह्रस्वः—हे अम्ब!, हे अवक!, हे अल्ल !॥ व्याख्या—अम्बा, अक्का, अल्ला आदि शब्दों का अर्थ 'माता = पार्वती' है। इन की प्रक्रिया रमाशब्दवत् होती है; केवल सम्बुद्धि में ही कुछ विशेष है। सम्बुद्धि में अम्बार्थनद्योर्ह्रस्वः (१६५) से ह्रस्व हो कर एङ्ह्रस्वात् सम्बुद्धेः (१३४) से सुंलोप हो जाता है। इस प्रकार 'हे अम्ब!, हे अवक!, हे अल्ल !' आदि प्रयोग सिद्ध होते हैं। वक्तव्य—ध्यान रहे कि महाभाष्य में दो अच् वाले अम्बार्थकों को ही ह्रस्व करना बताया है। अम्बाडा, अम्बाला, अम्बिका आदि शब्द दो अच् वाले नहीं अपितु दो से अधिक अचों वाले हैं; अतः अम्बार्थक होने पर भी इन को ह्रस्व न होगा। हे अम्बाडे !, हे अम्बाले !, हे अम्बिके ! इत्यादिप्रकारेण रूप बनेंगे [दृश्यतां (७.३.१०७) सूत्रस्थं महाभाष्यम्—अम्बार्थे द्वयक्षरं यदि इति। सिद्धान्तकौमुद्यान्तु असंयुक्ता ये डलकास्तद्वतां ह्रस्वो न इति वार्त्तिकम्पठितम्, तदपि भाष्यानुसारि। परं सरलः पन्था- स्तु भाष्योक्त एव]। 'अम्बा' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० अम्बा अम्बे अम्बाः प० अम्बायाः अम्बाभ्याम् अम्बाभ्यः द्वि० अम्बाम् " " ष० " अम्बयोः अम्बानाम् तृ० अम्बया अम्बाभ्याम् अम्बाभिः स० अम्बायाम् " अम्बासु च० अम्बायै " अम्बाभ्यः सं० हे अम्ब ! हे अम्बे ! हे अम्बाः! इसी प्रकार—अक्का, अल्ला आदि शब्दों के रूप बनते हैं। नोट—'अल्ला' शब्द मुसलमानों ने बेतरह पकड़ रखा है; अम्बा, अल्ला आदि शब्द दुर्गा (शक्ति) के नाम माने जाते हैं। इसलिये सम्भव है कि मुसलमान शाक्त हिन्दुओं से निकले हों और कालक्रम से आचारादिभिन्नता के कारण इन से पृथक् हो गये हों—इस में आश्चर्य नहीं। इसी प्रकार ईसाइयों का 'गिरजाघर' भी शायद 'गिरिजा-गृह' ही हो; वे भी शाक्तों से निकले हों। [लघु०] जरा, जरसौ इत्यादि। पक्षे हलादौ च रमावत्॥ व्याख्या—जृष् वयोहानौ (दिवा० परस्मै०) धातु से स्त्रियाम्० (३.३.९४) : के अधिकार में ष्रिद्भिदादिभ्योऽङ् (३.३.१०४) सूत्र से अङ् प्रत्यय तथा ऋदृशोऽङि गुणः (७.४.१६) से अर् गुण हो कर टाप् प्रत्यय करने से 'जरा' शब्द निष्पन्न होता है। 'जरा' शब्द का अर्थ है—'बुढ़ापा'। अजादि विभक्तियों में सर्वत्र सर्वप्रथम जराया जरसन्यतरस्याम् (१६१) सूत्र से 'जरा' के स्थान पर 'जरस्' आदेश हो जाता है। जरस् के अभाव में रमाशब्दवत् प्रक्रिया होती है। रूपमाला यथा— प्र० जरा जरसौ, जरे जरसः, जराः द्वि० जरसम्, जराम् " " " " तृ० जरसा, जरया जराभ्याम् जराभिः

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