लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् प्र० उत्तरपूर्वा उत्तरपूर्वे उत्तरपूर्वा द्वि० उत्तरपूर्वाम् " " तृ० उत्तरपूर्वया उत्तरपूर्वाभ्याम् उत्तरपूर्वाभिः च० उत्तरपूर्वस्यै, उत्तरपूर्वायै " उत्तरपूर्वाभ्यः प० उत्तरपूर्वस्या ,उत्तरपूर्वाया " " ष० " " उत्तरपूर्वयो उत्तरपूर्वासाम्,उत्तरपूर्वाणाम् स० उत्तरपूर्वस्याम्,उत्तरपूर्वायाम् " उत्तरपूर्वासु सं० हे उत्तरपूर्वे ! हे उत्तरपूर्वे ! हे उत्तरपूर्वा ! इसी प्रकार—दक्षिणपूर्वा, पूर्वोत्तरा, पश्चिमोत्तरा, पश्चिमदक्षिणा, पूर्वदक्षिणा आदि शब्दों के उच्चारण होते हैं¹। [लघु०] तीयस्येति वा सञ्ज्ञा । द्वितीयस्यै, द्वितीयायै । एव तृतीया ॥ व्याख्या—तीयस्य ङित्सु वा (वा० १६) द्वारा तीयप्रत्ययान्त द्वितीया (दूसरी) और तृतीया (तीसरी) शब्द केवल ङित् वचनों में ही विकल्प से सर्वनामसञ्ज्ञक होते हैं। अत 'ङे, ङसिं, ङस्, ङि' इन चार विभक्तियों मे दो दो रूप बनते हैं; अर्थात् जहा सर्वनामसञ्ज्ञा होती है वहा सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च (२२०) से स्याट् का आगम और आप् को ह्रस्व हो जाता है। सर्वनामसञ्ज्ञा के अभाव मे याडापः (२१६) से याट् का आगम हो जाता है। इस प्रकार ङिद्वचनों मे दो दो रूप बनते हैं। 'द्वितीया' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० द्वितीया द्वितीये द्वितीया द्वि० द्वितीयाम् " " तृ० द्वितीया द्वितीयाभ्याम् द्वितीयाभिः च० द्वितीयस्यै,द्वितीयायै " द्वितीयाभ्यः प० द्वितीयस्या.,द्वितीयायाः " " ष० " " द्वितीययो द्वितीयानाम् स० द्वितीयस्याम्, द्वितीयायाम् " द्वितीयासु सं० हे द्वितीये ! हे द्वितीये ! हे द्वितीया ! इसी प्रकार 'तृतीया' शब्द का उच्चारण होता है। ध्यान रहे कि तीयस्य ङित्सु वा (वा० १६) द्वारा आम् मे सर्वनामता नहीं होती; अतः पक्ष में सुँट् का यागम नही होता। 'उत्तरपूर्वा' और 'द्वितीया' के उच्चारण में यही अन्तर है। १. दिङ्नामान्यन्तराले (२ २.२६) सूत्र द्वारा होने वाले बहुव्रीहिसमास में पूर्वनिपात का कोई नियम नही होता। अत एव—दक्षिणपूर्वा, पूर्वदक्षिणा। पश्चिमदक्षिणा, दक्षिणपश्चिमा। पश्चिमोत्तरा, उत्तरपश्चिमा। उत्तरपूर्वा, पूर्वोत्तरा। इत्यादि रूप काशिका (२२२६) में दिये गये हैं। नक्षत्रत्रितय पादमाश्रित पूर्वदक्षिणम् (मार्कण्डेयपुराण ५८ २०) इत्यादि वचन भी इस मे प्रमाण हैं।