लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 310, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २६५ उत्तर और पूर्व दिशा की मध्यवर्ती उपदिशा 'उत्तरपूर्वा' कहलाती है। 'उत्तर- पूर्वा' शब्द की प्रथम तीन विभक्तियों में रमाशब्दवत् प्रक्रिया होती है। चतुर्थी के एकवचन में 'उत्तरपूर्वा + ए' (ङे) इस स्थिति में सर्वादीनि सर्व- नामानि (१५१) सूत्र से नित्य सर्वनामसञ्ज्ञा होने के कारण सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च (२२०) से स्याट् का आगम और आप् को ह्रस्व नित्य प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र से सर्वनामसञ्ज्ञा का विकल्प किया जाता है— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(२२१) विभाषा दिक्समासे बहुव्रीहौ ।१।१।२७॥ सर्वनामता वा। उत्तरपूर्वस्यै, उत्तरपूर्वायै ॥ अर्थः—दिशाओं के बहुव्रीहिसमास में सर्वादि विकल्प से सर्वनामसञ्ज्ञक हों। व्याख्या—दिक्समासे ।७।१। बहुव्रीहौ ।७।१। सर्वादीनि ।१।३। विभाषा ।१।१। सर्वनामानि ।१।३। (सर्वादीनि सर्वनामानि से)। समासः—दिशां समासः = दिक्- समासः, तस्मिन् = दिक्समासे, षष्ठीतत्पुरुषः। अर्थः—(दिक्समासे बहुव्रीहौ) दिशाओं के बहुव्रीहिसमास में (सर्वादीनि) सर्वादिगणपठित शब्द (विभाषा) विकल्प कर के (सर्वनामानि) सर्वनामसञ्ज्ञक होते हैं। दिशाओं का बहुव्रीहिसमास दिङ्नामान्यन्तराले (२.२.२६) सूत्र से विधान किया जाता है। यहां उसी का ग्रहण अभीष्ट है। 'उत्तरपूर्वा' शब्द में दिशाओं का बहुव्रीहिसमास हुआ है, अतः प्रकृतसूत्र से इस की विकल्प कर के सर्वनामसञ्ज्ञा होगी। सर्वनामसञ्ज्ञापक्ष में सर्वाशब्दवत् स्याट् का आगम और आप् को ह्रस्व आदि कार्य होंगे। सर्वनामसञ्ज्ञा के अभाव में रमा- शब्दवत् याट् का आगम आदि कार्य होगे। आम् में सर्वनामपक्ष में सुट् आगम और तदभावपक्ष में नुट् आगम विशेष होगा। 'उत्तरपूर्वा' शब्द की रूपमाला यथा—