भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 309

३६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् ७. ततरा । ८. ततमा । ६. एकतरा । १०. एकतमा । ११. अन्या । १२. अन्यतरा¹ । १३. इतरा । १४. त्वा । १५ नेमा² । १६. समा³ । १७ सिमा । १८. पूर्वा⁴ । १६. परा । २०. अवरा । २१. दक्षिणा । २२. उत्तरा । २३ अपरा । २४. अधरा । २५. स्वा । २६ अन्तरा । २७ एका⁵ । उत्तरस्याश्च पूर्वस्याश्च दिशोर अन्तराला दिक् = उत्तरपूर्वा⁶ । दिङ्नामान्य- न्तराले (२२२६) इति बहुव्रीहि, सर्वनाम्नो वृत्तिमात्रे पुंवद्भाव. इति पुंवद्भाव । १. पूर्व, २ पश्चिम, ३ उत्तर और ४ दक्षिण ये चार दिशाए होती हैं । दो दिशाओ के बीच मे आने वाला कोना 'उपदिशा' कहलाता है । इस प्रकार उपदिशाए भी चार हो जाती हैं । यथा— (१६६) पृष्ठ पर स्पष्टीकरण कर चुके हैं । १. इसे इतरप्रत्ययान्त नही समझना चाहिये । 'अन्य' शब्द से डतर और डतम प्रत्ययो का विधान नही । अन्यतर और अन्यतम शब्द स्वतन्त्र अव्युत्पन्न है । इन मे से प्रथम 'अन्यतर' शब्द सर्वादिगण मे पठित होने से सर्वनामसञ्ज्ञक है, दूसरा नही । अत 'अन्यतमा' शब्द का 'रमा'शब्दवत् उच्चारण होता है । २. 'अर्ध' अर्थ मे ही इस की सर्वनामत्ता इष्ट है, अन्यथा 'रमा'शब्दवत् उच्चारण होगा । प्रथमचरम० (१६०) सूत्र का स्त्रीलिङ्ग मे कुछ प्रभाव नही पडता । ३. 'सर्व' अर्थ मे ही सर्वनामत्ता इष्ट है । 'तुल्य' अर्थ मे 'रमा'शब्दवत् उच्चारण होगा । ४. पूर्वा' आदि नौ शब्दो का उच्चारण सर्वावत् ही होता है, कुछ भी अन्तर नही पडता । यद्यपि जस् मे इन की सर्वनामसञ्ज्ञा (१५६, १५७, १५८) सूत्रो से विकल्प कर के होती है, तथापि इस से यहा स्त्रीलिङ्ग मे कोई भेद नही पडता; क्योकि यहा अदन्त न होने से जसः शी (१५२) सूत्र प्रवृत्त नही हो सकता । ध्यान रहे कि पूर्वादिभ्यो नवभ्यो वा (१५६) सूत्र ङसिं और ङि मे सर्वनाम- सञ्ज्ञा का विकल्प नही करता किन्तु स्मात् और स्मिन् आदेशो का ही विकल्प करता है। सर्वनामसञ्ज्ञा तो—इन मे भी नित्य बनी रहती है। अत एव 'पूर्वस्या', पूर्वस्याम्' आदि प्रयोगो मे सर्वनामतामूलक स्याट् आदि कार्य करने मे कोई बाधा उपस्थित नही होती । पाणिनि की बुद्धिमत्ता का यह एक ज्वलन्त प्रमाण है। ५ सङ्ख्येयवाची 'एका' शब्द एकवचनान्त ही प्रयुक्त होगा । अन्य, मुख्य आदि अर्थों मे इस का सब वचनो मे उच्चारण होगा । ६. प्राय. सब वैयाकरण यहा 'उत्तरस्याश्च पूर्वस्याश्च दिशोर्यदन्तरालम्' इस प्रकार विग्रह करते हैं । परन्तु बालको के लिये यह विग्रह कुछ कठिन है, क्योकि वे 'यद् अन्तरालम्' इस नपुंसक का 'उत्तरपूर्वा' इस स्त्रीलिङ्ग के साथ सम्बन्ध नही समझ सकते । अत उन के सौकर्यार्थ उपर्युक्त विग्रह रखा गया है ।