भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 633 में से

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पृष्ठ 308

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २६३ तदन्तविधि हो कर ‘आवन्तात्’ बन जाता है। अर्थ करते समय इस की आवृत्ति की जाती है। अर्थः— (आपः = आवन्तात्) आवन्त (सर्वनाम्नः) सर्वनाम से परे (ङितः) ङित् वचनों का अवयव (स्याट्) ‘स्याट्’ हो जाता है (च) और साथ ही (आपः= आवन्तस्य) आवन्त के स्थान पर (ह्रस्वः) ह्रस्व आदेश हो जाता है। ङे, ङसिं, ङस्, ङि—ये चार ङित् विभक्तियां हैं; इन में याट् का आगम प्राप्त था, इस सूत्र से स्याट् का आगम विधान किया जाता है। अतः यह सूत्र याडापः (२१६) सूत्र का अपवाद है। ‘स्याट्’ में टकार इत्सञ्ज्ञक है, अतः टित् होने से ङित् प्रत्यय का आद्यवयव होता है। अलोऽन्त्यपरिभाषा से आवन्त के अन्त्य आकार को ह्रस्व होता है। ‘सर्वा+ए’ (ङे) यहां प्रकृतसूत्र से ‘स्याट्’ का आगम तथा आप् को ह्रस्व हो कर ‘सर्व+स्या ए’ हुआ। अब वृद्धिरेचि (३३) सूत्र से वृद्धि एकादेश करने पर ‘सर्वस्यै’ प्रयोग सिद्ध होता है। पञ्चमी वा षष्ठी के एकवचन में ‘सर्वा+अस्’ (ङसिं वा ङस्)। अब स्याट् का आगम और आप् को ह्रस्व हो कर सवर्णदीर्घ करने से—‘सर्वस्याः’। षष्ठी के बहुवचन में ‘सर्वा+आम्’ इस स्थिति में आमि सर्वनाम्नः सुँट् (१५५) से सुँट् आगम हो कर अनुबन्धलोप करने से ‘सर्वासाम्’ प्रयोग सिद्ध होता है। ‘ङि’ में ‘सर्वा+ङि’ इस दशा में ङेराम्नद्याम्नीभ्यः (१६८) से ङि को आम् आदेश और प्रकृतसूत्र से ‘स्याट्’ का आगम और आप् को ह्रस्व हो कर सवर्णदीर्घ करने से ‘सर्वस्याम्’ रूप बनता है। ‘सर्वा’ शब्द की रूपमाला यथा— *प्र० सर्वा सर्वे सर्वाः प० सर्वस्याः सर्वाभ्याम् सर्वाभ्यः द्वि० सर्वाम् ,, ,, ष० ,, सर्वयोः सर्वासाम् तृ० सर्वया सर्वाभ्याम् सर्वाभिः स० सर्वस्याम् ,, सर्वासु च० सर्वस्यै ,, सर्वाभ्यः सं० हे सर्वै! हे सर्वे! हे सर्वाः! [लघु०] एवं विश्वादय आवन्ताः ॥ अर्थः—इसीप्रकार ‘विश्वा’ आदि आवन्त सर्वनामों की प्रक्रिया होती है। व्याख्या—निम्नलिखित आवन्त सर्वनामों के रूप ‘सर्वा’ शब्दवत् होते हैं— १. विश्वा। २. उभा¹। ३. कतरा²। ४. कतमा। ५. यतरा। ६. यतमा। १. ‘उभा’ शब्द सदा द्विवचनान्त ही प्रयुक्त होता है। अतः यहां इस में कोई सर्व- नामकार्य नहीं होता। अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम् (पञ्चतन्त्र १.४३८)। ‘उभय’ शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा में ‘टाप्’ प्रत्यय नहीं होता किन्तु गौरादिगण में पाठ होने के कारण अथवा तयप्प्रत्ययान्त होने से टिड्ढाणञ्० (१२४७) सूत्र से ‘ङीप्’ प्रत्यय हो कर ‘उभयी’ शब्द निष्पन्न होता है। इस का द्विवचन में प्रयोग नहीं होता, उच्चारण ‘नदी’ शब्दवत् होता है। उभयीं सिद्धिमु- भाववापतुः (रघुवंश ८.२३)। २. ‘कतरा’ आदि आठ शब्द डतरप्रत्ययान्त और डतमप्रत्ययान्त हैं। इन का पीछे

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