लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ सेवा=सेवा | स्पृहा*=इच्छा | हिक्का=हिचकी सोदर्या*=सगी बहन | स्वतन्त्रता=आज़ादी | हिमाद्रिजा=पार्वती स्पर्धा=बराबरी करना | हरिद्रा*=हल्दी | हेषा*=हिनहिनाहट २६२—होरा*=एक घण्टा। आकारान्तस्त्रीलिङ्गो मे 'रमा' शब्द की अपेक्षा सर्वनाम तथा कुछ अन्य शब्दो मे थोडा अन्तर पडता है, अब उस प्रसग मे प्रथम सर्वनामशब्दो का वर्णन करते हैं— 'सर्व' शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा मे 'टाप्' प्रत्यय करने से 'सर्वा' शब्द निष्पन्न होता है। लिङ्गविशिष्टपरिभाषा¹ से इस की भी सर्वत्र सर्वनामसञ्ज्ञा हो जाती है। ङित् विभक्तियो और आम् को छोड़ कर शेष सब विभक्तियो मे इस की 'रमा'शब्दवत् प्रक्रिया तथा उच्चारण होता है। 'सर्वा+ए' (ङे)। यहा याडाप (२१६) द्वारा याट् का आगम प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि सूत्रम्—(२२०) सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च ।७।३।११४॥ आवन्तात् सर्वनाम्नो ङित स्याट् स्याद्, आपश्च ह्रस्व.। सर्वस्यै। सर्वस्याः २। सर्वासाम्। सर्वस्याम्। शेष रमावत् ॥ अर्थः—आवन्त सर्वनाम से परे ङित् प्रत्ययो को 'स्याट्' का आगम हो और साथ ही आवन्त अङ्ग के आप् को ह्रस्व भी हो। व्याख्या—आपः ।५।१। (याडापः से)। सर्वनाम्न ।५।१। ङित ।६।१। (घेङिति से विभक्तिविपरिणाम द्वारा)। स्याट् ।१।१। ह्रस्व ।१।१। [सूत्रपाठे तु—झलां जशोऽन्ते इति जश्त्वे झयो होऽन्यतरस्याम् इति पूर्वसवर्णत्वे च कृते 'स्याड्ढ्रस्व' इति प्रयोग प्रयुज्यते] । च इत्यव्ययपदम्। 'सर्वनाम्न' का विशेषण होने मे 'आप' मे १ युवा खलति-पलित-वलिन-जरतीभि (२ १ ६७) इस सूत्र द्वारा 'युवन्' शब्द का 'खलति, पलित, वलिन, जरती' इन समानाधिकरण शब्दो के साथ कर्मधारयसमास बताया गया है। इन शब्दो मे 'जरती' शब्द स्त्रीलिङ्ग है। 'जरती' शब्द का 'युवन्' इस पुल्लिङ्ग के साथ तब तक सामानाधिकरण्य नही हो सकता जब तक 'युवन्' को 'युवति' न बना दिया जाये। इस प्रकार 'जरती' शब्द के ग्रहण से यह प्रतीत होता है कि आचार्य पाणिनि—'युवन्' के ग्रहण से 'युवति' इस स्त्रीलिङ्ग का भी ग्रहण चाहते हैं। अत एव यह परिभाषा निष्पन्न होती है—प्रातिपदिकग्रहणे लिङ्ग- विशिष्टस्यापि ग्रहणम्। अर्थात् प्रातिपदिक के ग्रहण होने पर उस प्रातिपदिक के विशेष लिङ्गो का भी ग्रहण हो जाता है। यथा—'युवन्' के ग्रहण से 'युवति' का ग्रहण होता है। इसी प्रकार सर्वनामसञ्ज्ञा करते समय सर्वादिगण मे सर्वा आदि स्त्रीलिङ्गो का भी समावेश समझ लेना चाहिये। इस परिभाषा का सङ्क्षिप्त नाम लिङ्गविशिष्टपरिभाषा है।