भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २६१ शब्द — अर्थ | शब्द — अर्थ | शब्द — अर्थ माला = माला | वन्ध्या = वाञ्झ | शारदा = सरस्वती मुद्रा* = मोहर | वरटा = हंस-मादा | शाला = घर मूषा* = कुठाली | वर्त्तिका = बटेर | शिक्षा* = उपदेश मृत्सा = अच्छी मिट्टी | वसा = चरबी | शिञ्जा = भूषणध्वनि मृत्स्ना = अच्छी मिट्टी | वसुधा = पृथ्वी | शिला = पत्थर मृद्वीका = द्राक्षा | वाटिका = फुलबगिया | शिवा = दुर्गा, गीदड़ी मेखला = कमरबन्द | वात्या = आंधी | शिविका = पालकी यवनिका = पर्दा | वामा = सुन्दरी | शोभा = चमक यातना = तीव्र वेदना | वाराङ्गना = वेश्या | श्रद्धा = विश्वास यात्रा* = प्रस्थान | वार्त्ता = संवाद | श्लाघा = प्रशंसा रक्षा* = पालना | वालुका = रेत | सङ्ख्या = सङ्ख्या रचना = बनाना, कृति | विचिकित्सा = संशय | सञ्ज्ञा = नाम रजस्वला = रजस्वला स्त्री | विजया = भांग | सत्क्रिया* = सत्कार रथ्या = गली | विद्या = विद्या | सधवा = जीवितभर्तृका रसना = जीभ | विधवा = पतिरहिता | सन्ध्या = साझ राका* = पूर्णमासी | विसूचिका = हैज़ा रोग | सपर्या* = सेवा राधा = प्रसिद्ध गोपी | विष्ठा = टट्टी, मल | सभा = सभा रुजा = रोग, पीड़ा | वीणा = वाद्यविशेष | समझ = यश रेखा* = लकीर | वेदना = दुःख | सरघा* = मधुमक्खी लक्षणा = शक्ति-विशेष | वेला = समुद्रतट | सरटा = छिपकली लता = वेल | वेश्या = पण्य-स्त्री | सहायता = मदद लाक्षा* = लाख | व्यथा = दुःख | सहिष्णुता = सहनशीलता लालसा = अभिलाषा | व्यवस्था = नियम | सास्ना = गलकम्बल लाला = लार | शकुन्तला = दुष्यन्त-पत्नी | सीमा¹ = हद लिप्सा = लाभेच्छा | शङ्का = शक | सुता = लड़की लीला = क्रीडा | शय्या = शयनस्थान | सुधा = अमृत लेखा = रेखा | शर्करा* = शक्कर | सुरा* = शराब वडवा = घोड़ी | शलाका = सलाई | सुषमा* = बहुत शोभा वनिता = स्त्री | शाखा = टहनी | सेना = फ़ौज श्रीमद्भागवत में एकवचनान्त दारा शब्द प्रयुक्त भी हुआ है। यथा— अप्येकाम् आत्मनो दारां नृणां स्वत्वग्रहो यथा। (भागवत ७.१४.११) श्रीहेमचन्द्राचार्य 'दार' शब्द को एकवचनान्त भी मानते हैं। उन्होंने किसी ग्रन्थ का प्रयोग भी उद्धृत किया है—धर्मप्रजासम्पन्ने दारे नान्यं कुर्वीत इति। १. यह शब्द नकारान्त स्त्रीलिङ्ग भी होता है।