लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
DevanagariHindipublished633 पृष्ठ
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२६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
| शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ |
|---|---|---|
| जिह्वा = जीभ | दीर्घिका* = बावड़ी | पिपासा = प्यास |
| जीविका = गुजारा | दुर्गा* = पार्वती | पिपीलिका = चींटी |
| जुगुप्सा = निन्दा | दूषिका* = नेत्रों का मल | पीडा = दुःख |
| ज्या = धनुष की डोरी | देवता = इन्द्र आदि | पूर्णिमा = पूर्णमासी |
| ज्योत्स्ना = चाँदनी | दोला = पालकी, पींग | प्रतिज्ञा = प्रण |
| झञ्झा = तूफान | द्राक्षा* = अगूर | प्रतिपदा = पड़वा तिथि |
| तनया = पुत्री | धरा* = पृथ्वी | प्रतिभा = प्रत्युत्पन्न बुद्धि |
| तन्द्रा* = ऊँघना | धारणा = विचार | प्रतिमा = मूर्ति |
| तपस्या = तपस्या | धारा* = धार | प्रतिष्ठा = इज्जत |
| तमिस्रा* = अन्धेरी रात | नवोढा = नवविवाहिता | प्रभा* = दीप्ति |
| तारा* = तारा | नासा = नासिका | प्रसन्नता = खुशी |
| तितिक्षा* = सहनशीलता | नित्यता = सदा होना | प्रसूता = प्रसूत हुई |
| तुला = तराजू | निद्रा* = नींद | प्रहेलिका = पहेली |
| तृषा* = प्यास | निन्दा = शिकायत | बाधा = रुकावट |
| तृष्णा = लालच | निशा = रात्रि | बुभुक्षा* = भूख |
| त्रपा* = लज्जा | निष्ठा = स्थिति | भाषा* = बोली |
| त्रिपथगा = गङ्गा | नौका = किश्ती | भ्रातृजाया = भ्रातृपत्नी |
| त्रियामा* = रात्रि | पताका = झण्डी | मज्जा = अस्थिसार |
| त्रेता = त्रेतायुग | पतिव्रता = पतिव्रता | मञ्जूषा* = पेटी |
| त्वरा* = शीघ्रता | पद्मा = लक्ष्मी | मथुरा* = प्रसिद्ध नगरी |
| दया = रहम | परम्परा* = सिलसिला | मदिरा* = शराब |
| दशा = हालत | परिचर्या* = सेवा | मन्दुरा* = अश्वशाला |
| दंष्ट्रा* = दाढ़ | परीक्षा* = जाँच | मरीचिका = मृगतृष्णा |
| दारा* = स्त्री¹ | पाठशाला = विद्यालय | माया = प्रकृति, छल |
| १ संस्कृतसाहित्य में स्त्रीवाची 'दार' शब्द ही बहुधा प्रयुक्त होता है । तब यह अदन्त | ||
| पुंल्लिङ्ग तथा नित्यबहुवचनान्त हुआ करता है । यथा— | ||
| आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद्धनैरपि । | ||
| आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि ॥ (महाभारत १.१५६ २७) | ||
| दशरथदारानधिष्ठाय भगवान् वसिष्ठः प्राप्त । (उत्तररामचरित, अङ्क ४) | ||
| एते वयममी दाराः । (कुमार० ६ ६३) | ||
| परन्तु यह क्वचित् आबन्त भी मिलता है । तब यह बहुवचनान्त नहीं होता । | ||
| यथा— | ||
| क्रोडा हारा तथा दारा त्रय एते यथाक्रमम् । | ||
| क्रोडे हारे च दारेषु शब्दाः प्रोक्ता मनीषिभिः ॥ |