भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 301, कुल 633 में से

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पृष्ठ 301

२८६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् 'रमा + औ' यहां पूर्वसवर्णदीर्घ का दीर्घाज्जसि च (१६२) से निषेध हो वृद्धि- रेचि (३३) से वृद्धि प्राप्त होती है। इस पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१६) औङ आपः ।७।१।१८॥ आवन्तादङ्गात् परस्य औङः शी स्यात् । 'औङ्' इत्यौकारविभक्तेः सञ्ज्ञा । रमे । रमाः ॥ अर्थः—आवन्त अङ्ग से परे औङ् को शी आदेश हो। 'औङ्' यह औकार- विभक्ति—'औ' और 'औट्' की प्राचीन सञ्ज्ञा है। व्याख्या—आपः ।५।१। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य इस अधिकृत का विभक्ति- विपरिणाम हो जाता है)। औङः ।६।१। शी ।१।१। (जसः शी से)। 'आपः' यह 'अङ्गात्' पद का विशेषण है अत इस से तदन्तविधि हो कर 'आवन्ताद् अङ्गात्' बन जाता है। अर्थ—(आप ) आवन्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (ओङ ) ओङ् के स्थान पर (शी) शी आदेश होता है। पाणिनि से पूर्ववर्ती आचार्य प्रथमा तथा द्वितीया के द्विवचन को 'ओङ्' कहते थे। महामुनि पाणिनि ने भी उसी सञ्ज्ञा का यहां अपने शास्त्र में व्यवहार किया है। 'रमा + औ' यहां आवन्त अङ्ग रमा से परे औङ् को शी आदेश हुआ। अब स्थानिवद्भाव से 'शी' में प्रत्ययत्व ला कर प्रत्यय के आदि शकार की लशक्वतद्धिते (१३६) से इत्सञ्ज्ञा और तस्य लोपः (३) से लोप हो—रमा + ई। पुनः आद् गुणः (२७) से गुण एकादेश करने से 'रमे' प्रयोग सिद्ध होता है। 'रमा + अस्' (जस्) यहां पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है, उस का दीर्घाज्जसि च (१६२) से निषेध हो जाता है। अब अकः सवर्णे दीर्घ (४२) से सवर्णदीर्घ हो कर रुत्व विसर्ग करने से 'रमा' प्रयोग सिद्ध होता है। 'हे रमा + स्' यहां सम्बुद्धि में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१७) सम्बुद्धौ च ।७।३।१०६॥ आप एकारः स्यात् सम्बुद्धौ। एङ्घ्रस्वात्० (१३४) इति सम्बुद्धि- लोपः । हे रमे !, हे ग्‍मे !, हे रमाः ! । रमाम्र् । रमे । रमाः ॥ अर्थ —सम्बुद्धि परे होने पर 'आप्' को 'ए' आदेश हो। व्याख्या—सम्बुद्धौ ।७।१। च इत्यव्ययपदम्। आप ।६।१। (आङि चापः से)। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। एत् ।१।१। (बहुवचने झल्येत् से)। 'अङ्गस्य' का विशेषण होने से 'आपः' से तदन्तविधि हो कर 'आवन्तस्य अङ्गस्य' बन जायेगा। अर्थ—(सम्बुद्धौ) सम्बुद्धि परे होने पर (आप = आवन्तस्य) आवन्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (एत्) एकार आदेश हो। अलोऽन्त्यपरिभाषा से अन्त्य आकार को एकार आदेश होगा। 'हे रमा + स्' यहां 'स्' यह सम्बुद्धि परे है ही अत प्रवृत्तसूत्र से आकार को

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