भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 302, कुल 633 में से

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पृष्ठ 302

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २८७ एकार हो गया । तब 'हे रमे + स्' इस स्थिति में एङ्ह्रस्वात्० (१३४) सूत्र से सम्बुद्धि के सकार का लोप करने से 'हे रमे !' रूप सिद्ध होता है। सम्बोधन के द्विवचन और बहुवचन में प्रथमा के समान प्रक्रिया होती है— हे रमे !, हे रमाः । ध्यान रहे कि सम्बोधन के एकवचन और द्विवचन में एक समान रूप बनने पर भी प्रक्रिया में बड़ा अन्तर है। 'रमा + अम्' यहां अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप हो कर—रमाम् । द्वितीया के द्विवचन में प्रथमावत् 'रमे' रूप बनता है। द्वितीया के बहुवचन में 'रमा + अस्' (शस्) इस स्थिति में दीर्घ से परे जस् वा इच्छ् वर्त्तमान न होने से दीर्घाज्जसि च (१६२) से पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध न हुआ। अतः पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर रुत्व विसर्ग करने से—'रमाः' प्रयोग सिद्ध हुआ। ध्यान रहे कि तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७) सूत्र पुंल्लिङ्ग में ही शस् के सकार को नकार आदेश करता है अतः यहां स्त्रीलिङ्ग में उस की प्रवृत्ति न होगी। 'रमा + आ' (टा) यहां सवर्णदीर्घ प्राप्त होने पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१८) आङि चापः। ७।३।१०५॥ आङि ओसि चाप एकारः । रमया । रमाभ्याम् । रमाभिः ॥ अर्थः—आङ् अथवा ओस् परे हो तो 'आप्' को 'ए' आदेश हो । व्याख्या—आङि ।७।१। ओसि ।७।१। (ओसि च से)। च इत्यव्ययपदम् । आपः ।६।१। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। एत् ।१।१। (बहुवचने झल्येत् से) 'आपः' यह 'अङ्गस्य' पद का विशेषण है, अतः तदन्तविधि हो कर 'आवन्तस्य अङ्गस्य'। बन जायेगा । अर्थः—(आङि) आङ् (च) अथवा (ओसि) ओस् परे होने पर (आपः =आवन्तस्य) आवन्त (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर एकार आदेश हो। अलोऽन्त्यपरिभाषा से अन्त्य आकार के स्थान पर ही एकार आदेश होगा। 'टा' विभक्ति को ही पूर्वाचार्य 'आङ्' कहते हैं—यह पीछे (१७१) सूत्र पर स्पष्ट हो चुका है। 'रमा + आ' इस दशा में आङ् परे रहने पर आवन्त अङ्ग 'रमा' के अन्त्य आकार को एकार हुआ। तब एचोऽयवायावः (२२) सूत्र से एकार को 'अय्' हो कर 'रमया' रूप सिद्ध हुआ। रमा + भ्याम् = रमाभ्याम् । रमा + भिस् = रमाभिः । यहां अत् = ह्रस्व अकार से परे न होने के कारण 'भिस्' को 'ऐस्' नहीं हुआ। 'रमा + ए' (ङे) यहां वृद्धि के प्राप्त होने पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१६) याडापः ।७।३।११३॥ आपो ङितो याट् । वृद्धिः--रमायै । रमाभ्याम् २ । रमाभ्यः २ । रमायाः २ । रमयोः २ । रमाणाम् । रमायाम् । रमासु ॥ अर्थः—आवन्त अङ्ग से परे ङित् वचनों को 'याट्' आगम हो । व्याख्या—याट् ।१।१। आपः ।५।१। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य इस अधिकृत का

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