लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् विभक्तिविपरिणाम हो जाता है)। ङित् ।६।१। (घेङिति से विभक्तिविपरिणामद्वारा)। अर्थ -(आप् = आवन्तात्) आवन्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (ङित्) ङित् का अवयव (याट्) याट् हो। याट् में टकार इत्सञ्ज्ञक है, अतः उस का लोप हो जाता है। टित् होने से याट् ङित् का आद्यवयव होता है। ङे, ङसिँ, ङस्, ङि -ये चार ङित् होते हैं। 'रमा+ए' इस अवस्था में आवन्त अङ्ग 'रमा' से परे ङित् प्रत्यय 'ङे' को 'याट्' का आगम हुआ। तब 'रमा+या ए' इस स्थिति में वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश हो कर 'रमायै' रूप सिद्ध हुआ।¹ पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन में 'रमा+अस्' इस अवस्था में प्रकृतसूत्र से याट् आगम हो अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ करने पर 'रमायाः' रूप बनता है। षष्ठी और सप्तमी के द्विवचन में 'रमा+ओस्' इस दशा में आङि चापः (२१९) से मकारोत्तर आकार को एकार हो अय् आदेश करने से 'रमयोः' सिद्ध होता है। षष्ठी के बहुवचन में 'रमा+आम्' इस अवस्था में आवन्त होने से ह्रस्व- नद्यापो नुट् (१४८) से नुट् आगम तथा अट्कुप्वाङ्० (१३८) से नकार को णकार हो कर 'रमाणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है।² सप्तमी के एकवचन में 'रमा+ङि' इस अवस्था में ङेराम्नद्याम्नीभ्यः (१६८) सूत्र से 'ङि' को 'आम्' आदेश हो आम् में स्थानिवद्भाव से ङित्त्व ला कर याडापः (२१६) से याट् का आगम हो जाता है। तब 'रमा+या आम्' इस स्थिति में सवर्ण- दीर्घ करने से 'रमायाम्' प्रयोग सिद्ध होता है। ―― सप्तमी के बहुवचन में 'रमा+सु' इस दशा में इण् या कवर्ग न होने से आदेश- प्रत्यययोः (१५०) से षत्व नहीं होता―'रमासु'। रमाशब्द की रूपमाला यथा― प्र० रमा रमे रमाः प० रमायाः रमाभ्याम् रमाभ्यः द्वि० रमाम् " " ष० " रमयोः रमाणाम् तृ० रमया रमाभ्याम् रमाभिः म० रमायाम् " रमासु च० रमायै " रमाभ्यः स० हे रमे ! हे रमे ! हे रमा ! [लघु०] एवं दुर्गाऽम्बिकादयः ॥ अर्थ ―इसी प्रकार दुर्गा, अम्बिका आदि आकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप बनेंगे। १. ध्यान रहे कि यहा आगम 'याट्' है, आट् नही, अत आटश्च (१६७) सूत्र प्रवृत्त न होगा। समुदायो ह्यर्थवान् तस्यैकदेशोऽनर्थकः (समुदाय ही सार्थक होता है उस का एकदेश अनर्थक होता है)। २. 'रमा+नाम्' इत्यत्र पर्जन्यवल्लक्षणप्रवृत्ति रितिपरिभाषया दीर्घस्यापि दीर्घं इति केचिदाहुः। वस्तुतस्तु नैतादृशेषु मुधा सूत्रप्रवृत्तिः।