भारतकोश
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लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

२८८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् विभक्तिविपरिणाम हो जाता है)। ङित् ।६।१। (घेङिति से विभक्तिविपरिणामद्वारा)। अर्थ -(आप् = आवन्तात्) आवन्त (अङ्गात्) अङ्ग से परे (ङित्) ङित् का अवयव (याट्) याट् हो। याट् में टकार इत्सञ्ज्ञक है, अतः उस का लोप हो जाता है। टित् होने से याट् ङित् का आद्यवयव होता है। ङे, ङसिँ, ङस्, ङि -ये चार ङित् होते हैं। 'रमा+ए' इस अवस्था में आवन्त अङ्ग 'रमा' से परे ङित् प्रत्यय 'ङे' को 'याट्' का आगम हुआ। तब 'रमा+या ए' इस स्थिति में वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश हो कर 'रमायै' रूप सिद्ध हुआ।¹ पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन में 'रमा+अस्' इस अवस्था में प्रकृतसूत्र से याट् आगम हो अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ करने पर 'रमायाः' रूप बनता है। षष्ठी और सप्तमी के द्विवचन में 'रमा+ओस्' इस दशा में आङि चापः (२१९) से मकारोत्तर आकार को एकार हो अय् आदेश करने से 'रमयोः' सिद्ध होता है। षष्ठी के बहुवचन में 'रमा+आम्' इस अवस्था में आवन्त होने से ह्रस्व- नद्यापो नुट् (१४८) से नुट् आगम तथा अट्कुप्वाङ्० (१३८) से नकार को णकार हो कर 'रमाणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है।² सप्तमी के एकवचन में 'रमा+ङि' इस अवस्था में ङेराम्नद्याम्नीभ्यः (१६८) सूत्र से 'ङि' को 'आम्' आदेश हो आम् में स्थानिवद्भाव से ङित्त्व ला कर याडापः (२१६) से याट् का आगम हो जाता है। तब 'रमा+या आम्' इस स्थिति में सवर्ण- दीर्घ करने से 'रमायाम्' प्रयोग सिद्ध होता है। ―― सप्तमी के बहुवचन में 'रमा+सु' इस दशा में इण् या कवर्ग न होने से आदेश- प्रत्यययोः (१५०) से षत्व नहीं होता―'रमासु'। रमाशब्द की रूपमाला यथा― प्र० रमा रमे रमाः प० रमायाः रमाभ्याम् रमाभ्यः द्वि० रमाम् " " ष० " रमयोः रमाणाम् तृ० रमया रमाभ्याम् रमाभिः म० रमायाम् " रमासु च० रमायै " रमाभ्यः स० हे रमे ! हे रमे ! हे रमा ! [लघु०] एवं दुर्गाऽम्बिकादयः ॥ अर्थ ―इसी प्रकार दुर्गा, अम्बिका आदि आकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों के रूप बनेंगे। १. ध्यान रहे कि यहा आगम 'याट्' है, आट् नही, अत आटश्च (१६७) सूत्र प्रवृत्त न होगा। समुदायो ह्यर्थवान् तस्यैकदेशोऽनर्थकः (समुदाय ही सार्थक होता है उस का एकदेश अनर्थक होता है)। २. 'रमा+नाम्' इत्यत्र पर्जन्यवल्लक्षणप्रवृत्ति रितिपरिभाषया दीर्घस्यापि दीर्घं इति केचिदाहुः। वस्तुतस्तु नैतादृशेषु मुधा सूत्रप्रवृत्तिः।

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २८१ व्याख्या—हम बालकों के लिये अत्यन्त उपयोगी कुछ शब्दों का सङ्ग्रह यहां दे रहे हैं। इन का उच्चारण रमावत् होता है। इन में भी पूर्ववत् '' इस चिह्न वाले स्थानों में णत्वविधि जान लेनी चाहिये— शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ अङ्गना = स्त्री | उपमा = सादृश्य | गवेषणा = खोज अचला = पृथ्वी | उपेक्षा = लापरवाही | गुञ्जा = रत्ती अजा = बकरी | उमा = पार्वती | गुटिका = गोली अट्टालिका = अटारी | उर्वरा* = उपजाऊ भूमि | गुडाका = निद्रा अनित्यता = नश्वरता | उषा* = प्रभात | गुहा = गुफ़ा अनुज्ञा = आज्ञा | एला = इलायची | गोशाला = गो-स्थान अमावस्या = अमावस | कथा = कहानी | ग्रीवा* = गर्दन अयोध्या = प्रसिद्ध नगर | कनीनिका = नेत्र-पुतली | घटा = मेघमाला अर्चा = पूजा, मूर्ति | कन्था = गोदड़ी | घृणा = दया, अरुचि अवस्था = हालत | कन्या = कुंवारी लड़की | घोषणा = ढिंढोरा अविद्या = अज्ञान | कपर्दिका = कौड़ी | चन्द्रिका* = चान्दनी अशनाया = भूख | कला = अंश | चपला = विद्युत् असिधेनुका = छुरी | कल्पना = रचना | चर्चा = लेप, विचार अहिंसा = हिंसा न करना | कविका = लगाम | चर्या* = चालचलन आकाङ्क्षा* = इच्छा | कशा = चाबुक | चिकित्सा = इलाज आख्या = नाम | कस्तूरिका* = कस्तूरी | चिकीर्षा* = करणेच्छा आज्ञा = हुक्म | कान्ता = मनोहरा | चिता = चिता आत्मजा = पुत्री | काष्ठा = दिशा | चिन्ता = फ़िकर आपगा = नदी | कुत्सा = निन्दा | चूड़ा = चोटी आशङ्का = शक | कुलटा = व्यभिचारिणी | चेतना = समझ, ज्ञान आशा = दिशा, आशा | कुल्या = नहर | चेष्टा = हरकत आस्था = पूज्यबुद्धि | कृपा* = दया | छटा = चमक इच्छा = चाह | केका = मयूर-वाणी | छाया = छाया इज्या = यज्ञ | कौशल्या = राममाता | छिक्का = छींक इन्दिरा* = लक्ष्मी | क्षपा* = रात्रि | छुरिका* = छुरी ईप्सा = पाने की इच्छा | क्षमा* = माफ़ी | जटा = जटा ईर्ष्या* = डाह | क्षुधा = भूख | जडता = मूर्खता ईहा = इच्छा, चेष्टा | क्ष्मा* = पृथिवी | जनता = जनसमूह उग्रता = भयानकता | खेला = खेल | जलौका = जोंक उत्कण्ठा = प्रबल इच्छा | गङ्गा = प्रसिद्ध नदी | जाया = स्त्री उपकार्या* = तम्बू | गदा = गदा | जिज्ञासा = ज्ञानेच्छा ल० प्र० (१६)

२६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

शब्द—अर्थशब्द—अर्थशब्द—अर्थ
जिह्वा = जीभदीर्घिका* = बावड़ीपिपासा = प्यास
जीविका = गुजारादुर्गा* = पार्वतीपिपीलिका = चींटी
जुगुप्सा = निन्दादूषिका* = नेत्रों का मलपीडा = दुःख
ज्या = धनुष की डोरीदेवता = इन्द्र आदिपूर्णिमा = पूर्णमासी
ज्योत्स्ना = चाँदनीदोला = पालकी, पींगप्रतिज्ञा = प्रण
झञ्झा = तूफानद्राक्षा* = अगूरप्रतिपदा = पड़वा तिथि
तनया = पुत्रीधरा* = पृथ्वीप्रतिभा = प्रत्युत्पन्न बुद्धि
तन्द्रा* = ऊँघनाधारणा = विचारप्रतिमा = मूर्ति
तपस्या = तपस्याधारा* = धारप्रतिष्ठा = इज्जत
तमिस्रा* = अन्धेरी रातनवोढा = नवविवाहिताप्रभा* = दीप्ति
तारा* = तारानासा = नासिकाप्रसन्नता = खुशी
तितिक्षा* = सहनशीलतानित्यता = सदा होनाप्रसूता = प्रसूत हुई
तुला = तराजूनिद्रा* = नींदप्रहेलिका = पहेली
तृषा* = प्यासनिन्दा = शिकायतबाधा = रुकावट
तृष्णा = लालचनिशा = रात्रिबुभुक्षा* = भूख
त्रपा* = लज्जानिष्ठा = स्थितिभाषा* = बोली
त्रिपथगा = गङ्गानौका = किश्तीभ्रातृजाया = भ्रातृपत्नी
त्रियामा* = रात्रिपताका = झण्डीमज्जा = अस्थिसार
त्रेता = त्रेतायुगपतिव्रता = पतिव्रतामञ्जूषा* = पेटी
त्वरा* = शीघ्रतापद्मा = लक्ष्मीमथुरा* = प्रसिद्ध नगरी
दया = रहमपरम्परा* = सिलसिलामदिरा* = शराब
दशा = हालतपरिचर्या* = सेवामन्दुरा* = अश्वशाला
दंष्ट्रा* = दाढ़परीक्षा* = जाँचमरीचिका = मृगतृष्णा
दारा* = स्त्री¹पाठशाला = विद्यालयमाया = प्रकृति, छल
१ संस्कृतसाहित्य में स्त्रीवाची 'दार' शब्द ही बहुधा प्रयुक्त होता है । तब यह अदन्त
पुंल्लिङ्ग तथा नित्यबहुवचनान्त हुआ करता है । यथा—
आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद्धनैरपि ।
आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि ॥ (महाभारत १.१५६ २७)
दशरथदारानधिष्ठाय भगवान् वसिष्ठः प्राप्त । (उत्तररामचरित, अङ्क ४)
एते वयममी दाराः । (कुमार० ६ ६३)
परन्तु यह क्वचित् आबन्त भी मिलता है । तब यह बहुवचनान्त नहीं होता ।
यथा—
क्रोडा हारा तथा दारा त्रय एते यथाक्रमम् ।
क्रोडे हारे च दारेषु शब्दाः प्रोक्ता मनीषिभिः ॥

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २६१ शब्द — अर्थ | शब्द — अर्थ | शब्द — अर्थ माला = माला | वन्ध्या = वाञ्झ | शारदा = सरस्वती मुद्रा* = मोहर | वरटा = हंस-मादा | शाला = घर मूषा* = कुठाली | वर्त्तिका = बटेर | शिक्षा* = उपदेश मृत्सा = अच्छी मिट्टी | वसा = चरबी | शिञ्जा = भूषणध्वनि मृत्स्ना = अच्छी मिट्टी | वसुधा = पृथ्वी | शिला = पत्थर मृद्वीका = द्राक्षा | वाटिका = फुलबगिया | शिवा = दुर्गा, गीदड़ी मेखला = कमरबन्द | वात्या = आंधी | शिविका = पालकी यवनिका = पर्दा | वामा = सुन्दरी | शोभा = चमक यातना = तीव्र वेदना | वाराङ्गना = वेश्या | श्रद्धा = विश्वास यात्रा* = प्रस्थान | वार्त्ता = संवाद | श्लाघा = प्रशंसा रक्षा* = पालना | वालुका = रेत | सङ्ख्या = सङ्ख्या रचना = बनाना, कृति | विचिकित्सा = संशय | सञ्ज्ञा = नाम रजस्वला = रजस्वला स्त्री | विजया = भांग | सत्क्रिया* = सत्कार रथ्या = गली | विद्या = विद्या | सधवा = जीवितभर्तृका रसना = जीभ | विधवा = पतिरहिता | सन्ध्या = साझ राका* = पूर्णमासी | विसूचिका = हैज़ा रोग | सपर्या* = सेवा राधा = प्रसिद्ध गोपी | विष्ठा = टट्टी, मल | सभा = सभा रुजा = रोग, पीड़ा | वीणा = वाद्यविशेष | समझ = यश रेखा* = लकीर | वेदना = दुःख | सरघा* = मधुमक्खी लक्षणा = शक्ति-विशेष | वेला = समुद्रतट | सरटा = छिपकली लता = वेल | वेश्या = पण्य-स्त्री | सहायता = मदद लाक्षा* = लाख | व्यथा = दुःख | सहिष्णुता = सहनशीलता लालसा = अभिलाषा | व्यवस्था = नियम | सास्ना = गलकम्बल लाला = लार | शकुन्तला = दुष्यन्त-पत्नी | सीमा¹ = हद लिप्सा = लाभेच्छा | शङ्का = शक | सुता = लड़की लीला = क्रीडा | शय्या = शयनस्थान | सुधा = अमृत लेखा = रेखा | शर्करा* = शक्कर | सुरा* = शराब वडवा = घोड़ी | शलाका = सलाई | सुषमा* = बहुत शोभा वनिता = स्त्री | शाखा = टहनी | सेना = फ़ौज श्रीमद्भागवत में एकवचनान्त दारा शब्द प्रयुक्त भी हुआ है। यथा— अप्येकाम् आत्मनो दारां नृणां स्वत्वग्रहो यथा। (भागवत ७.१४.११) श्रीहेमचन्द्राचार्य 'दार' शब्द को एकवचनान्त भी मानते हैं। उन्होंने किसी ग्रन्थ का प्रयोग भी उद्धृत किया है—धर्मप्रजासम्पन्ने दारे नान्यं कुर्वीत इति। १. यह शब्द नकारान्त स्त्रीलिङ्ग भी होता है।

२६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ सेवा=सेवा | स्पृहा*=इच्छा | हिक्का=हिचकी सोदर्या*=सगी बहन | स्वतन्त्रता=आज़ादी | हिमाद्रिजा=पार्वती स्पर्धा=बराबरी करना | हरिद्रा*=हल्दी | हेषा*=हिनहिनाहट २६२—होरा*=एक घण्टा। आकारान्तस्त्रीलिङ्गो मे 'रमा' शब्द की अपेक्षा सर्वनाम तथा कुछ अन्य शब्दो मे थोडा अन्तर पडता है, अब उस प्रसग मे प्रथम सर्वनामशब्दो का वर्णन करते हैं— 'सर्व' शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा मे 'टाप्' प्रत्यय करने से 'सर्वा' शब्द निष्पन्न होता है। लिङ्गविशिष्टपरिभाषा¹ से इस की भी सर्वत्र सर्वनामसञ्ज्ञा हो जाती है। ङित् विभक्तियो और आम् को छोड़ कर शेष सब विभक्तियो मे इस की 'रमा'शब्दवत् प्रक्रिया तथा उच्चारण होता है। 'सर्वा+ए' (ङे)। यहा याडाप (२१६) द्वारा याट् का आगम प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि सूत्रम्—(२२०) सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च ।७।३।११४॥ आवन्तात् सर्वनाम्नो ङित स्याट् स्याद्, आपश्च ह्रस्व.। सर्वस्यै। सर्वस्याः २। सर्वासाम्। सर्वस्याम्। शेष रमावत् ॥ अर्थः—आवन्त सर्वनाम से परे ङित् प्रत्ययो को 'स्याट्' का आगम हो और साथ ही आवन्त अङ्ग के आप् को ह्रस्व भी हो। व्याख्या—आपः ।५।१। (याडापः से)। सर्वनाम्न ।५।१। ङित ।६।१। (घेङिति से विभक्तिविपरिणाम द्वारा)। स्याट् ।१।१। ह्रस्व ।१।१। [सूत्रपाठे तु—झलां जशोऽन्ते इति जश्त्वे झयो होऽन्यतरस्याम् इति पूर्वसवर्णत्वे च कृते 'स्याड्ढ्रस्व' इति प्रयोग प्रयुज्यते] । च इत्यव्ययपदम्। 'सर्वनाम्न' का विशेषण होने मे 'आप' मे १ युवा खलति-पलित-वलिन-जरतीभि (२ १ ६७) इस सूत्र द्वारा 'युवन्' शब्द का 'खलति, पलित, वलिन, जरती' इन समानाधिकरण शब्दो के साथ कर्मधारयसमास बताया गया है। इन शब्दो मे 'जरती' शब्द स्त्रीलिङ्ग है। 'जरती' शब्द का 'युवन्' इस पुल्लिङ्ग के साथ तब तक सामानाधिकरण्य नही हो सकता जब तक 'युवन्' को 'युवति' न बना दिया जाये। इस प्रकार 'जरती' शब्द के ग्रहण से यह प्रतीत होता है कि आचार्य पाणिनि—'युवन्' के ग्रहण से 'युवति' इस स्त्रीलिङ्ग का भी ग्रहण चाहते हैं। अत एव यह परिभाषा निष्पन्न होती है—प्रातिपदिकग्रहणे लिङ्ग- विशिष्टस्यापि ग्रहणम्। अर्थात् प्रातिपदिक के ग्रहण होने पर उस प्रातिपदिक के विशेष लिङ्गो का भी ग्रहण हो जाता है। यथा—'युवन्' के ग्रहण से 'युवति' का ग्रहण होता है। इसी प्रकार सर्वनामसञ्ज्ञा करते समय सर्वादिगण मे सर्वा आदि स्त्रीलिङ्गो का भी समावेश समझ लेना चाहिये। इस परिभाषा का सङ्क्षिप्त नाम लिङ्गविशिष्टपरिभाषा है।

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २६३ तदन्तविधि हो कर ‘आवन्तात्’ बन जाता है। अर्थ करते समय इस की आवृत्ति की जाती है। अर्थः— (आपः = आवन्तात्) आवन्त (सर्वनाम्नः) सर्वनाम से परे (ङितः) ङित् वचनों का अवयव (स्याट्) ‘स्याट्’ हो जाता है (च) और साथ ही (आपः= आवन्तस्य) आवन्त के स्थान पर (ह्रस्वः) ह्रस्व आदेश हो जाता है। ङे, ङसिं, ङस्, ङि—ये चार ङित् विभक्तियां हैं; इन में याट् का आगम प्राप्त था, इस सूत्र से स्याट् का आगम विधान किया जाता है। अतः यह सूत्र याडापः (२१६) सूत्र का अपवाद है। ‘स्याट्’ में टकार इत्सञ्ज्ञक है, अतः टित् होने से ङित् प्रत्यय का आद्यवयव होता है। अलोऽन्त्यपरिभाषा से आवन्त के अन्त्य आकार को ह्रस्व होता है। ‘सर्वा+ए’ (ङे) यहां प्रकृतसूत्र से ‘स्याट्’ का आगम तथा आप् को ह्रस्व हो कर ‘सर्व+स्या ए’ हुआ। अब वृद्धिरेचि (३३) सूत्र से वृद्धि एकादेश करने पर ‘सर्वस्यै’ प्रयोग सिद्ध होता है। पञ्चमी वा षष्ठी के एकवचन में ‘सर्वा+अस्’ (ङसिं वा ङस्)। अब स्याट् का आगम और आप् को ह्रस्व हो कर सवर्णदीर्घ करने से—‘सर्वस्याः’। षष्ठी के बहुवचन में ‘सर्वा+आम्’ इस स्थिति में आमि सर्वनाम्नः सुँट् (१५५) से सुँट् आगम हो कर अनुबन्धलोप करने से ‘सर्वासाम्’ प्रयोग सिद्ध होता है। ‘ङि’ में ‘सर्वा+ङि’ इस दशा में ङेराम्नद्याम्नीभ्यः (१६८) से ङि को आम् आदेश और प्रकृतसूत्र से ‘स्याट्’ का आगम और आप् को ह्रस्व हो कर सवर्णदीर्घ करने से ‘सर्वस्याम्’ रूप बनता है। ‘सर्वा’ शब्द की रूपमाला यथा— *प्र० सर्वा सर्वे सर्वाः प० सर्वस्याः सर्वाभ्याम् सर्वाभ्यः द्वि० सर्वाम् ,, ,, ष० ,, सर्वयोः सर्वासाम् तृ० सर्वया सर्वाभ्याम् सर्वाभिः स० सर्वस्याम् ,, सर्वासु च० सर्वस्यै ,, सर्वाभ्यः सं० हे सर्वै! हे सर्वे! हे सर्वाः! [लघु०] एवं विश्वादय आवन्ताः ॥ अर्थः—इसीप्रकार ‘विश्वा’ आदि आवन्त सर्वनामों की प्रक्रिया होती है। व्याख्या—निम्नलिखित आवन्त सर्वनामों के रूप ‘सर्वा’ शब्दवत् होते हैं— १. विश्वा। २. उभा¹। ३. कतरा²। ४. कतमा। ५. यतरा। ६. यतमा। १. ‘उभा’ शब्द सदा द्विवचनान्त ही प्रयुक्त होता है। अतः यहां इस में कोई सर्व- नामकार्य नहीं होता। अहश्च रात्रिश्च उभे च सन्ध्ये धर्मश्च जानाति नरस्य वृत्तम् (पञ्चतन्त्र १.४३८)। ‘उभय’ शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा में ‘टाप्’ प्रत्यय नहीं होता किन्तु गौरादिगण में पाठ होने के कारण अथवा तयप्प्रत्ययान्त होने से टिड्ढाणञ्० (१२४७) सूत्र से ‘ङीप्’ प्रत्यय हो कर ‘उभयी’ शब्द निष्पन्न होता है। इस का द्विवचन में प्रयोग नहीं होता, उच्चारण ‘नदी’ शब्दवत् होता है। उभयीं सिद्धिमु- भाववापतुः (रघुवंश ८.२३)। २. ‘कतरा’ आदि आठ शब्द डतरप्रत्ययान्त और डतमप्रत्ययान्त हैं। इन का पीछे

३६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् ७. ततरा । ८. ततमा । ६. एकतरा । १०. एकतमा । ११. अन्या । १२. अन्यतरा¹ । १३. इतरा । १४. त्वा । १५ नेमा² । १६. समा³ । १७ सिमा । १८. पूर्वा⁴ । १६. परा । २०. अवरा । २१. दक्षिणा । २२. उत्तरा । २३ अपरा । २४. अधरा । २५. स्वा । २६ अन्तरा । २७ एका⁵ । उत्तरस्याश्च पूर्वस्याश्च दिशोर अन्तराला दिक् = उत्तरपूर्वा⁶ । दिङ्नामान्य- न्तराले (२२२६) इति बहुव्रीहि, सर्वनाम्नो वृत्तिमात्रे पुंवद्भाव. इति पुंवद्भाव । १. पूर्व, २ पश्चिम, ३ उत्तर और ४ दक्षिण ये चार दिशाए होती हैं । दो दिशाओ के बीच मे आने वाला कोना 'उपदिशा' कहलाता है । इस प्रकार उपदिशाए भी चार हो जाती हैं । यथा— (१६६) पृष्ठ पर स्पष्टीकरण कर चुके हैं । १. इसे इतरप्रत्ययान्त नही समझना चाहिये । 'अन्य' शब्द से डतर और डतम प्रत्ययो का विधान नही । अन्यतर और अन्यतम शब्द स्वतन्त्र अव्युत्पन्न है । इन मे से प्रथम 'अन्यतर' शब्द सर्वादिगण मे पठित होने से सर्वनामसञ्ज्ञक है, दूसरा नही । अत 'अन्यतमा' शब्द का 'रमा'शब्दवत् उच्चारण होता है । २. 'अर्ध' अर्थ मे ही इस की सर्वनामत्ता इष्ट है, अन्यथा 'रमा'शब्दवत् उच्चारण होगा । प्रथमचरम० (१६०) सूत्र का स्त्रीलिङ्ग मे कुछ प्रभाव नही पडता । ३. 'सर्व' अर्थ मे ही सर्वनामत्ता इष्ट है । 'तुल्य' अर्थ मे 'रमा'शब्दवत् उच्चारण होगा । ४. पूर्वा' आदि नौ शब्दो का उच्चारण सर्वावत् ही होता है, कुछ भी अन्तर नही पडता । यद्यपि जस् मे इन की सर्वनामसञ्ज्ञा (१५६, १५७, १५८) सूत्रो से विकल्प कर के होती है, तथापि इस से यहा स्त्रीलिङ्ग मे कोई भेद नही पडता; क्योकि यहा अदन्त न होने से जसः शी (१५२) सूत्र प्रवृत्त नही हो सकता । ध्यान रहे कि पूर्वादिभ्यो नवभ्यो वा (१५६) सूत्र ङसिं और ङि मे सर्वनाम- सञ्ज्ञा का विकल्प नही करता किन्तु स्मात् और स्मिन् आदेशो का ही विकल्प करता है। सर्वनामसञ्ज्ञा तो—इन मे भी नित्य बनी रहती है। अत एव 'पूर्वस्या', पूर्वस्याम्' आदि प्रयोगो मे सर्वनामतामूलक स्याट् आदि कार्य करने मे कोई बाधा उपस्थित नही होती । पाणिनि की बुद्धिमत्ता का यह एक ज्वलन्त प्रमाण है। ५ सङ्ख्येयवाची 'एका' शब्द एकवचनान्त ही प्रयुक्त होगा । अन्य, मुख्य आदि अर्थों मे इस का सब वचनो मे उच्चारण होगा । ६. प्राय. सब वैयाकरण यहा 'उत्तरस्याश्च पूर्वस्याश्च दिशोर्यदन्तरालम्' इस प्रकार विग्रह करते हैं । परन्तु बालको के लिये यह विग्रह कुछ कठिन है, क्योकि वे 'यद् अन्तरालम्' इस नपुंसक का 'उत्तरपूर्वा' इस स्त्रीलिङ्ग के साथ सम्बन्ध नही समझ सकते । अत उन के सौकर्यार्थ उपर्युक्त विग्रह रखा गया है ।

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २६५ उत्तर और पूर्व दिशा की मध्यवर्ती उपदिशा 'उत्तरपूर्वा' कहलाती है। 'उत्तर- पूर्वा' शब्द की प्रथम तीन विभक्तियों में रमाशब्दवत् प्रक्रिया होती है। चतुर्थी के एकवचन में 'उत्तरपूर्वा + ए' (ङे) इस स्थिति में सर्वादीनि सर्व- नामानि (१५१) सूत्र से नित्य सर्वनामसञ्ज्ञा होने के कारण सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च (२२०) से स्याट् का आगम और आप् को ह्रस्व नित्य प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र से सर्वनामसञ्ज्ञा का विकल्प किया जाता है— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(२२१) विभाषा दिक्समासे बहुव्रीहौ ।१।१।२७॥ सर्वनामता वा। उत्तरपूर्वस्यै, उत्तरपूर्वायै ॥ अर्थः—दिशाओं के बहुव्रीहिसमास में सर्वादि विकल्प से सर्वनामसञ्ज्ञक हों। व्याख्या—दिक्समासे ।७।१। बहुव्रीहौ ।७।१। सर्वादीनि ।१।३। विभाषा ।१।१। सर्वनामानि ।१।३। (सर्वादीनि सर्वनामानि से)। समासः—दिशां समासः = दिक्- समासः, तस्मिन् = दिक्समासे, षष्ठीतत्पुरुषः। अर्थः—(दिक्समासे बहुव्रीहौ) दिशाओं के बहुव्रीहिसमास में (सर्वादीनि) सर्वादिगणपठित शब्द (विभाषा) विकल्प कर के (सर्वनामानि) सर्वनामसञ्ज्ञक होते हैं। दिशाओं का बहुव्रीहिसमास दिङ्नामान्यन्तराले (२.२.२६) सूत्र से विधान किया जाता है। यहां उसी का ग्रहण अभीष्ट है। 'उत्तरपूर्वा' शब्द में दिशाओं का बहुव्रीहिसमास हुआ है, अतः प्रकृतसूत्र से इस की विकल्प कर के सर्वनामसञ्ज्ञा होगी। सर्वनामसञ्ज्ञापक्ष में सर्वाशब्दवत् स्याट् का आगम और आप् को ह्रस्व आदि कार्य होंगे। सर्वनामसञ्ज्ञा के अभाव में रमा- शब्दवत् याट् का आगम आदि कार्य होगे। आम् में सर्वनामपक्ष में सुट् आगम और तदभावपक्ष में नुट् आगम विशेष होगा। 'उत्तरपूर्वा' शब्द की रूपमाला यथा—

३६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् प्र० उत्तरपूर्वा उत्तरपूर्वे उत्तरपूर्वा द्वि० उत्तरपूर्वाम् " " तृ० उत्तरपूर्वया उत्तरपूर्वाभ्याम् उत्तरपूर्वाभिः च० उत्तरपूर्वस्यै, उत्तरपूर्वायै " उत्तरपूर्वाभ्यः प० उत्तरपूर्वस्या ,उत्तरपूर्वाया " " ष० " " उत्तरपूर्वयो उत्तरपूर्वासाम्,उत्तरपूर्वाणाम् स० उत्तरपूर्वस्याम्,उत्तरपूर्वायाम् " उत्तरपूर्वासु सं० हे उत्तरपूर्वे ! हे उत्तरपूर्वे ! हे उत्तरपूर्वा ! इसी प्रकार—दक्षिणपूर्वा, पूर्वोत्तरा, पश्चिमोत्तरा, पश्चिमदक्षिणा, पूर्वदक्षिणा आदि शब्दों के उच्चारण होते हैं¹। [लघु०] तीयस्येति वा सञ्ज्ञा । द्वितीयस्यै, द्वितीयायै । एव तृतीया ॥ व्याख्या—तीयस्य ङित्सु वा (वा० १६) द्वारा तीयप्रत्ययान्त द्वितीया (दूसरी) और तृतीया (तीसरी) शब्द केवल ङित् वचनों में ही विकल्प से सर्वनामसञ्ज्ञक होते हैं। अत 'ङे, ङसिं, ङस्, ङि' इन चार विभक्तियों मे दो दो रूप बनते हैं; अर्थात् जहा सर्वनामसञ्ज्ञा होती है वहा सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च (२२०) से स्याट् का आगम और आप् को ह्रस्व हो जाता है। सर्वनामसञ्ज्ञा के अभाव मे याडापः (२१६) से याट् का आगम हो जाता है। इस प्रकार ङिद्वचनों मे दो दो रूप बनते हैं। 'द्वितीया' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० द्वितीया द्वितीये द्वितीया द्वि० द्वितीयाम् " " तृ० द्वितीया द्वितीयाभ्याम् द्वितीयाभिः च० द्वितीयस्यै,द्वितीयायै " द्वितीयाभ्यः प० द्वितीयस्या.,द्वितीयायाः " " ष० " " द्वितीययो द्वितीयानाम् स० द्वितीयस्याम्, द्वितीयायाम् " द्वितीयासु सं० हे द्वितीये ! हे द्वितीये ! हे द्वितीया ! इसी प्रकार 'तृतीया' शब्द का उच्चारण होता है। ध्यान रहे कि तीयस्य ङित्सु वा (वा० १६) द्वारा आम् मे सर्वनामता नहीं होती; अतः पक्ष में सुँट् का यागम नही होता। 'उत्तरपूर्वा' और 'द्वितीया' के उच्चारण में यही अन्तर है। १. दिङ्नामान्यन्तराले (२ २.२६) सूत्र द्वारा होने वाले बहुव्रीहिसमास में पूर्वनिपात का कोई नियम नही होता। अत एव—दक्षिणपूर्वा, पूर्वदक्षिणा। पश्चिमदक्षिणा, दक्षिणपश्चिमा। पश्चिमोत्तरा, उत्तरपश्चिमा। उत्तरपूर्वा, पूर्वोत्तरा। इत्यादि रूप काशिका (२२२६) में दिये गये हैं। नक्षत्रत्रितय पादमाश्रित पूर्वदक्षिणम् (मार्कण्डेयपुराण ५८ २०) इत्यादि वचन भी इस मे प्रमाण हैं।

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २६७ [लघु०] अम्बार्थ० (१६५) इति ह्रस्वः—हे अम्ब!, हे अवक!, हे अल्ल !॥ व्याख्या—अम्बा, अक्का, अल्ला आदि शब्दों का अर्थ 'माता = पार्वती' है। इन की प्रक्रिया रमाशब्दवत् होती है; केवल सम्बुद्धि में ही कुछ विशेष है। सम्बुद्धि में अम्बार्थनद्योर्ह्रस्वः (१६५) से ह्रस्व हो कर एङ्ह्रस्वात् सम्बुद्धेः (१३४) से सुंलोप हो जाता है। इस प्रकार 'हे अम्ब!, हे अवक!, हे अल्ल !' आदि प्रयोग सिद्ध होते हैं। वक्तव्य—ध्यान रहे कि महाभाष्य में दो अच् वाले अम्बार्थकों को ही ह्रस्व करना बताया है। अम्बाडा, अम्बाला, अम्बिका आदि शब्द दो अच् वाले नहीं अपितु दो से अधिक अचों वाले हैं; अतः अम्बार्थक होने पर भी इन को ह्रस्व न होगा। हे अम्बाडे !, हे अम्बाले !, हे अम्बिके ! इत्यादिप्रकारेण रूप बनेंगे [दृश्यतां (७.३.१०७) सूत्रस्थं महाभाष्यम्—अम्बार्थे द्वयक्षरं यदि इति। सिद्धान्तकौमुद्यान्तु असंयुक्ता ये डलकास्तद्वतां ह्रस्वो न इति वार्त्तिकम्पठितम्, तदपि भाष्यानुसारि। परं सरलः पन्था- स्तु भाष्योक्त एव]। 'अम्बा' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० अम्बा अम्बे अम्बाः प० अम्बायाः अम्बाभ्याम् अम्बाभ्यः द्वि० अम्बाम् " " ष० " अम्बयोः अम्बानाम् तृ० अम्बया अम्बाभ्याम् अम्बाभिः स० अम्बायाम् " अम्बासु च० अम्बायै " अम्बाभ्यः सं० हे अम्ब ! हे अम्बे ! हे अम्बाः! इसी प्रकार—अक्का, अल्ला आदि शब्दों के रूप बनते हैं। नोट—'अल्ला' शब्द मुसलमानों ने बेतरह पकड़ रखा है; अम्बा, अल्ला आदि शब्द दुर्गा (शक्ति) के नाम माने जाते हैं। इसलिये सम्भव है कि मुसलमान शाक्त हिन्दुओं से निकले हों और कालक्रम से आचारादिभिन्नता के कारण इन से पृथक् हो गये हों—इस में आश्चर्य नहीं। इसी प्रकार ईसाइयों का 'गिरजाघर' भी शायद 'गिरिजा-गृह' ही हो; वे भी शाक्तों से निकले हों। [लघु०] जरा, जरसौ इत्यादि। पक्षे हलादौ च रमावत्॥ व्याख्या—जृष् वयोहानौ (दिवा० परस्मै०) धातु से स्त्रियाम्० (३.३.९४) : के अधिकार में ष्रिद्भिदादिभ्योऽङ् (३.३.१०४) सूत्र से अङ् प्रत्यय तथा ऋदृशोऽङि गुणः (७.४.१६) से अर् गुण हो कर टाप् प्रत्यय करने से 'जरा' शब्द निष्पन्न होता है। 'जरा' शब्द का अर्थ है—'बुढ़ापा'। अजादि विभक्तियों में सर्वत्र सर्वप्रथम जराया जरसन्यतरस्याम् (१६१) सूत्र से 'जरा' के स्थान पर 'जरस्' आदेश हो जाता है। जरस् के अभाव में रमाशब्दवत् प्रक्रिया होती है। रूपमाला यथा— प्र० जरा जरसौ, जरे जरसः, जराः द्वि० जरसम्, जराम् " " " " तृ० जरसा, जरया जराभ्याम् जराभिः

२६८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् च० जरसे, जरायै जराभ्याम् जराभ्यः प० जरसः, जरायाः जराभ्याम् जराभ्यः ष० " " जरसोः, जरयोः जरसाम्, जराणाम् स० जरसि, जरायाम् " " जरासु सं० हे जरे ! हे जरसौ!, हे जरे ! हे जरसः!, हे जराः ! नोट—'जरा+औ' यहां परत्व के कारण शी आदेश से पूर्व जरस् आदेश हो जाता है; यदि प्रथम शी आदेश होता तो 'जरसी' यह अनिष्ट रूप बन जाता । एवम् आगे भी जान लेना चाहिये । [लघु०] गोपा विश्वपावत् ॥ व्याख्या—गां पाति = रक्षतीति गोपाः । 'गो'कर्मोपपदात् पा रक्षणे (अदा० प०) इत्यस्माद्धातोः क्विपि लौकिके वा विचि 'गोपा'शब्दो निष्पद्यते । गौओ की रक्षा करने वाली स्त्री 'गोपा' कहाती है । 'गोपा' के अन्त में 'पा' धातु है आप् (टाप्) नही । 'गोपा+सुँ' । आवन्त न होने से हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सुँलोप नही होता । सकार को रुत्व विसर्ग हो कर—'गोपाः' सिद्ध होता है । 'गोपा+औ' यहां भी आवन्त न होने से औङ आपः (२१६) से शी आदेश । नही होता । पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होने पर उस का भी दीर्घाज्जसि च (१६२) से निषेध हो जाता है । अब वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश हो कर—'गोपौ' सिद्ध होता है । 'गोपा+अस्' (जस्) यहां भी पूर्ववत् पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध हो जाता है । तब अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ हो कर—'गोपाः' रूप बनता है । गोपा+अम् = गोपाम् । अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप होता है । 'गोपा+अस्' (शस्) यहां भसञ्ज्ञक आकार का आतो धातोः (१६७) से लोप हो कर 'गोपः' प्रयोग बनता है । इसी प्रकार आगे सर्वत्र भसञ्ज्ञको मे आकार का लोप हो जाता है । रूपमाला यथा— प्र० गोपा गोपौ गोपा | प० गोपः* गोपाभ्याम् गोपाभ्यः द्वि० गोपाम् " गोपः* | ष० " गोपोः* गोपाम्* तृ० गोपा* गोपाभ्याम् गोपाभिः | स० गोपि* " * गोपासु च० गोपे* " गोपाभ्यः | सं० हे गोपा ! हे गोपौ ! हे गोपाः !

  • इन स्थानो पर भसञ्ज्ञा हो कर आकार का लोप हो जाता है । इस की सम्पूर्ण प्रक्रिया अजन्तपुंल्लिङ्गान्तर्गत 'विश्वपा' शब्द के समान होती है । नोट—'क' प्रत्यय से सिद्ध 'गोप' शब्द से स्त्रीत्वविवक्षा में जातेरस्त्री० (१२६५) सूत्र से ङीष् प्रत्यय हो कर 'गोपी' शब्द बनता है । इस का अर्थ है—गोप जाति की स्त्री । इस का उच्चारण 'नदी' शब्द के समान होता है । (यहां आकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दो का विवेचन समाप्त होता है ।) ः ० ः

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् २६६ अब ह्रस्व इकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का वर्णन करते हैं— [लघु०] मतीः। मत्या॥ व्याख्या—मनँ ज्ञाने(दिवा० आ०) धातु से 'क्तिन्' प्रत्यय करने पर 'मति' शब्द सिद्ध होता है। मन्यतेऽनयेति मतिः। मननं वा मतिः। बुद्धि या ज्ञान को 'मति' कहते हैं। इस की प्रक्रिया ङिद्वचनों से अन्यत्र प्रायः 'हरि' शब्द के समान होती है। तथाहि— मति+सुँ = मतिः। सकार को रुँत्व तथा रेफ को विसर्ग हो जाता है। मति+औ = मती। प्रथमयोः० (१२६) से पूर्वसवर्णदीर्घ हो जाता है। 'मति+अस्' (जस्) इस स्थिति में जसि च (१६८) से इकार को एकार गुण हो कर अय्-आदेश करने से 'मतयः' रूप सिद्ध होता है। द्वितीया के बहुवचन में 'मति+अस्' (शस्) इस दशा में पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर सकार को रुँत्व विसर्ग हो जाते हैं—मतीः। ध्यान रहे कि तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७) सूत्र में 'पुंसि' कहने से यहां स्त्रीलिङ्ग में नकार आदेश नहीं होता। 'मति+आ' (टा) यहां घिसञ्ज्ञा रहने पर भी आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) द्वारा टा को ना नहीं होता; 'अस्त्रियाम्' कथन के कारण उस की स्त्रीलिङ्ग में प्रवृत्ति नहीं होती। इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'मत्या' सिद्ध होता है। 'मति+ए' (ङे) यहां घिसञ्ज्ञा होने से घेर्ङिति (१७२) द्वारा गुण प्राप्त होता है। अब अग्रिमसूत्र द्वारा पक्ष में नदीसञ्ज्ञा का विधान करते हैं— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(२२२) ङिति ह्रस्वश्च ।१।४।६।। इयँडुवँङ्स्थानौ स्त्रीशब्दभिन्नौ नित्यस्त्रीलिङ्गावीदूतौ, ह्रस्वौ च इवर्णोवर्णां स्त्रियां वा नदीसञ्ज्ञौ स्तो ङिति। मत्यै, मतये। मत्याः २, मतेः २॥ अर्थः—'स्त्री' शब्द को छोड़ कर इयँङुवँङ्स्थानी नित्यस्त्रीलिङ्ग ईकार ऊकार ङिद्वचनों में विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञक होते हैं। किञ्च—स्त्रीलिङ्ग में ह्रस्व इका- रान्त और ह्रस्व उकारान्त शब्द भी ङिद्वचनों में विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञक होते हैं। व्याख्या—ङिति ।७।१। ह्रस्वः ।१।१। च इत्यव्ययपदम्। इस सूत्र के दो खण्ड हैं। प्रथम यथा—अस्त्री ।१।१। इयँडुवँङ्स्थानौ ।१।२। (नेयँडुवँङ्स्थानावस्त्री से)। स्त्र्याख्यौ ।१।२। यू ।१।२। नदी ।१।१। (यू स्त्र्याख्यौ नदी से)। वा इत्यव्ययपदम्। (वाऽऽमि से)। ङिति ।७।१। समासः—न स्त्री=अस्त्री, नञ्तत्पुरुषः। स्त्रीशब्दं वर्ज- यित्वेत्यर्थः। इयँङ् च उवंङ् च=इयँडुवँङौ, इतरेतरद्वन्द्वः। इयँडुवँङोः स्थानं स्थिति- र्ययोस्तौ इयँडुवँङ्स्थानौ, बहुव्रीहिसमासः। स्त्रियमाचक्षाते इति स्त्र्याख्यौ, नित्यस्त्री- लिङ्गादित्यर्थः। ईश्च ऊश्च=यू, इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः—(अस्त्री) 'स्त्री' शब्द को छोड़ कर (इयँडुवँङ्स्थानी) जिन के स्थान पर इयँङ् उवँङ् आदेश होते हैं ऐसे (स्त्र्याख्यौ) नित्यस्त्रीलिङ्गी (यू) ईकार और ऊकार (ङिति) ङिद्वचनों में (वा) विकल्प कर के (नदी) नदीसञ्ज्ञक होते हैं।

३०० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

भाव-जिस नित्यस्त्रीलिङ्ग शब्द के ईकार ऊकार के स्थान पर इयङ् उवङ् आदेश हों उन की ङिद्वचनों में विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञा हो जाती है। परन्तु यह नियम 'स्त्री' शब्द पर लागू नहीं होता। उदाहरण यथा- श्री, भ्रू' यहां क्रमशः ईकार ऊकार नित्यस्त्रीलिङ्गी हैं, इन के स्थान पर क्रमशः इयङ् उवङ् आदेश भी होते हैं, अतः ङित् विभक्तियों में इन की विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञा होगी। सूत्र के इस प्रथम खण्ड का उपयोग आगे इसी प्रकरण में 'श्री' आदि शब्दों में किया जायेगा। अब 'मति'शब्दोपयोगी द्वितीय खण्ड की व्याख्या करते हैं- स्त्र्याख्यौ ।१।२। ह्रस्व ।१।१। च इत्यव्ययपदम्। यू ।१।२। वा इत्यव्ययपदम्। नदी ।१।१। ङिति ।७।१। समास-स्त्रियम् आचक्षाते इति स्त्र्याख्यौ, स्त्रीलिङ्गा- न्वित्यर्थः। अत्र नित्यस्त्रीत्वमविवक्षितम्। 'ह्रस्व' इति यू' इत्यनेन सम्बध्यते। इश्च उश्च = यू। ह्रस्वौ इदुतावित्यर्थः। अर्थ-(स्त्र्याख्यौ) स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान (ह्रस्व. = ह्रस्वौ) ह्रस्व (यू) इकार उकार (च) भी (ङिति) ङित् परे होने पर (वा) विकल्प कर के (नदी) नदीसञ्ज्ञक होते हैं। भाव-यदि स्त्रीलिङ्ग में इकारान्त या उकारान्त शब्द आयेगा तो ङिद्वचनों में उस की विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञा हो जायेगी। यहां यह स्मरण रखना चाहिये कि ह्रस्व इकारान्त और ह्रस्व उकारान्त शब्द चाहे नित्यस्त्रीलिङ्ग हों या न हों, केवल स्त्रीलिङ्ग में वर्तमान होने मात्र से ही उन की नदीसञ्ज्ञा हो जायेगी। इस नियम के प्रभाव से स्त्रीलिङ्ग में प्रत्येक ह्रस्व इकारान्त और ह्रस्व उका- रान्त शब्द ङिद्वचनों में विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञक हो जाता है। नदीत्वपक्ष में आट् आदि नदीकार्य और तदभावपक्ष में शेषो घ्यसखि (१७०) से घिसञ्ज्ञा हो कर गुण आदि घिकार्य होते हैं। 'मति + ङे' इस दशा में ह्रस्व इकारान्त स्त्रीलिङ्ग मति शब्द से परे ङित् प्रत्यय ङे के विद्यमान होने से वैकल्पिक नदीसञ्ज्ञा हुई। नदीत्वपक्ष में आण्नद्यः (१६६) द्वारा ङित् को आट् आगम, आटश्च (१६७) से वृद्धि तथा इकार को यण् करने से 'मत्यै' रूप बनता है। नदीसञ्ज्ञा के अभाव में घिसञ्ज्ञा हो जाती है। और तब घेर्ङिति (१७२) से इकार को एकार गुण हो कर अय् आदेश करने पर 'मतये' रूप बनता है। पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन में 'मति + ङस्' इस अवस्था में नदीसञ्ज्ञा, आट् का आगम, वृद्धि, यण् और सकार को रुत्व विसर्ग हो कर 'मत्याः' रूप सिद्ध होता है। नदीसञ्ज्ञा के अभाव में घिसञ्ज्ञा, गुण और ङसिङसोश्च (१७३) से पूर्व- रूप हो कर 'मतेः' रूप निष्पन्न होता है। षष्ठीबहुवचन 'मति + आम्' में ह्रस्वनद्याप० (१४८) से ह्रस्वमूलक नुट् आगम हो नामि (१४६) से दीर्घ करने पर- 'मतीनाम्' । 'मति + ङि' (ङि) यहां नदीसञ्ज्ञा के पक्ष में ङेराम्नद्याम्नीभ्यः (१६८) से ङि को आम् तथा औत् (१८४) सूत्र द्वारा ङि को औकार युगपत् प्राप्त होते हैं।

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ३०१ दोनों सावकाश है। ङेराम्० (१६८) को 'गौर्याम्' आदि में तथा औत् (१८४) को 'सख्यौ, पत्यौ' आदि में अवकाश प्राप्त हो चुका है। विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) के अनुसार परकार्य औकार ही होना चाहिये । परन्तु यह अनिष्ट है, इस पर अग्रिम- सूत्र द्वारा पुनः आम् आदेश का विधान करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२२३) इदुद्भ्याम् ।७।३।११७॥ इदुद्भ्यां नदीसञ्ज्ञकाभ्यां परस्य ङेराम् । मत्याम्, मतौ। शेषं हरिवत् ॥ अर्थ:—नदीसञ्ज्ञक ह्रस्व इकार उकार से परे ङि को आम् आदेश हो । व्याख्या—नदीभ्याम् ।५।२। (ङेराम्नद्याम्नीभ्यः से वचनविपरिणाम द्वारा) । इदुद्भ्याम् ।५।२। ङेः ।६।१। आम् ।१।१। (ङेराम्० से) । समासः—इच्च उच्च = इदुतौ, ताभ्याम् = इदुद्भ्याम् । इतरेतरद्वन्द्वः । अर्थः—(नदीभ्याम्) नदीसञ्ज्ञक (इदुद्भ्याम्) ह्रस्व इकार और ह्रस्व उकार से परे (ङेः) ङि के स्थान पर (आम्) आम् आदेश हो जाता है। यह सूत्र औत् (१८४) सूत्र का अपवाद है ।¹ 'मति+ङि' यहां प्रकृतसूत्र मे ङि को आम् हो कर 'मति+आम्' हुआ । अब आण्नद्याः (१६६) से आट् आगम और ह्रस्वनद्यापः० (१४८) से नुट् आगम दोनों युगपत् प्राप्त होते हैं। परन्तु परत्व के कारण आट् का आगम हो जाता है—मति+ आट् आम् । आटश्च (१६७) से वृद्धि और इकार को यण् करने पर 'मत्याम्' प्रयोग सिद्ध होता है । नदीसञ्ज्ञा के अभाव में घिसञ्ज्ञा हो कर अच्छ घेः (१७४) से ङि को औकार और घि को अकार अन्तादेश हो कर वृद्धि एकादेश करने से 'मतौ' रूप सिद्ध होता है । हे मति+सुँ । यहां ह्रस्वस्य गुणः (१६६) से एकार गुण और एङ्ह्रस्वात्० (१३४) से सम्बुद्धि का लोप हो 'हे मते !' सिद्ध होता है। रूपमाला यथा— प्र० मतिः मती मतयः प० मत्याः,मतेः मतिभ्याम् मतिभ्यः द्वि० मतिम् ,, मतीः ष० ,, ,, मत्योः मतीनाम् तृ० मत्या मतिभ्याम् मतिभिः स० मत्याम्,मतौ ,, मतिषु च० मत्यै,मतये ,, मतिभ्यः सं० हे मते! हे मती! हे मतयः! [लघु०] एवं बुद्ध्यादयः ॥ अर्थः—इसी प्रकार बुद्धि आदि शब्दों की प्रक्रिया होती है । व्याख्या—बालकों के लिए मतिवत् कुछ उपयोगी शब्दों का संग्रह यहां दे रहे हैं । '*’ यह चिह्न णत्वप्रक्रिया का ज्ञापक है । शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ अङ्गुलि = अङ्गुल | अवनि = पृथ्वी | आकृष्टि = आकर्षण अपकृति = अपकार | आकृति = आकार | आर्ति = दुःख १. यहां यह ध्यान में रखना चाहिये कि औत् (१८४) सूत्र उत्सर्ग अर्थात् सामान्य- सूत्र है। इस के दो अपवाद हैं—अच्छ घेः (१७४) और इदुद्भ्याम् (२२३) ।

३०२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ आलि = पङ्क्ति | तिथि = तारीख | भुशुण्डि = बन्दूक आवलि = पङ्क्ति | दीधिति = किरण | भूति = कल्याण आवृत्ति = दुहराना | दृष्टि = नज़र | भूमि = पृथ्वी आहति = आघात | द्युति = चमक | भृति = मज़दूरी आहुति = आहुति | धूलि = धूल | भेरि* = नगारा इष्टि = यज्ञ | धृति = धैर्य | भ्रान्ति = भ्रम उक्ति = वचन | निकृति = छल | मुक्ति = मोक्ष उन्नति = उन्नति | नियति = भाग्य | मूर्त्ति = प्रतिमा उपकृति = उपकार | निराकृति = खण्डन | यष्टि = छड़ी उपलब्धि = प्राप्ति, ज्ञान | नीति = नीति | युक्ति = उपाय ओषधि = जड़ी-बूटी | नुति = स्तुति | युवति = जवान स्त्री कटि = कमर | पङ्क्ति = कतार | योनि = उत्पत्तिस्थान कण्डूति = खुजली | पद्धति = मार्ग | रजनि = रात्रि कान्ति = सौन्दर्य | पीति = पीना | राजनीति = राजनीति कीर्ति = यश | प्रकृति = स्वभाव | रीति = तरीका, रिवाज धृति = धैर्य | प्रतिकृति = छाया, सादृश्य | रुचि = अनुराग कृत्ति = चमड़ा | प्रतिपत्ति = ज्ञान, प्राप्ति | रूढ़ि = प्रसिद्धि कृषि* = खेती | प्रतीति = अनुभव | लिपि = वर्णमाला कोटि¹ = कोना, करोड़ | प्रत्यासत्ति = समीपता | वमि = वमन खनि = खान | प्रत्युक्ति = उत्तर | वल्लि = लता ख्याति = प्रसिद्धि | प्रशस्ति = प्रशंसा | वसति = वास, घर गति = चाल, गमन | प्रसुप्ति = निद्रा | वस्ति = मूत्राशय गीति = गान | प्रसूति = प्रसव, सन्तान | वान्ति = वमन गुप्ति = छिपाना | प्रसृति = प्रसार, वृद्धि | विकृति = विकार ग्लानि = अवसाद | प्राप्ति = पाना | विगीति = निन्दा च्युति = गिरना | प्रीति = प्रेम | विज्ञप्ति = प्रार्थना छर्दि = वमन | प्लुति = छलाङ्ग | विधुति = कम्पन छवि = कान्ति, चमक | बुद्धि = बुद्धि | विनति = नम्रता जग्धि = सहभोज | भक्ति = श्रद्धा | विपत्ति = आपत्ति जनि = उत्पत्ति | भणिति = कथन | विरति = हटना जाति = जाति | भित्ति = दीवार | विवृति = व्याख्या तति = विस्तार | भीति = डर | विशुद्धि = विशेष शुद्धि तमि = अन्धेरी रात | भुक्ति = भोजन, खाना | विस्मृति = भूलना १. करोड़ अर्थ में 'कोटि' शब्द एकवचनान्त होता है।

ःअजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ३०३ शब्द—अर्थ शब्द—अर्थ शब्द—अर्थ विहृति = मारना शान्ति = शान्ति संहति = समूह वीचि = तरङ्ग शिरोधि = गरदन सिद्धि = सिद्ध होना वृत्ति = जीविका शुक्ति = सीपी सूक्ति = सुन्दर वचन वृष्टि = वर्षा शुद्धि = सफ़ाई स्तुति = प्रशंसा वेणि = गुत्त श्रुति = वेद, कान स्थिति = ठहरना व्याकृति = व्याकरण सन्तति = सन्तान स्फूर्ति = फुर्ती व्रतति = लता सम्पत्ति = धन-दौलत स्मृति = स्मरण शक्ति = ताकत संस्तुति = परिचय हानि = हानि अब स्त्रीलिङ्ग में 'त्रि' (तीन) शब्द के रूप दर्शाते हैं। त्रिशब्दो नित्यं बहु- वचनान्तः—यह पीछे (२४०) पृष्ठ पर स्पष्ट कर चुके हैं। 'त्रि+अस्' (जस्) इस दशा में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२२४) त्रिचतुरोः स्त्रियां तिसृ-चतसृ ।७।२।९९॥ स्त्रीलिङ्गयोरेतयोरेतौ स्तो विभक्तौ ॥ अर्थः—विभक्ति परे होने पर स्त्रीलिङ्ग में 'त्रि' शब्द के स्थान पर 'तिसृ' और 'चतुर्' शब्द के स्थान पर 'चतसृ' आदेश हो। व्याख्या—विभक्तौ ।७।१। (अष्टन आ विभक्तौ से)। त्रिचतुरोः ।६।२। स्त्रियाम् ।७।१। तिसृचतसृ ।१।१। समासः—तिसृ च चतसृ च=तिसृचतसृ, समाहारद्वन्द्वः । अर्थः—(विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (स्त्रियाम्) स्त्रीलिङ्ग में (त्रिचतुरोः) त्रि और चतुर् शब्दों के स्थान पर क्रमशः (तिसृचतसृ) तिसृ और चतसृ आदेश होते हैं। 'त्रि+अस्' (जस्) यहां जस् विभक्ति परे है अतः प्रकृतसूत्र से 'त्रि' के स्थान पर 'तिसृ' आदेश हो 'तिसृ+अस्' इस स्थिति में पूर्वसवर्णदीर्घ (१२६) का बाध कर ऋतो ङिसर्वनामस्थानयोः (२०४) से गुण प्राप्त होता है। इस पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२२५) अचि र ऋतः¹ ।७।२।१००॥ तिसृचतसृ एतयोर्ऋकारस्य रेफादेशः स्यादचि । गुणदीर्घोत्त्वानाम- पवादः । तिस्रः २ । तिसृभिः । तिसृभ्यः २ । आमि नुट् ॥ अर्थः—अच् परे हो तो तिसृ और चतसृ के ऋकार को रेफ आदेश हो। व्याख्या—अचि ।७।१। रः ।१।१। (रेफादकार उच्चारणार्थः) । ऋतः ।६।१। १. अलोऽन्त्यपरिभाषायैव सिद्धे 'ऋत' इति अनुवर्त्तमान-'तिसृचतसृ' इत्यस्य षष्ठ्यन्त- त्वकल्पनाय । अन्यथा त्रिचतुरोरित्यस्यैवानुवृत्त्यापत्तौ रादेशेन तिसृचतस्रोर्बाधा- पत्तिरिति शेखरे नागेशः । वस्तुतस्तु तत्रैव स्वरितत्वं न तत्र। अन्यथा 'अचि रश्च' इत्येव वदेत् । योग्यतयैव तत्कल्पनासिद्ध्या तददृष्टार्थमेवेत्यन्ये ।

३०४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् तिसृचतस्रो ।६।२। (त्रिचतुरोः स्त्रियां तिसृचतसृ मे विभक्ति विपरिणाम द्वारा )। अर्थ — (अचि) अच् परे होने पर (तिसृचतस्रो ) तिसृ और चतसृ शब्दो के (ऋत ) ऋकार के स्थान पर (र ) 'र्' यह आदेश होता है। प्रश्न—अच् परे होने पर ऋकार को रेफ आदेश तो इको यणचि (१५) से ही सिद्ध है, पुन इस सूत्र की क्या आवश्यकता है ? उत्तर—गुणदीर्घोत्त्वानाम् अपवाद अर्थात् 'तिसृ +अस्' यहा जस् मे ऋतो ङि० (२०४) से प्राप्त होने वाले गुण के, तिसृ+अस्' यहा शस् मे प्रथमयो पूर्वसवर्णः (१२६) द्वारा प्राप्त होने वाले पूर्वसवर्णदीर्घ के तथा प्रियचतसृ+अस्' यहा ङसिं और ङस् मे ऋत उत् (२०८) से प्राप्त होने वाले उत्त्व के बाघ के लिये इस सूत्र से ऋकार के स्थान पर रेफ आदेश किया जाता है। इस प्रकार यह सूत्र गुण, दीर्घ और उत्त्व का अपवाद है। तिसृ+अस्' यहा गुण का बाघ कर रेफ आदेश कर सकार को रुत्व और रेफ को विसर्ग आदेश करने से—'तिस्र ' रूप बना । 'त्रि+अस्'(शस्) यहा तिसृ आदेश हो कर पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है; पुन उस का बाध कर प्रकृत-सूत्र से रेफ आदेश हो जाता है—'तिस्र' । त्रि+भिस्=तिसृ+भिस्=तिसृभि । त्रि+भ्यस्=तिसृ+भ्यस्=ति- सृभ्यः । 'त्रि+आम्' यहा त्रेस्त्रयः (१६२) से प्राप्त त्रय आदेश का बाध कर त्रिचतुरो ० (२२४) से तिसृ आदेश हो जाता है। 'तिसृ+आम्' इस स्थिति में ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) से नुट् आगम और अचि र ऋत (२२५) मे रेफ आदेश युगपत् प्राप्त होते हैं। विप्रतिषेधे पर कार्यम् (११३) के अनुसार परकार्य रेफ आदेश होना चाहिये। परन्तु नुम्-अचिर-तृज्वद्भावेभ्यो नुट् पूर्वविप्रतिषेधेन (वा० १६) इस कात्यायनवचन से यहा पूर्वविप्रतिषेध मान कर पूर्व कार्य नुट् आगम हो जाता है। अब 'तिसृ+नाम्' इस दशा मे नामि (१४६) से दीर्घ प्राप्त होता है, इस पर अग्रिमसूत्र से उस का निषेध करते हैं— [लघु०] निषेध-सूत्रम्—(२२६) न तिसृचतसृ ।६।४।४।। एतयोर्नामि दीर्घो न । तिसृणाम् । तिसृषु ।। अर्थ —नाम् परे होने पर तिसृ और चतसृ शब्दो को दीर्घ नही होता । व्याख्या—न इत्यव्ययपदम् । तिसृ-चतसृ ।६।२। (यहा सुपां सुलुक० सूत्र द्वारा षष्ठी का लुक समझना चाहिये)। नामि ।७।१। (नामि से) । दीर्घ ।१।१। (ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽण मे)। अर्थ —(नामि) नाम् परे होने पर (तिसृचतसृ) तिसृ और चतसृ शब्दो के स्थान पर (दीर्घ) दीर्घ (न) नही होता । 'तिसृ+नाम्' यहाँ दीर्घ का निषेध हो कर ऋवर्णान्नस्य णत्व वाच्यम् (वा० २०) से नकार को णकार करने से—'तिसृणाम्' । रूपमाला यथा—

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ३०५ प्र० ० ० तिस्रः | प० ० ० तिसृभ्यः द्वि० ० ० " | प० ० ० तिसॄणाम् तृ० ० ० तिसृभिः | स० ० ० तिसृषु च० ० ० तिसृभ्यः | सम्बोधन नहीं होता। इसी प्रकार चतुर् (चार) शब्द के स्त्रीलिङ्ग में रूप बनते हैं—चतस्रः २, चतसृभिः, चतसृभ्यः २, चतसॄणाम्, चतसृषु । इसे हलन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण में देखें । [लघु०] द्वे २ । द्वाभ्याम् ३ । द्वयोः २ ॥ व्याख्या—'द्वि' (दो) शब्द द्वित्व का वाचक होने से सदा द्विवचनान्त प्रयुक्त होता है । अब स्त्रीलिङ्ग में इस की प्रक्रिया दर्शाई जानी है । द्वि शब्द से प्रथमा या द्वितीया के द्विवचन में 'द्वि+औ' इस स्थिति में त्यदा- दीनामः (१६३) सूत्र से विभक्ति परे होने के कारण इकार को अकार हुआ । तब 'द्व+औ' इस दशा में स्त्रीत्वविवक्षा में अदन्त होने के कारण अजाद्यतष्टाप् (१२४५) सूत्र से टाप् प्रत्यय हुआ । टाप् के टकार और पकार इत्सञ्ज्ञक होने से लुप्त हो जाते हैं । 'द्व आ+औ' इस स्थिति में सवर्णदीर्घ हो औङ आपः (२१६) से औ को शी आदेश तथा आद् गुणः (२७) से गुण करने पर 'द्वे' रूप सिद्ध होता है । भ्याम् में त्यदाद्यत्व, टाप् और सवर्णदीर्घ हो कर—'द्वाभ्याम्' । ओस् में, त्यदाद्यत्व, टाप्, सवर्णदीर्घ, आकार को आङि चापः (२१८) से एकार, अय् आदेश और सकार को रुत्व-विसर्ग हो कर—'द्वयोः'१ । रूपमाला यथा— प्र० ० द्वे ० | प० ० द्वाभ्याम् ० द्वि० ० " ० | प० ० द्वयोः ० तृ० ० द्वाभ्याम् ० | स० ० " ० च० ० " ० | सम्बोधन नहीं होता । (यहाँ पर ह्रस्व इकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।) --------::०::-------- अब ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का वर्णन करते हैं— [लघु०] गौरी । गौर्यौ । गौर्यः । हे गौरि! । गौर्यै । इत्यादि ॥ व्याख्या—गौर शब्द से षिद्गौरादिभ्यश्च (१२५१) सूत्र द्वारा ङीष् प्रत्यय करने पर भसञ्ज्ञक अकार का लोप हो कर 'गौरी' शब्द निष्पन्न होता है । गौरी का अर्थ 'पार्वती' है । नित्यस्त्रीलिङ्ग होने से यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) द्वारा इस की नदी- सञ्ज्ञा हो जाती है । प्रथमा के एकवचन में 'गौरी + स्' इस अवस्था में ङ्यन्त होने से हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) सूत्र से अपृक्त सकार का लोप हो कर 'गौरी' रूप बनता है । १. ध्यान रहे कि पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग के 'द्वाभ्याम्' और 'द्वयोः' की प्रक्रिया भिन्न २ है । ल० प्र० (२०)

३०६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् 'गौरी + औ' में पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है, उस का दीर्घाज्जसि च (१६२) सूत्र से निषेध हो जाता है। तब इको यणचि (१५) से यण् आदेश हो कर 'गौर्यौ' रूप बनता है। ध्यान रहे कि 'गौर्यौ' आदि में अचो रहाभ्यां द्वे (६०) सूत्र द्वारा यकार यर् को द्वित्व हो कर पक्ष में 'गौर्य्यौ' प्रभृति रूप भी बनते हैं। जस् में भी पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध हो यण् करने पर—'गौर्यः'। 'गौरी + अम् = गौरीम्। अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप हो जाता है। 'गौरी + शस्' यहां शस् में पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर सकार को रुत्व-विसर्ग करने से 'गौरीः' रूप बनता है। स्त्रीलिङ्ग होने से सकार को नत्व नहीं होता। टा में इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'गौर्या' रूप सिद्ध होता है। 'गौरी + ङे' (ङे)। यहां यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से नदीसञ्ज्ञा हो कर आण्नद्याः (१६६) से आट् आगम, आठश्च (१६७) से वृद्धि और इको यणचि (१५) से यण् यकार करने से 'गौर्यै' रूप बनता है। 'गौरी + ङस्' (ङसिं वा ङस्) इस दशा में नदीसञ्ज्ञा, आट् आगम, वृद्धि और यण् यकार हो कर 'गौर्याः' रूप सिद्ध होता है। ओस् में इको यणचि (१५) से यण् हो कर 'गौर्योः' बनता है। षष्ठी के बहुवचन आम् में नदीसञ्ज्ञा हो कर नदीमूलक नुट्, अनुबन्धलोप और नकार को णकार करने से 'गौरीणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है। सप्तमी के एकवचन ङि में 'गौरी + ङि' इस दशा में ङेराम्० (१६८) से ङि को आम्, आण्नद्याः (१६६) से आट् आगम, आठश्च (१६७) से वृद्धि तथा इको यणचि (१५) से यण् करने पर 'गौर्याम्' प्रयोग सिद्ध होता है। सम्बुद्धि में नदीसञ्ज्ञा होने से अम्बार्थ० (१६५) से ह्रस्व हो कर एङ्ह्रस्वात्० (१३४) से सकार का लोप हो जाता है—'हे गौरि!'। रूपमाला यथा— प्र० गौरी गौर्यौ गौर्यः | प० गौर्याः गौरीभ्याम् गौरीभ्यः द्वि० गौरीम् 〃 गौरीः | ष० 〃 गौर्योः गौरीणाम् तृ० गौर्या गौरीभ्याम् गौरीभिः | स० गौर्याम् 〃 गौरीषु च० गौर्यै 〃 गौरीभ्यः | सं० हे गौरि! हे गौर्यौ! हे गौर्यः! [लघु०] एव नद्यादयः ॥ अर्थ—इसी प्रकार नदी आदि ईकारान्त स्त्रीलिङ्गशब्दों के रूप बनेंगे। व्याख्या—बालकों के लिये गौरीवत् कुछ उपयोगी शब्दों का सङ्ग्रह यहां दे रहे हैं। '' इस चिह्न वाले स्थानों में षत्वविधि जाननी चाहिये। शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ अक्षौहिणी = सेनाविशेष | अनीकिनी = सेना | अमरावती = इन्द्रपुरी अङ्गुली = अङ्गुल | अनुक्रमणी = सूची | अरण्यानी = बड़ा जङ्गल अटवी = जङ्गल | अनुचरी = दासी | अवाची = दक्षिण दिशा

अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ३०७ शब्द — अर्थ | शब्द — अर्थ | शब्द — अर्थ अश्मरी* = पथरी रोग | कुटुम्बिनी = भार्या | दूती = संदेशहरी आनुपूर्वी* = क्रम | कुमारी* = कुंवारी लड़की | देवकी = श्रीकृष्ण-माता आमलकी = आँवला | केतकी = केवड़ा (क्षुप) | देवी = दुर्गा, देवपत्नी इङ्गुदी = गोंदी | कोकी = चकवी | दैनन्दिनी = डायरी इन्द्राणी = इन्द्रपत्नी | कौमुदी = चान्दनी | द्रौपदी = द्रुपद-कन्या उज्जयिनी = उज्जैन नगर | कौमोदकी = विष्णुकी गदा | धमनी = नाड़ी, शिरा उदीची = उत्तर दिशा | कौशाम्बी = एक नगर | धरित्री* = पृथ्वी उर्वशी = एक अप्सरा | क्षत्रियाणी = क्षत्रियस्त्री | नगरी* = नगर उर्वी* = पृथ्वी | गर्दभी = गधी | नटी = नट की स्त्री ऋतुमती = रजस्वला | गर्भिणी = गर्भवती | नदी = नदी एकादशी = एकादशी | गायत्री* = एक छन्द | नलिनी = कमलिनी कटी = कमर | गाली = अपशब्द | नागवल्ली = पान की वेल कठिनी = खड़िया मिट्टी | गुटी = गोली | नाडी = शिरा कदली = केले का पेड़ | गुडूची = गिलोय | नारी* = स्त्री कवरी* = वेणी | गुर्वी* = भारी | निशीथिनी = रात्रि कमठी = कछुई | गृध्रसी = एक रोग | पञ्चवटी = एक स्थान करिणी = हथिनी | गृहिणी = भार्या | पतिवत्नी = सधवा कर्तनी = कैंची | गोष्ठी = सभा | पत्नी = भार्या कस्तूरी* = कस्तूरी | गोस्तनी = द्राक्षा विशेष | पदवी = मार्ग, पद काकली = सूक्ष्ममधुरध्वनि | घृतचौरी* = कचौरी | पद्मिनी = कमल-समूह काकिणी = कौड़ी | छागी = बकरी | परिपाटी = सिलसिला काकी = कौवी | जगती = पृथ्वी | पाञ्चाली = द्रौपदी कादम्बरी* = मदिरा | जननी = माता | पार्वती = दुर्गा कादम्बिनी = मेघ-माला | ज्योत्स्नी = चान्दनी रात | पितामही = दादी कामिनी = स्त्री | टिप्पणी = नोट | पिप्पली = पीपर कामुकी = कामुक स्त्री | तटिनी = नदी | पुत्री* = बेटी कालिन्दी = यमुना नदी | तपस्विनी = तपस्या वाली | पुरन्ध्री* = पति-पुत्रवती काली = देवी-विशेष | तमी = अन्धेरी रात | पुरी* = नगरी कावेरी* = एक नदी | तरङ्गिणी = नदी | पुंश्चली = व्यभिचारिणी काशी = बनारस | तरुणी = जवान स्त्री | पुष्करिणी = हथिनी किङ्किणी = घुंघरू | तामसी = तमोगुणवाली | पुष्पवती = रजस्वला किंवदन्ती = अफ़वाह | तिरस्करिणी = परदा | पृथिवी = भूमि कुटी = झोंपड़ी | त्रयी* = ऋग्यजुःसाम | पृथ्वी = भूमि कुट्टनी = दलाल स्त्री | दासी = नौकरानी | पेषणी = पेषण-शिला