लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 298, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् २८३ 'गो+अम्' यहां ओकार से परे अम् का अच् वर्त्तमान है; अतः प्रकृतसूत्र से ओकार और अकार के स्थान पर आकार एकादेश हो कर 'गाम्' रूप सिद्ध हुआ। 'गो+अस्' (शस्) यहां भी प्रकृतसूत्र से आकार एकादेश हो रुत्व विसर्ग करने से 'गाः' रूप बनता है। ध्यान रहे कि आकार पूर्वसवर्णदीर्घघटित नहीं अतः तस्माच्छसो नः पुंसि (१३७) से सकार को नकार न होगा। तृतीया और चतुर्थी के एकवचन में एचोऽयवायावः (२२) से अव् आदेश हो कर क्रमशः 'गवा' और 'गवे' बना। पञ्चमी और षष्ठी के एकवचन में ङसिङसोश्च (१७३) से पूर्वरूप हो— 'गोः'। पदान्त न होने से (४३) द्वारा पूर्वरूप नहीं होता। गोशब्द की रूपमाला यथा— गो=बैल [गमेर्डोः (उणा० २२५)] प्र० गोः गावौ गावः प० गोः गोभ्याम् गोभ्यः द्वि० गाम् ,, गाः ष० ,, गवोः गवाम् तृ० गवा गोभ्याम् गोभिः स० गवि ,, गोषु च० गवे ,, गोभ्यः सं० हे गौः ! हे गावौ ! हे गावः! (यहां ओकारान्त पुलिंङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) —:०:— अब ऐकारान्त पुलिंङ्ग 'रै' शब्द का वर्णन करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२१५) रायो हलि ।७।२।८५॥ अस्याकारादेशो हलि विभक्तौ। राः, रायौ, रायः। राभ्यामित्यादि ॥ अर्थः—हलादि विभक्ति परे होने पर रै शब्द के ऐकार को आकार आदेश हो। व्याख्या—रायः ।६।१। आ ।१।१। (अष्टन आ विभक्तौ से)। हलि ।७।१। विभक्तौ ।७।१। 'हलि' पद 'विभक्तौ' पद का विशेषण है, अतः तदादिविधि हो कर 'हलादौ विभक्तौ' बन जायेगा। अर्थः—(हलि=हलादौ) हलादि (विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (रायः) रै शब्द के स्थान पर (आ) आकार आदेश होता है। अलो- ऽन्त्यपरिभाषा से 'रै' के अन्त्य ऐकार को आकार होगा। रा दाने (अदा० प०) धातु से रातेर्डैः (उणा० २२४) सूत्र द्वारा डै प्रत्यय कर टिलोप करने से 'रै' शब्द निष्पन्न होता है। राति=ददाति श्रेयोऽर्थं वा पात्रेभ्य इति राः। रायते=दीयते इति रा इति वा। धन, सूर्य या सुवर्ण को 'रै' कहते हैं। सुं, भ्याम् ३, भिस्, भ्यस् २, सुप्—ये आठ हलादि विभक्तियां हैं। इन में प्रकृतसूत्र से रै को आकार आदेश हो जायेगा। अन्यत्र अजादियों में एचोऽयवायावः (२२) से ऐकार को आय् आदेश होगा। रूपमाला यथा— प्र० राः रायौ रायः तृ० राया राभ्याम् राभिः द्वि० रायम् ,, ,, च० राये ,, राभ्यः