भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 299

२८४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् प० राय् राभ्याम् राभ्यः । स० रायि रायोः रासु ष० ,, रायोः रायाम् । सम्० हे राः । हे रायौ । हे रायः । (यहां ऐकारान्त पुल्लिंग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) ० [लघु०] ग्लौः । ग्लावौ । ग्लावः । ग्लौभ्यामित्यादि ॥ व्याख्या—म्लै हर्षक्षये (भ्वा० प०) धातु से ग्ला-म्नोर्डिच्च डो (उणा० २२२) सूत्र द्वारा डो प्रत्यय कर टिलोप करने से ग्लौ शब्द निष्पन्न होता है। ग्लायंति= कमलस्य चौरादीना वा हर्षक्षयं करोति (अन्तर्भावितण्यर्थ) इति ग्लौ =चन्द्रः। ग्लौर्मृगाङ्कः कलानिधिरित्यमरः। 'ग्लौ' शब्द के औकार को सर्वत्र अजादि प्रत्यया में एचोऽयवायाव (२२) से आव् आदेश हो जाता है। हलादि विभक्तियों मे कोई अन्तर नहीं होता। सुप् मे केवल षत्व (१५०) विशेष है। रूपमाला यथा— प्र० ग्लौः ग्लावौ ग्लावः प० ग्लावः ग्लौभ्याम् ग्लौभ्यः द्वि० ग्लावम् ,, ,, ष० ,, ग्लावोः ग्लावाम् तृ० ग्लावा ग्लौभ्याम् ग्लौभिः स० ग्लावि , ग्लौषु च० ग्लावे , ग्लौभ्यः स० हे ग्लौ ! हे ग्लावौ ! हे ग्लाव ! इसी प्रकार 'जनौ' (जनान् अवतीति जनौ) प्रभृति शब्दों के रूप होंगे। (यहा औकारान्त पुल्लिंग शब्दो का विवेचन समाप्त होता है।) [लघु०] इत्यजन्ताः पुंल्लिङ्गाः [शब्दाः] ॥ अर्थ—यहां 'अजन्तपुंल्लिङ्ग' शब्द समाप्त होते हैं। व्याख्या—'अजन्त' शब्द में स्पष्टप्रतिपत्ति के लिए कुत्व नहीं किया गया। यहां 'अजन्त पुल्लिंग प्रकरण' समाप्त होता है। इस के अनन्तर 'अजन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण' आरम्भ किया जायेगा। अभ्यास (३४) (१) गोतो णित् सूत्र म कात्यायन के वचनो के अनुसार दोषा की उद्भावना कर उन का समाधान करें। (२) क्या कारण है कि ग्रन्थकार ने ऋदन्तो के आगे ओदन्त शब्द लिखे हैं? (३) रायो हलि सूत्र म 'हलि' पद ग्रहण न करें तो क्या दोष उत्पन्न होगा? (४) औतोऽम्शसो सूत्र का पदच्छेद कर यह बतायें कि यह सूत्र 'ग्लौ' शब्द म क्यो प्रवृत्त (?) होता है? (५) 'गो+अस्' (ङसिं वा ङस्) यहा एचोऽयवायाव और एङ पदान्तादति सूत्रा म कौन सा प्रवृत्त (?) होगा? कारण साथ लिखें।