लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ३११ 'स्त्री + अम्' यहां प्रकृतसूत्र से ईकार को विकल्प कर के इयङ् हो गया । इयङ्पक्ष मे अनुबन्ध-लोप हो कर—स्त्रियम् । इयङ् के अभाव में अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप हो कर—स्त्रीम् । इस प्रकार 'स्त्रियम्, स्त्रीम्' दो रूप सिद्ध होते हैं। 'स्त्री + अस्' (शस्) यहां भी वाऽम्शसोः सूत्र से वैकल्पिक इयङ् हो कर—स्त्रियः। पक्ष में पूर्वसवर्णदीर्घ हो कर—स्त्रीः । इस प्रकार 'स्त्रियः, स्त्रीः' दो रूप बनते हैं । तृतीया के एकवचन में 'स्त्री + आ' इस अवस्था में स्त्रियाः (२२७) सूत्र से ईकार को इयङ् हो कर—'स्त्रिया' रूप बनता है । चतुर्थी के एकवचन 'स्त्री + ए' में यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से नित्य नदी- सञ्ज्ञा हो जाती है । यद्यपि स्त्रीशब्द के स्थान पर इयङ् होता है, तथापि स्त्रीशब्द का वर्जन होने से ङिति ह्रस्वश्च (२२२) से ङित्प्रत्ययों में नदीसञ्ज्ञा का विकल्प नहीं होता । नदीसञ्ज्ञा होने से आण्नद्याः (१६६) से आट् आगम और आठश्च (१६७) से वृद्धि होने के अनन्तर 'स्त्री + ऐ' इस स्थिति में स्त्रियाः (२२७) से इयङ् हो कर 'स्त्रियै' प्रयोग निष्पन्न होता है । 'स्त्री + अस्' (ङसिँ वा ङस्) यहां भी पूर्ववत् नदीसञ्ज्ञा होने से आट, वृद्धि और इयङ् हो कर—'स्त्रियाः' रूप बनता है । ओस् में स्त्रियाः (२२७) से इयङ् हो कर—'स्त्रियोः' रूप बनता है । षष्ठी के बहुवचन में 'स्त्री + आम्' इस दशा में इयङ् और नुट् दोनों की युगपत् प्राप्ति होने पर परत्व के कारण नुट् का आगम हो जाता है। अब अट्कुप्वाङ्० (१३८) से नकार को णकार हो कर 'स्त्रीणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है । 'स्त्री + ङि' यहां पर नदीसञ्ज्ञा होने से ङेराम्० (१६८) सूत्र से ङि को आम्, आट् का आगम, वृद्धि और स्त्रियाः (२२७) से इयङ् हो कर 'स्त्रियाम्' प्रयोग सिद्ध होता है। रूपमाला यथा— प्र० स्त्री स्त्रियौ स्त्रियः | प० स्त्रियाः स्त्रीभ्याम् स्त्रीभ्यः द्वि० स्त्रियम् } " { स्त्रियः | प० " स्त्रियोः स्त्रीणाम् स्त्रीम् } { स्त्रीः | स० स्त्रियाम् " स्त्रीषु तृ० स्त्रिया स्त्रीभ्याम् स्त्रीभिः | सं० हे स्त्रि ! हे स्त्रियौ ! हे स्त्रियः ! च० स्त्रियै " स्त्रीभ्यः | नोट— स्त्रीशब्द के समान उच्चारण वाला स्त्रीलिङ्ग में अन्य कोई शब्द नहीं । [लघु०] श्रीः । श्रियौ । श्रियः ॥ व्याख्या—श्रयति हरिम् इति श्रीः । लक्ष्मी वा शोभा को 'श्री' कहते हैं । श्रिञ् सेवायाम् (भ्वा० उभ०) धातु से क्विव्वचि-प्रच्छि-श्रि-स्रु-द्रु-प्रु-ज्वां दीर्घोऽसम्प्रसारणञ्च (उणा० २।५) सूत्र द्वारा क्विप् प्रत्यय तथा प्रकृति को दीर्घ करने से 'श्री' शब्द निष्पन्न होता है । श्रीशब्द ङ्यन्त नहीं, इस में ईकार धातु का अवयव है । अतः हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६) से सुँलोप नहीं होता—श्रीः ।