भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 327

३१२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् 'श्री+औ' यहां धातु के अवयव ईकार से पूर्व धातु का अवयव 'थ्' संयोग वर्त्तमान है, अङ्ग अनेकाच् भी नही, अत एरनेकाच० (२००) से यण् नही होता । अचि श्नु० (१६६) से इयङ् हो कर- 'श्रियौ' प्रयोग बनता है। श्री+अस् (जस्) =श्रिय । अचि श्नु० (१६६) से इयङ् होता है । 'हे श्री+स्' यहां सम्बुद्धि मे यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से नित्यनदीसञ्ज्ञा होने के कारण अम्बार्थनद्योः० (१६५) द्वारा ह्रस्व प्राप्त होता है। परन्तु यह अनिष्ट है, अत इस के वारण के लिए नदीसञ्ज्ञा का निषेध करते हैं- [लघु०] निषेध-सूत्रम्- (२२६) नेयँङुवँङ्स्थानावस्त्री । १।४।४।। इयँङुवँडो स्थितियेयोस्तावीदूतो नदीसञ्ज्ञौ न स्त, न तु स्त्री । हे श्री ! । श्रिये, श्रिये । श्रिया २, श्रिय. २ ।। अर्थः-जिन ईकार ऊकार के स्थान पर इयङ् उवङ् आदेश होते हैं उन की नदीसञ्ज्ञा नही होती। परन्तु स्त्रीशब्द की तो होती ही है। व्याख्या- न इत्यव्ययपदम् । इयँडुवँङ्स्थानौ १।२। यू १।२। नदी १।१। (यू स्त्र्याख्यौ नदो से) । अस्त्री १।१। समास - इयङ् च उवङ् च = इयँङुवँङौ, इतरेतरद्वन्द्वः । इयँङुवँडो स्थान (स्थिति ) ययोस्तौ = इयँङुवँङ्स्थानौ, बहुव्रीहि- समास । ईश्च ऊश्च = यू, इतरेतरद्वन्द्व. । न स्त्री = अस्त्री, नञ्समास । अर्थः- (इयँडुवँङ्स्थानौ) जिन के स्थान पर इयँङ् उवँङ् आदेश होते हैं ऐसे (यू) ईकार ऊकार (नदी) नदीसञ्ज्ञक (न) नही होते । (अस्त्री) परन्तु स्त्रीशब्द पर यह नियम लागू नहीं होता। श्रीशब्द के ईकार के स्थान पर अजादि प्रत्ययो मे अचि श्नु० (१६६) सूत्र द्वारा इयँङ् बादेश होता है, अत. प्रकृतसूत्र द्वारा अजादिप्रत्ययो में तथा अन्यत्र१ भी इस मे नदीसञ्ज्ञा का निषेध हो जायेगा । 'हे श्री+स्' यहा नदीसञ्ज्ञा का निषेध हो जाने से नदीमूलक ह्रस्व नही होता । सकार को रुत्व और रेफ को विसर्ग करने से - 'हे श्री' प्रयोग सिद्ध होता है । श्री + अम् = श्रियम् । श्री + अस् (शस्) = श्रिय । श्री + आ (टा) = श्रिया । सर्वत्र अचि श्नु० (१६६) से इयँङ् हो जाता है। चतुर्थी के एकवचन 'श्री+ए' मे यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) सूत्र से प्राप्त नदीसञ्ज्ञा का नेयँङुवँङ्० (२२६) से निषेध हो जाता है। पुन. ङिति ह्रस्वश्च (२२२) से विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञा हो जाती है। नदीसञ्ज्ञा के पक्ष मे आट् का आगम, १. ध्यान रहे कि नदीसञ्ज्ञा का निषेध केवल वहा ही नही होता जहा इयँट् उवँङ् आदेश होते हैं । किन्तु इयँडुवँङ्स्थानी शब्द मे अन्यत्र भी- जहा इयँङ् उवँङ् नही होते - निषेध हो जाता है । यथा- 'श्री' शब्द मे इयँङ् तो अजादि विभ- क्तियो मे होता है परन्तु नदीसञ्ज्ञा का निषेध बजादियो मे तथा अन्यत्र सम्बुद्धि में भी हो ज्ञाता है।