लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ३१३ वृद्धि और इयङ् हो कर 'श्रियै' बनता है। नदीत्व के अभाव में केवल इयङ् हो कर —'श्रिये'। इस प्रकार ङे में 'श्रियै, श्रिये' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। पञ्चमी वा षष्ठी के एकवचन 'श्री + अस्' में पूर्ववत् नदीसञ्ज्ञा का निषेध हो पुनः विकल्प हो जाता है। नदीत्वपक्ष में आट्, वृद्धि और इयङ् हो कर—'श्रियाः'। नदीत्व के अभाव में केवल इयङ् हो कर—'श्रियः' सिद्ध होता है। इस प्रकार ङसिँ और ङस् में 'श्रियाः, श्रियः' ये दो रूप निष्पन्न होते हैं। षष्ठी के बहुवचन 'श्री + आम्' में यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से प्राप्त नित्य- नदीत्व का नेयँङुवँङ्० (२२६) से निषेध हो जाता है। आम् के ङित् न होने से ङिति ह्रस्वश्च (२२२) द्वारा नदीत्व का विकल्प नहीं हो सकता। इस पर अग्रिमसूत्र द्वारा नदीसञ्ज्ञा का विकल्प करते हैं— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(२३०) वाऽऽमि ।१।४।५॥ इयँङुवँङ्स्थानौ स्त्र्याख्यौ यू आमि वा नदीसञ्ज्ञौ स्तः, न तु स्त्री। श्रीणाम्, श्रियाम्। श्रियाम्, श्रियि ॥ अर्थः—जिन के स्थान पर इयङ् उवङ् आदेश होते हैं, ऐसे नित्यस्त्रीलिङ्ग ईकार ऊकार आम् परे होने पर विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञक हों। परन्तु यह नियम स्त्रीशब्द में प्रवृत्त नहीं होता। व्याख्या—इयँङुवँङ्स्थानौ ।१।२। (नेयँङुवँङ्० से)। स्त्र्याख्यौ ।१।२। यू । १।२। नदी ।१।१। (यू स्त्र्याख्यौ नदी से)। वा इत्यव्ययपदम्। आमि ।७।१। अर्थः— (इयँङुवँङ्स्थानौ) जिन के स्थान पर इयङ् उवँङ् आदेश होते हैं, ऐसे (स्त्र्याख्यौ) नित्यस्त्रीलिङ्ग (यू) ईकार ऊकार (आमि) आम् परे होने पर (वा) विकल्प कर के (नदी) नदीसञ्ज्ञक होते हैं। 'श्री + आम्' यहां इयँङ्स्थानी नित्यस्त्रीलिङ्ग ईकार की आम् परे रहते प्रकृत सूत्र से विकल्प कर के नदीसञ्ज्ञा हो जाती है। नदीसञ्ज्ञापक्ष में नद्यन्त होने से ह्रस्वनद्यापः० (१४८) से नुट् और अट्कुप्वाङ्० (१३८) से नकार को णकार करने से 'श्रीणाम्' और अभावपक्ष में अचि श्नु० (१६६) से इयङ् हो कर 'श्रियाम्' प्रयोग सिद्ध होता है। सप्तमी के एकवचन 'श्री + ङि' में ङिति ह्रस्वश्च (२२२) से नदीसञ्ज्ञा के विकल्प होने से नदीत्वपक्ष में ङेराम्० (१६८) सूत्र से ङि को आम् आदेश हो कर आट् आगम, वृद्धि और इयङ् करने से—'श्रियाम्'। नदीत्वाभाव में केवल इयङ् आदेश हो कर 'श्रियि' प्रयोग बनता है। श्रीशब्द की रूपमाला यथा— प्रथमा श्रीः श्रियौ श्रियः द्वितीया श्रियम् " " तृतीया श्रिया श्रीभ्याम् श्रीभिः चतुर्थी श्रियै, श्रिये " श्रीभ्यः पञ्चमी श्रियाः, श्रियः " "