भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 329

३१४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् षष्ठी श्रिया, श्रियः श्रियोः श्रीणाम्, श्रियाम् सप्तमी श्रियाम्, श्रियि ,, श्रीषु सम्बोधन हे श्रीः ! हे श्रियौ ! हे श्रियः ! इसी प्रकार धी (बुद्धि), ह्री (लज्जा), भी (डर) शब्दों के रूप बनेंगे । विशेष ज्ञातव्य — (१) ध्यान रहे कि नदीसञ्ज्ञा का उपयोग केवल ‘ङे, ङसिँ, ङस्, ङि, आम् और सम्बुद्धि' इन छः स्थानों पर ही होता है । (२) जिस शब्द में इयङ् उवङ् आदेश होते हों उस में प्रथम नेयङुवङ्- स्थानावस्त्री (२२६) सूत्र से सर्वत्र छः स्थानो पर नदीसञ्ज्ञा का निषेध हो जाता है । (३) नदीत्व के निषेध के बाद ङिद्वचनों तथा आम् में क्रमशः ङिति ह्रस्व- श्च (२२२) और वाऽऽमि (२३०) सूत्रों से नदीत्व का विकल्प हो जाता है। (४) शेष सम्बुद्धि ही बच रहती है जिस में वैसे का वैसा नदीत्वनिषेध बना रहता है । इस प्रकार नेयङुवङ्० (२२६) केवल सम्बुद्धि में ही चरि- तार्थ होता है । (५) इन नियमों से स्त्रीशब्द प्रभावित नहीं होता; क्योंकि सर्वत्र 'अस्त्री' कहा गया है । अतः स्त्रीशब्द यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से नित्य नदी- सञ्ज्ञक है । (यहां ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) — : ० : — ( अब उकारान्त स्त्रीलिङ्ग 'धेनु' (गाय) शब्द का वर्णन करते हैं— [लघु०] धेनुर्मतिवत् ॥ व्याख्या—'धेनु'शब्द की प्रक्रिया 'मति'शब्दवत् होती है । रूपमाला यथा— प्र० धेनुः धेनू धेनवः | प० धेन्वाः, धेनोः धेनुभ्याम् धेनुभ्यः द्वि० धेनुम् ,, धेनूः | ष० ,, ,, धेन्वोः धेनूनाम् तृ० धेन्वा धेनुभ्याम् धेनुभिः | स० धेन्वाम्, धेनौ ,, धेनुषु च० धेन्वं, धेनवे ,, धेनुभ्यः | सं० हे धेनो ! हे धेनू ! हे धेनव ! स्त्रीलिङ्ग होने के कारण घिसञ्ज्ञा होने पर भी आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) द्वारा टा को ना नहीं होता । ङिद्वचनों में ङिति ह्रस्वश्च (२२२) द्वारा नदीसञ्ज्ञा का विकल्प हो जाता है । नदीत्वपक्ष में नदीकार्य होते हैं । यथा--ङे में आट् का आगम और वृद्धि हो कर यण् (१५) हो जाता है । ङसिँ और ङस् मे भी ऐसा ही होता है । ङि मे इदुद्भ्याम् (२२३) से ङि को आम् आदेश, आट् और वृद्धि हो कर यण् (१५) हो जाता है । नदीत्वाभाव में ङिद्वचनों की प्रक्रिया 'शम्भु' शब्द के समान होती है ।