भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 333

३१८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् ङीप्टापौ न स्तः ॥ स्वसा तिस्रश्चतस्रश्च ननान्दा दुहिता तथा । याता मातेति सप्तैते स्वस्रादय उदाहृताः ॥ स्वसा । स्वसारौ ॥ अर्थ—षट्संज्ञकों तथा स्वसृ आदियों से परे ङीप् और टाप् नहीं होते । स्वसृ आदियों का कारिका में परिगणन करते हैं—१ स्वसृ (बहन), २ तिसृ (त्रि को स्त्रीलिङ्ग में हुआ आदेश), ३ चतसृ (चतुर् को स्त्रीलिङ्ग में हुआ आदेश), ४ ननान्दृ (पति की बहन, ननन्द), ५ दुहितृ (लड़की), ६ यातृ (पति के भाई की पत्नी), ७ मातृ (माता)—ये सात शब्द स्वस्रादि कहे गये हैं । व्याख्या—न इत्यव्ययपदम् । षट्स्वस्रादिभ्यः ।५।३। ङीप् ।१।१। (ऋन्नेभ्यो ङीप् से) । टाप् ।१।१। (अजाद्यतष्टाप् से) । समास—षट् च स्वस्रादयश्च = षट्- स्वस्रादयः, तेभ्यः = षट्स्वस्रादिभ्यः, इतरेतरद्वन्द्वः । अर्थ—(षट्स्वस्रादिभ्यः) षट्सञ्ज्ञकों तथा स्वसृ आदि शब्दों से परे (ङीप्) ङीप् और (टाप्) टाप् (न) नहीं होते । स्वस्रादिगण मूल में श्लोकबद्ध दे दिया गया है । षट्सञ्ज्ञा आगे (२६७) सूत्र द्वारा षष्, पञ्चन्, सप्तन् आदि शब्दों की कही गई है । ‘स्वसृ’ शब्द की प्रक्रिया अजन्तपुंलिङ्गोक्त ‘धातृ’ शब्द के समान होती है। केवल शस् में सकार को नकार नहीं होता—‘स्वसॄः’ । रूपमाला यथा— प्र० स्वसा* स्वसारौ स्वसारः† प० स्वसुः‡ स्वसृभ्याम् स्वसृभ्यः द्वि० स्वसारम् ,, † स्वसॄः प० ,, ‡ स्वस्रोः स्वसॄणाम् तृ० स्वस्रा स्वसृभ्याम् स्वसृभिः स० स्वसरि✓ ,, स्वसृषु च० स्वस्रे ,, स्वसृभ्यः स० हे स्वसः! हे स्वसारौ! हे स्वसारः!

  • अनडुदानस्० (२०५) से अनँङ्, अप्तृन्तृच्स्वसृ० (२०६) से उपधादीर्घ, हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) से सकारलोप तथा न लोप० (१८०) से नकारलोप । † ऋतो ङि० (२०४) से गुण तथा अप्तॄन्० (२०६) से उपधादीर्घ । ‡ ऋत उत् (२०८) से उत्, रात्सस्य (२०६) से सकारलोप । ✓ऋतो ङि० (२०८) से गुण, रपर । ✕ऋतो ङि० (२०४) से गुण, हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) से सुंलोप । [लघु०] माता पितृवत् । शसि—मातृः ॥ व्याख्या—मातृ (माता) शब्द की प्रक्रिया अजन्तपुंलिङ्गोक्त ‘पितृ’ शब्दवत् होती है । केवल शस् में नत्व न होने से ‘मातृः’ यह विशेष है । रूपमाला यथा— प्र० माता मातरो मातरः प० मातुः मातृभ्याम् मातृभ्यः द्वि० मातरम् ,, मातृः प० ,, मात्रोः मातृणाम् तृ० मात्रा मातृभ्याम् मातृभिः स० मातरि ,, मातृषु च० मात्रे ,, मातृभ्यः स० हे मातः! हे मातरौ! हे मातरः!