लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ३१७ सप्तमी भ्रुवाम्, भ्रुवि भ्रुवोः भ्रुषु सम्बोधन हे भ्रूः! हे भ्रुवौ! हे भ्रुवः! इसी प्रकार भू (पृथ्वी) शब्द के रूप होते हैं। [लघु०] स्वयम्भूः पुंवत् ॥ अर्थः—स्वयम्भूशब्द पुंलिङ्ग 'स्वयम्भू' के समान होता है। व्याख्या—स्वयम्भू शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग नहीं, किन्तु विशेष्यलिङ्ग के आश्रित है। अतः इस की यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से नदीसञ्ज्ञा नहीं होती। ओः सुंपि (२१०) से प्राप्त यण् का न भूसुधियोः(२०२) से निषेध हो कर अचि श्नु०(१६६) से उवँङ् हो जाता है। रूपमाला यथा— स्वयम्भू (देवी, आदि शक्ति) प्रथमा स्वयम्भूः स्वयम्भुवौ स्वयम्भुवः द्वितीया स्वयम्भुवम् " " तृतीया स्वयम्भुवा स्वयम्भूभ्याम् स्वयम्भूभिः चतुर्थी स्वयम्भुवे " स्वयम्भूभ्यः पञ्चमी स्वयम्भुवः " " षष्ठी " स्वयम्भुवोः स्वयम्भुवाम् सप्तमी स्वयम्भुवि " स्वयम्भूषु सम्बोधन हे स्वयम्भूः ! हे स्वयम्भुवौ ! हे स्वयम्भुवः ! नोट—वधू (बहू), जम्बू (जामुनवृक्ष), चमू (सेना), चञ्चू (चोंच), तनू (शरीर), चम्पू (गद्यपद्यमिश्रित काव्य), श्वश्रू (सास), गुग्गुलू (गूगल), कमण्डलू (कमण्डल), वामोरू (सुन्दर पट्टों वाली स्त्री), संहितोरू (सटी हुई जांघों वाली), कद्रू (सर्पों की माता), कर्कन्धू (बेर) आदि शब्दों की प्रक्रिया गौरीशब्दवत् होती है। केवल ङ्यन्त न होने से सुँलोप नहीं होता। निदर्शनार्थ 'वधू' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० वधूः वध्वौ वध्वः | प० वध्वाः वधूभ्याम् वधूभ्यः द्वि० वधूमू " वधूः | प० " वध्वोः वधूनाम् तृ० वध्वा वधूभ्याम् वधूभिः | स० वध्वाम् " वधुषु च० वध्वै " वधूभ्यः | सं० हे वधु! हे वध्वौ! हे वध्वः! (यहां ऊकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) —:: o ::— अब ऋदन्त स्त्रीलिङ्गों का वर्णन करते हैं। स्वसृ (बहन) आदि ऋदन्त शब्दों से स्त्रीलिङ्ग में ऋन्नेभ्यो ङीप् (२३२) से ङीप् प्राप्त होता है। इस का अग्रिम- सूत्र से निषेध करते हैं— [लघु०] निषेध-सूत्रम्—(२३३) न षट्-स्वस्रादिभ्यः ।४।१।१०॥