लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
अजन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ३१७ सप्तमी भ्रुवाम्, भ्रुवि भ्रुवोः भ्रुषु सम्बोधन हे भ्रूः! हे भ्रुवौ! हे भ्रुवः! इसी प्रकार भू (पृथ्वी) शब्द के रूप होते हैं। [लघु०] स्वयम्भूः पुंवत् ॥ अर्थः—स्वयम्भूशब्द पुंलिङ्ग 'स्वयम्भू' के समान होता है। व्याख्या—स्वयम्भू शब्द नित्यस्त्रीलिङ्ग नहीं, किन्तु विशेष्यलिङ्ग के आश्रित है। अतः इस की यू स्त्र्याख्यौ नदी (१६४) से नदीसञ्ज्ञा नहीं होती। ओः सुंपि (२१०) से प्राप्त यण् का न भूसुधियोः(२०२) से निषेध हो कर अचि श्नु०(१६६) से उवँङ् हो जाता है। रूपमाला यथा— स्वयम्भू (देवी, आदि शक्ति) प्रथमा स्वयम्भूः स्वयम्भुवौ स्वयम्भुवः द्वितीया स्वयम्भुवम् " " तृतीया स्वयम्भुवा स्वयम्भूभ्याम् स्वयम्भूभिः चतुर्थी स्वयम्भुवे " स्वयम्भूभ्यः पञ्चमी स्वयम्भुवः " " षष्ठी " स्वयम्भुवोः स्वयम्भुवाम् सप्तमी स्वयम्भुवि " स्वयम्भूषु सम्बोधन हे स्वयम्भूः ! हे स्वयम्भुवौ ! हे स्वयम्भुवः ! नोट—वधू (बहू), जम्बू (जामुनवृक्ष), चमू (सेना), चञ्चू (चोंच), तनू (शरीर), चम्पू (गद्यपद्यमिश्रित काव्य), श्वश्रू (सास), गुग्गुलू (गूगल), कमण्डलू (कमण्डल), वामोरू (सुन्दर पट्टों वाली स्त्री), संहितोरू (सटी हुई जांघों वाली), कद्रू (सर्पों की माता), कर्कन्धू (बेर) आदि शब्दों की प्रक्रिया गौरीशब्दवत् होती है। केवल ङ्यन्त न होने से सुँलोप नहीं होता। निदर्शनार्थ 'वधू' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० वधूः वध्वौ वध्वः | प० वध्वाः वधूभ्याम् वधूभ्यः द्वि० वधूमू " वधूः | प० " वध्वोः वधूनाम् तृ० वध्वा वधूभ्याम् वधूभिः | स० वध्वाम् " वधुषु च० वध्वै " वधूभ्यः | सं० हे वधु! हे वध्वौ! हे वध्वः! (यहां ऊकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) —:: o ::— अब ऋदन्त स्त्रीलिङ्गों का वर्णन करते हैं। स्वसृ (बहन) आदि ऋदन्त शब्दों से स्त्रीलिङ्ग में ऋन्नेभ्यो ङीप् (२३२) से ङीप् प्राप्त होता है। इस का अग्रिम- सूत्र से निषेध करते हैं— [लघु०] निषेध-सूत्रम्—(२३३) न षट्-स्वस्रादिभ्यः ।४।१।१०॥
३१८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् ङीप्टापौ न स्तः ॥ स्वसा तिस्रश्चतस्रश्च ननान्दा दुहिता तथा । याता मातेति सप्तैते स्वस्रादय उदाहृताः ॥ स्वसा । स्वसारौ ॥ अर्थ—षट्संज्ञकों तथा स्वसृ आदियों से परे ङीप् और टाप् नहीं होते । स्वसृ आदियों का कारिका में परिगणन करते हैं—१ स्वसृ (बहन), २ तिसृ (त्रि को स्त्रीलिङ्ग में हुआ आदेश), ३ चतसृ (चतुर् को स्त्रीलिङ्ग में हुआ आदेश), ४ ननान्दृ (पति की बहन, ननन्द), ५ दुहितृ (लड़की), ६ यातृ (पति के भाई की पत्नी), ७ मातृ (माता)—ये सात शब्द स्वस्रादि कहे गये हैं । व्याख्या—न इत्यव्ययपदम् । षट्स्वस्रादिभ्यः ।५।३। ङीप् ।१।१। (ऋन्नेभ्यो ङीप् से) । टाप् ।१।१। (अजाद्यतष्टाप् से) । समास—षट् च स्वस्रादयश्च = षट्- स्वस्रादयः, तेभ्यः = षट्स्वस्रादिभ्यः, इतरेतरद्वन्द्वः । अर्थ—(षट्स्वस्रादिभ्यः) षट्सञ्ज्ञकों तथा स्वसृ आदि शब्दों से परे (ङीप्) ङीप् और (टाप्) टाप् (न) नहीं होते । स्वस्रादिगण मूल में श्लोकबद्ध दे दिया गया है । षट्सञ्ज्ञा आगे (२६७) सूत्र द्वारा षष्, पञ्चन्, सप्तन् आदि शब्दों की कही गई है । ‘स्वसृ’ शब्द की प्रक्रिया अजन्तपुंलिङ्गोक्त ‘धातृ’ शब्द के समान होती है। केवल शस् में सकार को नकार नहीं होता—‘स्वसॄः’ । रूपमाला यथा— प्र० स्वसा* स्वसारौ स्वसारः† प० स्वसुः‡ स्वसृभ्याम् स्वसृभ्यः द्वि० स्वसारम् ,, † स्वसॄः प० ,, ‡ स्वस्रोः स्वसॄणाम् तृ० स्वस्रा स्वसृभ्याम् स्वसृभिः स० स्वसरि✓ ,, स्वसृषु च० स्वस्रे ,, स्वसृभ्यः स० हे स्वसः! हे स्वसारौ! हे स्वसारः!
- अनडुदानस्० (२०५) से अनँङ्, अप्तृन्तृच्स्वसृ० (२०६) से उपधादीर्घ, हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) से सकारलोप तथा न लोप० (१८०) से नकारलोप । † ऋतो ङि० (२०४) से गुण तथा अप्तॄन्० (२०६) से उपधादीर्घ । ‡ ऋत उत् (२०८) से उत्, रात्सस्य (२०६) से सकारलोप । ✓ऋतो ङि० (२०८) से गुण, रपर । ✕ऋतो ङि० (२०४) से गुण, हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) से सुंलोप । [लघु०] माता पितृवत् । शसि—मातृः ॥ व्याख्या—मातृ (माता) शब्द की प्रक्रिया अजन्तपुंलिङ्गोक्त ‘पितृ’ शब्दवत् होती है । केवल शस् में नत्व न होने से ‘मातृः’ यह विशेष है । रूपमाला यथा— प्र० माता मातरो मातरः प० मातुः मातृभ्याम् मातृभ्यः द्वि० मातरम् ,, मातृः प० ,, मात्रोः मातृणाम् तृ० मात्रा मातृभ्याम् मातृभिः स० मातरि ,, मातृषु च० मात्रे ,, मातृभ्यः स० हे मातः! हे मातरौ! हे मातरः!
अजन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ३१६ इसी प्रकार—ननान्दृ, दुहितृ और यातृ शब्दों के उच्चारण होते हैं। (यहां ऋदन्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) ---::०::--- [लघु०] द्यौर्गोवत् ॥ व्याख्या—'द्यो' शब्द का अर्थ आकाश वा स्वर्ग है। द्यौः स्त्री स्वर्गन्तरिक्षयोः इत्यौणादिकपदार्णवे पेरुसूरिः। द्युतैं दीप्तौ (भ्वा० आ०) धातु से बहुल के कारण औणादिक 'डो' प्रत्यय करने से 'द्यो' शब्द निष्पन्न होता है। इस की प्रक्रिया अजन्त- पुंल्लिङ्गस्थ 'गो' शब्द के समान होती है। रूपमाला यथा— प्र० द्यौः† द्यावौ† द्यावः† प० द्योः* द्योभ्याम् द्योभ्यः द्वि० द्याम्‡ ,, द्याः‡ प० ,, * द्यवोः द्यवाम् तृ० द्यवा द्योभ्याम् द्योभिः स० द्यवि ,, द्योषु च० द्यवे ,, द्योभ्यः सं० हे द्यौः! हे द्यावौ! हे द्यावः! † गोतो णित् (२१३) से णित्त्व हो कर अचो ञ्णिति (१८२) से वृद्धि। ‡ औतोऽम्शसोः (२१४) से आकार एकादेश।
- ङसिँ-ङसोश्च (१७३) से पूर्वरूप एकादेश। इसी प्रकार स्त्रीलिङ्ग गो (गाय) शब्द का उच्चारण होता है। (यहां ओकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) ---::०::--- [लघु०] राः पुंवत् ॥ व्याख्या—'रै' शब्द पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग दोनों में प्रयुक्त होता है। स्त्री- लिङ्ग में भी प्रक्रिया पुंलिङ्ग के समान होती है। रूपमाला यथा— प्र० राः रायौ रायः प० रायः राभ्याम् राभ्यः द्वि० रायम् ,, ,, प० ,, रायोः रायाम् तृ० राया राभ्याम् राभिः स० रायि ,, रासु च० राये ,, राभ्यः सं० हे राः! हे रायौ! हे रायः! हलादि विभक्तियों में रायो हलि (२१५) से ऐकार को आकार आदेश तथा अजादि विभक्तियों में एचोऽयवायावः (२२) से आय् आदेश हो जाता है। (यहां ऐकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) ---::०::--- [लघु०] नौर्ग्लौवत् ॥ व्याख्या—णुद प्रेरणे (तुदा० प०) धातु से ग्ला-नुदिभ्यां डौः (उणा० २२२) सूत्र द्वारा डौ प्रत्यय हो कर टि का लोप करने से 'नौ' (नौका) शब्द निष्पन्न होता है। इस की समग्र प्रक्रिया अजन्तपुंलिङ्गान्तर्गत 'ग्लौ' शब्द के समान होती है। रूपमाला यथा—
३२० | भैमीव्याख्योपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् प्र० नौ नावौ नाव | प० नाव नौभ्याम् नौभ्य द्वि० नावम् ,, ,, | ष० ,, नावो नावाम् तृ० नावा नौभ्याम् नौभि | स० नावि ,, नौषु च० नावे ,, नौभ्य | स० हे नौ ! हे नावौ ! हे नाव ! अजादिविभक्तियों में एचोऽयवायाव (२२) से आव् आदेश हो जाता है। (यहाँ औकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) [लघु०] इत्यजन्ता स्त्रीलिङ्गा [शब्दा ] ॥ अर्थ—यहाँ 'अजन्तस्त्रीलिङ्ग' शब्द समाप्त होते हैं। अभ्यास (३५) (१) क्या कारण है कि इयङ्स्थानी होने पर भी 'स्त्री' शब्द में नदीसञ्ज्ञा का निषेध नहीं होता ? (२) 'रमायै' में आटश्च सूत्र क्यों प्रवृत्त नहीं होता ? (३) क्या कारण है कि अजन्त स्त्रीलिङ्ग प्रकरण में ह्रस्व अकारान्त शब्दों का वर्णन नहीं किया गया ? (४) 'औङ्' किसे कहते हैं, उस का किस सूत्र में उल्लेख आया है ? (५) मत्याम्, धेन्वाम् आदि में ङि को आम् करने के लिये डेराम्० के विद्यमान रहते इदुद्भ्याम् क्यों बनाना पड़ा ? स्पष्ट करें। (६) लिङ्गविशिष्टपरिभाषा का सोदाहरण विवेचन करें। (७) गुणदीर्घौत्वानांमपवाद का तात्पर्य उदाहरणप्रदर्शनपूर्वक व्यक्त करें। (८) निम्नस्थ रूपों की ससूत्र सिद्धि करते हुए वैकल्पिक रूप भी लिखें— १ तिस्र । २ मातृ । ३ द्यौ । ४ अवक् । ५ रमयो । ६ स्त्रियम् । ७ श्रीणाम् । ८ मतौ । ६ द्वे । १० स्त्रिय । ११ मत्यै । १२ उत्तरपूर्वायाम् । १३ श्री । १४ रमायाम् । १५ स्त्रियौ । १६ द्यो । १७ रमे । १८ स्वसारौ । १६ भ्रुवाम् । २० क्रोष्ट्री । (६) 'हे श्री' में इयङ् आदेश न होने पर भी कैसे नेयैङुवँ० प्रवृत्त होता है? (१०) स्त्रीलिङ्गी उन ईदन्तशब्दों का निर्देश करें जिन में सुंलोप नहीं होता । (११) स्त्री, भ्रू, धेनु लक्ष्मी, स्वसृ, श्री—शब्दों की रूपमाला लिखें। (१२) सूत्रों की व्याख्या करें— अचि र ऋत , नेयैङुवँस्थान्०, ङिति ह्रस्वश्च, वाऽमि, इदुद्भ्याम् । ————— ० ————— इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु-सिद्धान्त- कौमुद्यामजन्त-स्त्रीलिङ्ग- प्रकरणं समाप्तम् ॥
अथाऽजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम्
अब क्रमप्राप्त अजन्तनपुंसक शब्दों का विवेचन करते हैं। सर्वप्रथम अदन्त शब्दों का वर्णन प्रारम्भ होता है— ज्ञा अवबोधने (क्रया० प०) धातु से ल्युट् प्रत्यय कर यु को अन आदेश करने से 'ज्ञान' (जानना) शब्द निष्पन्न होता है। कृदन्तत्वात् प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर इस से स्वादिप्रत्ययों की उत्पत्ति होती है। प्रथमा के एकवचन 'ज्ञान + स्' (सुँ) में अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२३४) अतोऽम् ७।१।२४॥ अतोऽङ्गात् क्लीबात् स्वमोborderम्। अमि पूर्वः (१३५)—ज्ञानम्। एङ्- ह्रस्वाद्० (१३४) इति हल्लोपः—हे ज्ञान!॥ अर्थः—अदन्त नपुंसक अङ्ग से परे सुँ और अम् को अम् आदेश हो। व्याख्या—अतः ।५।१। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य इस अधिकृत का वचनविपरि- णाम द्वारा)। नपुंसकात् ।५।१। स्वमोः ।६।२। (स्वमोर्नपुंसकात् से)। अम् ।१।१। समासः—सुश्च अम् च = स्वमौ, तयोः = स्वमोः, इतरेतरद्वन्द्वः। 'अङ्गात्' का विशेषण होने से 'अतः' से तदन्तविधि हो कर 'अदन्ताद् अङ्गात्' बन जाता है। अर्थः—(अतः = अदन्तात्) अदन्त (नपुंसकात्) नपुंसक (अङ्गात्) अङ्ग से परे (स्वमोः) सुँ और अम् के स्थान पर (अम्) अम् आदेश हो। अनेकाल् होने से अम् आदेश अनेकाल्र्शित् सर्वस्य (४५) द्वारा सर्वादेश होगा। स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) सूत्र से नपुंसक में सुँ और अम् का लुक् प्राप्त था; ह्रस्व अकारान्त शब्दों में यह सूत्र उस का बाध करता है। अम् को अम् इसीलिये विधान किया गया है। द्विर्बद्धं सुबद्धं भवति। १. कई लोग अतोम् सूत्र का 'अतः ।६।१। म् ।१।१।' इस प्रकार पदच्छेद करते हुए —अदन्त नपुंसक अङ्ग से परे सुँ और अम् को 'म्' आदेश हो—ऐसा अर्थ करते हैं। इस प्रकार सुँ में सकार को 'म्' आदेश हो कर—'ज्ञानम्' प्रयोग ठीक सिद्ध हो जाता है। अम् के विषय में आदेः परस्य (७२) परिभाषा द्वारा अम् के आदि अकार को मकार हो कर 'संयोगान्तलोप करने से 'ज्ञानम्' भी सिद्ध हो जाता है। किञ्च सम्बुद्धि में प्रक्रिया अतीव सरल हो जाती है अर्थात् ज्योंही सम्बुद्धि के सकार को मकार करते हैं त्योंही एङ्ह्रस्वात् सम्बुद्धेः (१३४) से उस का लोप हो जाता है, अन्तादिवच्च (४१) से पूर्वान्तवद्भाव की कल्पना का कष्ट नहीं उठाना पड़ता। परन्तु शेखरकार आदियों ने इस मत की खूब आलोचना की है। उन का कथन है कि 'म्' आदेश मानने पर 'ज्ञानम्' आदियों में सुंपि च (१४१) से दीर्घ प्राप्त होगा जो अनिष्ट है। किञ्च एङ्ह्रस्वात्० (१३४) के भाष्य से स्पष्ट प्रतीत होता है कि भाष्यकार 'अम्' आदेश ही मानते हैं 'म्' आदेश नहीं। ल० प्र० (२१)
३२२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् 'ज्ञान+सु' यहां प्रकृतसूत्र से सुं को अम् आदेश हो कर अमि पूर्व (१३५) से पूर्वरूप करने पर—ज्ञान् अ म् = 'ज्ञानम्' प्रयोग सिद्ध होता है । ध्यान रहे कि 'सुं' विभक्तिमञ्ज्ञक है अतः इस के स्थान पर आदेश होने वाला अम् भी विभक्तिमञ्ज्ञक होगा । अत एव हलन्त्यम् (१) द्वारा प्राप्त अम् के मकार की इत्सञ्ज्ञा का न विभक्तौ तुस्मा (१३१) से निषेध हो जायेगा । सम्बुद्धि में 'हे ज्ञान+स्' इस स्थिति में परत्व के कारण सम्बुद्धिलोप का बाध कर प्रकृतसूत्र से सुं को अम् आदेश हो कर अमि पूर्व (१३५) से पूर्वरूप करने पर 'ज्ञानम' हुआ। पुनः एङ्ह्रस्वात्सम्बुद्धे (१३४) से सम्बुद्धि के हल्—मकार का लोप करने पर 'हे ज्ञान' प्रयोग सिद्ध होता है¹ । प्रथमा के द्विवचन में 'ज्ञान+औ' इस स्थिति में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२३५) नपुंसकाच्च ॥७।१।१९॥ क्लीबाद् औडः शी स्यात् । भसञ्ज्ञायाम्— अर्थ—नपुंसक अङ्ग से परे 'औ' को 'शी' आदेश हो जाता है । भसञ्ज्ञा करने पर (अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है ।) व्याख्या—नपुंसकात् ।५।१। च इत्यव्ययपदम् । अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य इस अधिकृत का वचनविपरिणाम हो जाता है) । औङः ।६।१। (औङ आपः से) । शी ।१।१। (जसः शी से) । अर्थ—(नपुंसकात्) नपुंसक (अङ्गात्) अङ्ग से परे (औङः) औङ् के स्थान पर (शी) शी आदेश हो । प्रथमा तथा द्वितीया के द्विवचन की औङ् सञ्ज्ञा है—यह पीछे औङ आपः (२१६) सूत्र पर लिख चुके हैं । 'ज्ञान+औ' यहां शी आदेश हो अनुबन्धलोप करने से 'ज्ञान+ई' हुआ । अत्र 'ई' यह 'औ' के स्थान पर आदेश होने के कारण स्थानिवद्भावेन स्वादि है । सुडनपुंस- कस्य (१६३) से नपुंसक का वर्जन होने से सर्वनामस्थान भी नहीं । किञ्च यह अजादि भी है अतः इस के परे होने पर यचि भम् (१६५) से ज्ञानशब्द की भसञ्ज्ञा हो अग्रिमसूत्र द्वारा नकारोत्तर अकार का लोप प्राप्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२३६) यस्येति च ॥६।४।१४८॥ ईकारे तद्धिते च परे भस्येवर्णावर्णयोर्लोपः । इत्यल्लोपे प्राप्ते— अर्थ—ईकार या तद्धित परे होने पर भसञ्ज्ञक इवर्ण अवर्ण का लोप हो । व्याख्या—यस्य ।६।१। भस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । ईति ।७।१। च इत्य- व्ययपदम् । तद्धिते ।७।१। (भस्तद्धिते से) । लोपः ।१।१। (अल्लोपोऽनः से) । समास —इश्च अश्च = यम्, तस्य = यस्य, समाहारद्वन्द्वः । अर्थ—(ईति) ईकार (च) अथवा (तद्धिते) तद्धित परे होने पर (भस्य) भसञ्ज्ञक (यस्य) इवर्ण अवर्ण का १. हे ज्ञान्+म् = हे ज्ञान्+अम् = हे ज्ञान्+म् । यहां पूर्वरूप अकार को अन्तादि- वच्च (८१) से पूर्व का अन्त मान लेने से 'ज्ञान' यह ह्रस्वान्त अङ्ग हो जाता है । तब इस से परे सम्बुद्धि के हल् मकार का लोप हो जाता है ।
अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३२३ (लोपः) लोप हो जाता है। इस सूत्र के उदाहरण आगे यथास्थान बहुत आएंगे। 'ज्ञान + ई' यहां ईकार परे है अतः भसञ्ज्ञक अकार का लोप प्राप्त होता है, पर यह अनिष्ट है। अतः इस के निषेध के लिये अग्रिम वार्त्तिक प्रवृत्त होता है— [लघु०] वा०—(२२) औङः श्यां प्रतिषेधो वाच्यः ॥ ज्ञाने ॥ अर्थः—औङ् के स्थान पर आदेश हुए 'शी' के परे होने पर यस्येति च (२३६) सूत्र की प्रवृत्ति नहीं होती। व्याख्या—यह वार्त्तिक यस्येति च सूत्र पर महाभाष्य में पढ़ा गया है। अतः इस से उसी का निषेध होता है। औङः ।६।१। श्याम् ।७।१। प्रतिषेधः ।१।१। अर्थः— (औङः) औङ् के स्थान पर हुए (श्याम्) शी के परे होने पर (प्रतिषेधः) यस्येति च सूत्र की प्रवृत्ति का निषेध हो जाता है। 'ज्ञान + ई' यहां इस वार्त्तिक से यस्येति च (२३६) से प्राप्त अकारलोप का निषेध हो आद् गुणः (२७) से एकार गुण कर 'ज्ञाने' प्रयोग सिद्ध होता है। प्रथमा के बहुवचन में 'ज्ञान + जस्' इस स्थिति में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२३७) जश्शसोः शिः ।७।१।२०॥ क्लीवाद् अनयोः शिः स्यात् ॥ अर्थः—नपुंसकलिङ्ग से परे जस् और शस् को 'शि' आदेश हो। व्याख्या—नपुंसकात् ।५।१। (स्वमोर्नपुंसकात् से)। जश्शसोः ।६।२। शिः ।१।१। समासः—जश्च शश्च = जश्शसौ, तयोः = जश्शसोः, इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः— (नपुंसकात्) नपुंसक से परे (जश्शसोः) जस् और शस् के स्थान पर (शिः) शि आदेश हो। जस् और शस् प्रत्यय हैं अतः स्थानिवद्भाव से 'शि' भी प्रत्यय है। प्रत्यय होने से इस के शकार की लशक्वतद्धिते (१३६) से इत्सञ्ज्ञा हो कर 'इ' ही शेष रहता है—ज्ञान + शि = ज्ञान + इ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है - [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(२३८) शि सर्वनामस्थानम् ।१।१।४१॥ 'शि' इत्येतद् उक्तसञ्ज्ञं स्यात् ॥ अर्थः—'शि' यह सर्वनामस्थानसञ्ज्ञक हो। व्याख्या—शि ।१।१। सर्वनामस्थानम् ।१।१। अर्थः—(शि) शि (सर्वनाम- स्थानम्) सर्वनामस्थानसञ्ज्ञक हो। नपुंसकलिङ्ग में जस् की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा नहीं होती—यह पीछे सुडनपुंस- कस्य (१६३) सूत्र में बताया जा चुका है। और शस् की तो सुँट् न होने से किसी भी लिङ्ग में सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा नहीं होती। तो यहां नपुंसक में जस् और शस् के स्थान पर होने वाला 'शि' आदेश स्थानिवद्भाव से किसी भी प्रकार सर्वनामस्थान-
३२४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् संज्ञक नहीं हो सकता था, परन्तु इस की सर्वनामस्थानसंज्ञा करनी इष्ट है । अतः इस सूत्र से उस का विधान किया गया है । 'ज्ञान + इ' यहां शि की सर्वनामस्थान-संज्ञा हो अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२३६) नपुंसकस्य झलचः ।७।१।७२॥ झलन्तस्याजन्तस्य च क्लीवस्य नुम् स्यात् सर्वनामस्थाने ॥ अर्थः—सर्वनामस्थान परे हो तो झलन्त और अजन्त नपुंसक को नुँम् आगम हो । व्याख्या—नपुंसकस्य ।६।१। झलच ।६।१। नुम् ।१।१। (इदितो नुम् धातो से)। सर्वनामस्थाने ।७।१। (उगिदचां सर्वनामस्थाने० से) । समास —झल् च अच् च = झलचौ, समासान्तविधेरनित्यत्वाद् द्वन्द्वाच्चुद० (५८६) इति न टच् । तस्य = झलचः, समाहारद्वन्द्व । 'नपुंसकस्य' का विशेषण होने से 'झलच' से तदन्तविधि हो जाती है । अर्थ —(सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे होने पर (झलच ) झलन्त और अजन्त (नपुंसकस्य) नपुंसकलिङ्ग का अवयव (नुँम्) नुँम् हो जाता है १। 'ज्ञान + इ' यहां 'ज्ञान' यह अजन्तनपुंसक है, इस से परे 'इ' (शि) यह सर्व- नामस्थान विद्यमान है । अतः प्रकृत नपुंसकस्य झलचः से 'ज्ञान' को नुँम् का आगम प्राप्त होता है । परन्तु प्रश्न उत्पन्न होता है कि नुँम् का आगम नपुंसक का कौन सा अवयव हो ? क्या आद्य अवयव हो या अन्त अवयव ? अथवा और ही कुछ ? इस का अग्रिम परिभाषा से निर्णय करते हैं— [लघु०] परिभाषा सूत्रम्—(२४०) मिदचोऽन्त्यात् परः ।१।१।४६॥ अचां मध्ये योऽन्त्य , तस्मात्परस्तस्यैवान्तावयवो मित् स्यात् । उपधा- दीर्घ —ज्ञानानि । पुनस्तद्वत् । शेषं पुंवत् ॥ अर्थ —समुदाय के अचों में जो अन्त्य अच्, उस से परे मित् का आगम होता है । किञ्च वह उस समुदाय का अन्तावयव माना जाता है । व्याख्या—मित् ।१।१। अच ।६।१। अन्त्यात् ।५।१। पर ।१।१। अन्त ।१।१। (आद्यन्तौ टकितौ से) । समास —म् इत् यस्य स मित्, बहुव्रीहिसमास । अच इति निर्धारणे षष्ठी, सौत्रमेकवचन जात्यभिप्रायेण । यस्य समुदायस्य मिद् विहित तस्य समुदायस्य अचांमध्य इत्यर्थः । अर्थ —(मित्) मित् आगम (अच ) जिस समुदाय को विधान किया गया हो उस समुदाय के अचों के मध्य में (अन्त्यात्) जो अन्त्य अच्, १ यहां झलन्तलक्षण नुँम् में यह बात विशेष ज्ञातव्य है कि यदि झल् किसी अच् से परे होगा तो तभी नुँम् का आगम होगा, अन्यथा नहीं । अच परस्यैव झलो नुम्वि- धानम्—इति भाष्ये । अत एव 'मांस + जस्=मास्+इ=मांसि, (प्रजायाम्) गवाञ्च + जस्=गवाञ्च्+इ=गवाञ्चि' इत्यादिप्रयोगों में झलन्तलक्षण नुँम् की प्रवृत्ति नहीं होती ।
अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३२५
उस से (परः) परे वह स्थित होता है। किञ्च वह उसी समुदाय का (अन्तः) अन्त अवयव समझा जाता है¹। भाव—जिस समुदाय को मित् (म् इत् वाला—नुँम् आदि) कहा जाये उस समुदाय में जितने अच् हों, उन में से अन्तिम अच् से परे मित् रखा जाना चाहिये, तथा उस मित् को उस समुदाय का अन्तिम अवयव समझना चाहिये। 'ज्ञान + इ' यहां 'ज्ञान' इस समुदाय को मित्-नुँम् विधान किया गया है। 'ज्ञान' में दो अच् हैं; एक नकारोत्तर आकार और दूसरा नकारोत्तर अकार। तो अन्त्य अच् नकारोत्तर अकार से परे 'नुँम्' रखा जायेगा और यह ज्ञानशब्द का अन्तावयव समझा जायेगा। 'ज्ञाननुँम् + इ' यहां नुँम् के उँम् का लोप हो कर 'ज्ञानन् + इ' हुआ। नुँम् करने से पूर्व 'ज्ञान' अङ्ग था; परन्तु अब नुँम् के अन्तावयव हो जाने से 'ज्ञानन्' यह नान्त अङ्ग हो गया है। नान्त हो जाने पर सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) से उस की उपधा को दीर्घ हो कर—ज्ञानान् + इ = 'ज्ञानानि' प्रयोग सिद्ध होता है। द्वितीया के एकवचन 'ज्ञान + अम्' में अतोऽम् (२३४) से अम् को अम् आदेश हो जाता है। इस का लाभ स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से अम् का लुक् न होना है। पुनः अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप हो कर 'ज्ञानम्' प्रयोग सिद्ध होता है। द्वितीया के द्विवचन में 'ज्ञान + औ' (औट्) इस स्थिति में पूर्ववत् नपुंसकाच्च (२३५) से औ को शी आदेश हो कर अनुबन्धलोप और गुण करने से 'ज्ञाने' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि यहां भी पूर्ववत् भसञ्ज्ञा, भसञ्ज्ञक अकार के लोप की प्राप्ति तथा उस का वारण कर लेना चाहिये। द्वितीया के बहुवचन 'ज्ञान + शस्' में पूर्ववत् जश्शसोः शिः (२३७) से शि
१. यदि मित् समुदायभक्त = समुदाय का अवयव न माना जाये तो 'वहंलिहः' (कन्धे को चाटने वाला बैल) आदि प्रयोगों में पदमूलक अनुस्वार न हो सकेगा। तथाहि —वहं (स्कन्धं) लेढीति वहंलिहः। 'वह' कर्म उपपद रहते 'लिह्' धातु से वहाभ्रे लिहः (३.२.३२) से खश् प्रत्यय हो कर अनुबन्धलोप करने से 'वहलिह्' होता है। अब अरुद्विषदजन्तस्य मुँम् (७६७) से 'वह' को मुँम् का आगम हो कर 'वहम् + लिह' बनता है। 'वह' पदसञ्ज्ञक था; अब यदि मुँम् को उस का अवयव नहीं मानते तो 'वहम्' यह मान्त पद नहीं हो सकता—जो अनिष्ट है। अब मित् के अन्तावयव स्वीकृत होने से मान्त पद हो जाता है और इस प्रकार मोऽनुस्वारः (७७) से अनुस्वार सिद्ध हो जाता है। इसी तरह 'वारीणि' आदि में नुँम् को अङ्ग का अवयव मानने से नान्त अङ्ग की उपधा को दीर्घ हो जाता है। ध्यान रहे कि सूत्र का यह अंश जहां उपयोगी होगा वहीं प्रवृत्त होगा; 'मुञ्चति' आदि में प्रयोजनाभाव के कारण इस का उपयोग न होगा। [देखें शेखर और चिदस्थि- माला]
३२६ | भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
आदेश, अनुबन्धलोप, उस की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा, नपुंसकस्य झलच (२३६) से नुँम् का आगम तथा नान्त अङ्ग की उपधा को दीर्घ कर 'ज्ञानानि' सिद्ध होता है। नोट—नपुंसकलिङ्ग मे प्राय प्रथमा और द्वितीया विभक्ति के रूप तथा उन की प्रक्रिया एक समान हुआ करती है। अत आगे प्रथमा विभक्ति की ही सिद्धि करेंगे, उस से द्वितीया की भी सिद्धि समझ लेनी चाहिये। नपुंसक मे प्राय तृतीयादि विभक्तियों के रूप पुंल्लिङ्ग के समान होते हैं, अत' वहा उन की भी सिद्धि नही करेंगे। हा जहा कुछ विशेष होगा वहा पूरी २ प्रक्रिया लिखेंगे। ज्ञान शब्द की रूपमाला यथा— प्र० ज्ञानम् ज्ञाने ज्ञानानि | प० ज्ञानात् ज्ञानाभ्याम् ज्ञानेभ्यः द्वि० " " " | ष० ज्ञानस्य ज्ञानयोः ज्ञानानाम् तृ० ज्ञानेन ज्ञानाभ्याम् ज्ञानैः | स० ज्ञाने " ज्ञानेषु च० ज्ञानाय " ज्ञानेभ्य | सं० हे ज्ञान ! हे ज्ञाने ! हे ज्ञानानि ! [लघु०] एवं धन-वन-फलादयः ॥ अर्थः—इसी तरह धन, वन, फल आदि अदन्त नपुंसको के रूप होते हैं। व्याख्या—बालको की ज्ञानवृद्धि के लिये ज्ञानवत् अदन्तनपुंसक शब्दो का कुछ उपयोगी सङ्ग्रह यहा दे रहे हैं। '*' यह चिह्न णत्वप्रक्रिया का परिचायक है।
| शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ |
|---|---|---|
| अक्षर* = अकारादि वर्ण | अहिफेन = अफीम | ऐक्य = एकता |
| अगार* = गृह | अंशुक = महीन वस्त्र | ओदन = भात |
| अग्निहोत्र* = होम | आधिक्य = ज्यादती | औत्सुक्य = उत्कण्ठा |
| अघ = पाप | आनन = मुख | कङ्कण = कंगन |
| अङ्ग = अवयव | आर्जव = सरलता | कज्जल = काजल |
| अञ्जन = सुरमा | आर्द्रक* = अदरक | कनक = सुवर्ण, धतूरा |
| अनृत = झूठ | आसन = आसन | कमल = कमल |
| अन्तरिक्ष* = आकाश | आस्य = मुख | काञ्चन = सुवर्ण |
| अन्त पुर* = रनवास | इङ्गित = इशारा | कार्य* = काम |
| अभ्र* = बादल | इन्दीवर* = नीला कमल | कुण्ड = हौदी |
| अभ्रक* = अभ्रक | इन्द्रजाल = माया वा छल | कुमुद = श्वेत कमल |
| अमृत = जल, अमृत | इन्द्रिय* = नेत्र आदि | कौटिल्य = कुटिलता |
| अम्भोज = पद्म | इन्धन = लकड़ी | क्षीर* = दूध |
| अम्ल = छाछ, खट्टा | उदक = जल | क्षेत्र* = खेत |
| अरण्य = जगल | उदर* = पेट | ख = आकाश |
| अरविन्द = पद्म | उद्यान = बगीचा | गवेषण = खोज |
| अवसान = विराम | उपवन = ,, | गौरव* = गुरुत्व, प्रतिष्ठा |
| अस्त्र* = बाण आदि | ऋत = दैवी सत्य | चन्दन = चन्दन |
अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३२७ शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ | शब्द—अर्थ चरण = पैर (पुं० भी) | नेत्र* = आंख | रामठ = हीङ्ग चरित = चालचलन | नैपुण्य = निपुणता | रूप्य* = चान्दी चाञ्चल्य = चञ्चलता | पङ्कज = कमल | लक्षण = भेददर्शक चातुर्य* = निपुणता | पत्र* = पत्ता | ललाट = माथा चामीकर* = सुवर्ण | पाण्डित्य = विद्वत्ता | ललाम = प्रधान, सुन्दर चिबुक = ठोड़्डी | पानीय = पानी | लवङ्ग = लौंग चिह्न = निशान | पार्थक्य = जुदाई | लवण = नमक चौर्य* = चोरी | पुष्प* = फूल | लवित्र* = दरांती जठर* = पेट | पैशुन्य = चुगलखोरी | लशुन = लहसुन जल = पानी | फल = फल | लाङ्गल = हल जाड्य = मूर्खता | बाल्य = लड़कपन | लाङ्गूल = पूंछ जातिफल = जयफल | बीज = कारण | लाघव = हलकापन जाम्बूनद = सोना | भक्त = भात, सेवक | लालन = लाड करना टङ्कण = सुहागा | भय = डर | लालित्य = सौन्दर्य तत्त्व = यथार्थ रूप | भाल = मस्तक | लेख्य = दस्तावेज़ तथ्य = सत्य | भुवन = लोक | वक्त्र* = मुख तन्त्र* = शास्त्र | भोजन = खुराक | वङ्ग = रांगा, कली ताम्बूल = पान | मन्दिर* = घर | वचन = कथन तारुण्य = जवानी | मार्दव = कोमलता | वज्र* = इन्द्र का अस्त्र तिमिर* = अन्धकार | मित्र* = मित्र | वन = जंगल तुत्थ = नीला थोथा | मुख = मुंह | वसन = वस्त्र तृण = तिनका | मूल्य = दाम, कीमत | वाक्य = वाक्य तैल = तेल | मौन = चुप्पी | वाङ्मय = शास्त्र तोक = सन्तान | यन्त्र* = कल वा औज़ार | वाद्य = बाजा तोय = पानी | यवस = घास, तृण | वार्त्त = तन्दुरुस्ती दाक्षिण्य = चतुरता | युद्ध = लड़ाई | वार्धक्य = बुढ़ापा दास्य = दासता | योजन = चार कोस | वासर* = दिन (पुं० भी) दुर्भिक्ष* = अकाल | यौतक = दहेज | वाहन = सवारी दुःख = दुःख | यौतुक = दहेज | वितुन्नक = धनियां देवमन्दिर* = देवालय | यौवत = युवति-समूह | विवर* = छिद्र, बिल दैव = भाग्य | यौवन = जवानी | विश्वभेषज = सोंठ द्वार* = दरवाज़ा | रजत = चान्दी | विष* = जहर धन = धन | रत्न = मणि | वीर्य* = बल, पराक्रम नयन = आंख | रहस्य = गोप्य | वृत्त = चरित्र नवनीत = माखन | राज्य = राज
३२८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् शब्द-अर्थ | शब्द-अर्थ | शब्द-अर्थ वृन्द = समूह | सरसिज = कमल | स्तेय = चोरी वेतन = तनख्वाह | सरसीरुह* = कमल | स्तोत्र* = स्तुतिगीत वैचित्र्य* = विचित्रता | साक्ष्य* = गवाही | स्थान = जगह वैचक्र = हिक्मत | सादृश्य = सदृशता | स्थाविर* = बुढापा वैधव्य = विधवापन | साधन = उपकरण | स्थैर्य* = स्थिरता वैर* = दुश्मनी | साध्वस = डर | स्यन्दन = रथ व्यलीक = अपकार | सान्त्वन = दिलासा | हरिताल = हड़ताल व्यसन = विपत्ति | सामर्थ्यं = ताकत | हर्म्य* = महल व्रण = घाव | साहस = जबरदस्ती | हल = हल शस्त्र* = हथियार | साहाय्य = सहायता | हवन = होम शास्त्र* = धर्मग्रन्थ | सिक्तथ = मोम | हाटक = सुवर्ण शूल = दर्द, एक अस्त्र | सिन्दूर* = सिन्दूर | हालाहल = विषविशेष शैथिल्य = शिथिलता | सिंहासन = राजगद्दी | हास्तिक = हस्तिसमूह शैशव = लडकपन | सुकृत = पुण्य | हास्य = हँसी श्रवण = कान, सुनना | सुख = सुख | हित = भलाई सख्य = मित्रता | सुदर्शन = विष्णु का चक्र | हिम = बर्फ सङ्गीत = गायन आदि | सुवर्ण = सोना | हिरण्य = सुवर्ण सत्य = सच | सोपान = सीढ़ी | हृदय = दिल सत्र* = यज्ञ | सौकर्य* = आसानी | हैयङ्गवीन = ताजामाखन१ सदन = घर | सौभाग्य = अच्छा भाग्य | —०— कतर (दो में कौन) शब्द डतरप्रत्ययान्त बताया जा चुका है। विशेष्यलिङ्ग के आश्रित होने से यह त्रिलिङ्गी है। यहां नपुंसक में इस की प्रक्रिया यथा— कतर + सु (सुँ)। यहां अतोऽम् (२३४) से अम् आदेश प्राप्त होता है, इस पर अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि सूत्रम्— (२४१) अद्ड्२ डतरादिभ्यः पञ्चभ्यः ।७।१।२५॥ एभ्यः पञ्चेभ्यः स्वमोborderद्ड् आदेशः स्यात् ॥ १ इन के अतिरिक्त गमन, नमन, पठन, स्मरण, हरण आदि भाववाचक ल्युडन्त क्रियाशब्द भी अदन्त नपुंसक होते हैं। इस प्रकार के पौने तीन सौ शब्दो की एक विस्तृत सार्थ सूची इस व्याख्या के तृतीयभाग में ल्युट् च (८७१) सूत्र पर दी गई है। विशेष जिज्ञासु उसे वहीं देखें। २ अद्ड् डतरादिभ्यः। यहां ष्टुना ष्टुः (६४) से दकार को डकार हो कर संयोगा- न्तस्य लोपः (२०) से संयोगान्तलोप करने पर 'अड डतरादिभ्यः' हो जाना चाहिये था, परन्तु ऐसा नहीं किया गया। इस का कारण यह है कि वैसा करने म 'अड्' आदेश है या 'अद्ड्' इस का पता नहीं चल सकता था। अतः स्पष्ट- प्रतिपत्ति के लिये मुनि ने सन्धि नहीं की।
अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३२६ अर्थः—डतर आदि पञ्च नपुंसक शब्दों से परे सुं और अम् के स्थान पर अद्द् आदेश हो। व्याख्या—डतरादिभ्यः ।५।३। पञ्चभ्यः ।५।३। नपुंसकेभ्यः ।५।३। (स्वमो- र्नपुंसकात् से वचनविपरिणाम द्वारा)। स्वमोः ।६।२। अद्द् ।१।१। समासः—डतर आदिर्येषां ते डतरादयः, तेभ्यः = डतरादिभ्यः, तद्गुणसंविज्ञानबहुव्रीहिसमासः। डतर आदि पञ्च शब्द सर्वादिगण के अन्तर्गत आते हैं। १. डतर, २. डतम, ३. अन्य ४. अन्यतर, ५. इतर—ये पञ्च डतरादि कहाते हैं। इन में डतर और डतम प्रत्यय हैं; अतः प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम् परिभाषा द्वारा डतरप्रत्ययान्त और डतमप्रत्ययान्त शब्दों का ग्रहण होगा। अर्थः— (डतरादिभ्यः) डतरप्रत्ययान्त, डतमप्रत्ययान्त, अन्य, अन्यतर और इतर (पञ्चभ्यः) इन पञ्च (नपुंसकेभ्यः) नपुंसक शब्दों से परे (स्वमोः) सुँ और अम् को (अद्द्) अद्द् आदेश हो। यह सूत्र अतोऽम् (२३४) सूत्र का अपवाद है। 'कतर + सु' यहां सकार को अद्द् आदेश हो कर—'कतर + अद्द्'। हल- न्त्यम् (१) से अन्त्य हल् = डकार की इत्सञ्ज्ञा होने से लोप हो कर—'कतर + अद्'। अब यहां प्रथमयोः पूर्वसवर्णः (१२६) से पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होता है, परन्तु वह अनिष्ट है; टिलोप ही इष्ट है। अतः इस का अग्रिमसूत्र से विधान करते हैं— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२४२) टेः ।६।४।१४३॥ डिति भस्य टेलोपः। कतरत्, कतरद्। कतरे। कतराणि। हे कतरत्। शेषं पुंवत्। एवं कतमत्, इतरत्, अन्यत्, अन्यतरत्। अन्यतमस्य त्वन्यतम- मित्येव॥ अर्थः—डित् परे होने पर भसञ्ज्ञक टि का लोप हो। व्याख्या—डिति ।७।१। (ति विंशतेर्डिति से)। भस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। टेः ।६।१। लोपः ।१।१। (अल्लोपोऽनः से)। अर्थः— (डिति) डित् परे होने पर (भस्य) भसञ्ज्ञक (टेः) टि का (लोपः) लोप होता है। 'कतर + अद्' यहां स्थानिवद्भाव से 'अद्' स्वादि है। अजादि और असर्वनाम- स्थान भी; अतः इस के परे होने से यचि भम् (१६५) द्वारा पूर्व की भसञ्ज्ञा हो जाती है। पुनः 'अद्द्' इस डित् के परे होने पर भसञ्ज्ञक टि= अकार का प्रकृतसूत्र से लोप हो—कतर् + अद् = कतरद्। अब वाऽवसाने (१४६) से दकार को विकल्प कर के चर्=तकार हो कर 'कतरत्, कतरद्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। 'कतर + औ' यहां नपुंसकाच्च (२३) से 'औ' को 'शी' आदेश, अनुबन्धलोप और गुण करने से 'कतरे' प्रयोग सिद्ध होता है। 'कतर + अस्(जस्) यहां जश्शसोः शिः (२३७) से जस् को शि आदेश हो कर शि सर्वनामस्थानम् (२३८) से उस की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा हो जाती है। पुनः- नपुंसकस्य झलचः (२३६) से नुम् का आगम हो सर्वनामस्थाने चाऽसम्बुद्धौ (१७७) से उपधादीर्घ कर नकार को णकार करने से—'कतराणि' प्रयोग बनता है।
३३० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् 'हे कतर + स्' (सुं) यहां भी पूर्ववत् सकार को अद्द् आदेश होकर भसञ्ज्ञक टि का लोप कर चर्त्व करने से—'हे कतरत्, हे कतरद्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। ध्यान रहे कि यहां एङ्कस्वात् सम्बुद्धे (१३४) से तकार का लोप नहीं होता, क्योंकि 'कतर' यह ह्रस्वान्त होते हुए भी अङ्ग नहीं है, अङ्ग तो 'कतरद्' है। अन्त का अकार प्रत्यय का अवयव है प्रकृति का नहीं। प्रश्न—'अद्द्' की बजाय 'अद्' आदेश ही क्यों नहीं कर देते ? उत्तर—यदि 'अद्' आदेश का विधान करते तो 'अम्' में तो कुछ अन्तर न होता क्योंकि अम् के स्थान पर हुए अद्' को स्थानिवत् मानने से अमि पूर्व (१३५) से पूर्वरूप होकर 'कतरत्' सिद्ध हो जाता। परन्तु 'सुं' में 'अद्' आदेश होने पर अतो गुणे (२७४) का बाध कर पूर्वसवर्णदीर्घ होकर 'हे कतरात्', हे कतराद्' ये अनिष्ट रूप बन जाते। अतः इसे डित् करना ही युक्त है। प्रश्न—यदि पूर्वसवर्णदीर्घ का निवारण ही अभीष्ट है तो केवल 'द्' या 'त्' आदेश ही विधान क्यों नहीं कर देते ? उत्तर—यदि दकार वा तकार आदेश ही विधान करते तो प्रथमा और द्वितीया में तो कोई दोष न आता किन्तु सम्बुद्धि में एङ्कस्वात्सम्बुद्धे (१३४) से लोप हो कर 'हे कतर' यह अनिष्ट रूप बन जाता। अतः 'अड्ड्' आदेश करना ही युक्त है। डित्त्वाभावेऽमि सिद्धेऽपि सावदिष्टं प्रसज्यते । दकारे वा तकारे वा सम्बुद्धौ तत्स्थितिः कुतः ॥ द्वितीया विभक्ति में भी प्रथमाविभक्तिवत् प्रक्रिया होनी है। तृतीयादि विभ- क्तियों में पुँल्लिङ्गवत् प्रक्रिया जाननी चाहिये। रूपमाला यथा— प्र० कतरत्-द् कतरे कतराणि | प० कतरस्मात्* कतराभ्याम् कतरेभ्यः द्वि० ,, ,, ,, ,, | ष० कतरस्य कतरयोः कतरेषाम्‡ तृ० कतरेण कतराभ्याम् कतरैः | स० कतरस्मिन्* ,, कतरेषु च० कतरस्मै✓ ,, कतरेभ्यः | सं० हे कतरत्-द् हे कतरे हे कतराणि ✓ सर्वनाम्नः स्मै (१५३)। * ङसिंङ्योः स्मात्स्मिनौ (१५४)। ‡ आमि सर्वनाम्नः सुट् (१५५), बहुवचने झल्येत् (१४५)। इसी प्रकार—१. यतर (दो में जो) २ यतम (बहुतों में जो) ३ ततर (दो में वह), ४ कतम (बहुतों में कौन), ५ ततम (बहुतों में वह), ६ एकतम (बहुतों में एक), ७ अन्य (दूसरा), ८ अन्यतर (दो में एक), ६ इतर (भिन्न) शब्दों के उच्चारण होते हैं। ध्यान रहे कि ये सब शब्द त्रिलिङ्गी हैं, विशेष्यलिङ्ग के आश्रित रहते हैं। विशेष्य नपुंसक होगा तो ये नपुंसक में प्रयुक्त होंगे। नोट—अन्यतर और अन्यतम ये दोनों शब्द अव्युत्पन्न हैं, डतरान्त या डतमान्त नहीं। इन में प्रथम तो सर्वादिगण में पढ़ा गया है और डतरादि पञ्चों में भी आता है अतः इस का उच्चारण कतरवत् होता है। परन्तु अन्यतम शब्द सर्वादिगण में नहीं आता अतः इस का उच्चारण ज्ञानवत् होता है। अद्द् आदेश नहीं होता। इसी तरह स्मै, स्मात्, सुट् और स्मिन् भी नहीं होते।
अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३३१ एकतर (दो में एक) शब्द डतरप्रत्ययान्त है; अतः इस की प्रक्रिया ‘कतर’ शब्दवत् प्राप्त होती है; परन्तु यह अनिष्ट है। इस के प्रथमा और द्वितीया विभक्ति में ज्ञानवत् रूप ही इष्ट हैं, अतः अग्रिमवार्त्तिक प्रवृत्त होता है— [लघु०] वा०—(२३) एकतरात् प्रतिषेधो वक्तव्यः ॥ एकतरम् ॥ अर्थः—नपुंसक एकतरशब्द से परे सुँ और अम् को अद्द् आदेश न हो। व्याख्या—एकतरात् ।५।१। प्रतिषेधः ।१।१। यह वार्त्तिक भाष्य में अद्द् आदेश के प्रकरण में पढ़ा है अतः यह उसी का निषेध करता है। अर्थः—(एकतरात्) एकतर शब्द से परे (प्रतिषेधः) सुँ और अम् को अद्द् आदेश न हो। अद्द् आदेश न होने से प्रथमा और द्वितीया में 'ज्ञान'शब्दवत् प्रक्रिया होगी। परन्तु ङे, ङसिँ, ङि और आम् में सर्वनामकार्य निर्बाध होंगे। रूपमाला यथा— प्र० एकतरम् एकतरे एकतराणि प० एकतरस्मात् एकतराभ्याम् एकतरेभ्यः द्वि० " " " प० एकतरस्य एकतरयोः एकतरेषाम् तृ० एकतरेण एकतराभ्याम् एकतरैः स० एकतरस्मिन् " एकतरेषु च० एकतरस्मै " एकतरेभ्यः सं० हे एकतर! हे एकतरे! हे एकतराणि! अभ्यास (३६) (१) नपुंसकलिङ्ग में अम् को पुनः अम् विधान करने का क्या प्रयोजन है ? (२) मिदचोऽन्त्यात्परः सूत्र न होता तो क्या दोष उत्पन्न होता ? (३) ‘अद्द्’ आदेश को डित् करने का क्या प्रयोजन है ? (४) क्या ‘एकतर’ शब्द डतरप्रत्ययान्त है ? यदि है तो किस सूत्र से अद्द् आदेश विधान (?) किया जाता है ? (५) क्या ‘अन्यतम’ शब्द का उच्चारण ‘कतम’ शब्द की तरह होता है ? यदि नहीं तो क्यों ? क्या वह डतमप्रत्ययान्त नहीं ? (६) ‘ज्ञाने’ आदि में औङस्थानिक ‘शी’ को दीर्घ क्यों किया गया है ? (७) ‘शि’ की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा क्यों विधान की गई है ? क्या जस्स्था- निक होने से उस की वह सञ्ज्ञा स्वतः प्राप्त नहीं हो सकती थी ? (८) सूत्रनिर्देशपूर्वक सिद्धि करें— १. इतरत् । २. अन्यतमम् । ३. ज्ञानानि । ४. ज्ञाने । ५. एकतरम् । ६. अन्यतमात् । ७. ज्ञान । ८. एकतरस्मै । (६) अतोऽम् सूत्र में अम् का छेद करें या म् का ? सहेतुक स्पष्ट करें। (यहां ह्रस्व अकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।) —: : ० : : — श्रियम्पातीति = श्रीपम् (कुलम्) । जो कुल आदि, लक्ष्मी की रक्षा करे उसे ‘श्रीपा’ कहते हैं। यह शब्द विशेष्यलिङ्ग के आश्रित होने से त्रिलिङ्गी है। पुँल्लिङ्ग
३३२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् और स्त्रीलिङ्ग में इस का उच्चारण 'विश्वपा'शब्दवत् होता है। नपुंसक के उच्चा- रण में कुछ विशेष है—यह अग्रिमसूत्र द्वारा दर्शाया जाता है— [लघु०] विधि सूत्रम्—(२४३) ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य ।१।२।४७॥ अजन्तस्येत्येव । श्रीपम् । ज्ञानवत् ॥ अर्थ —नपुंसकलिङ्ग में अजन्त प्रातिपदिक को ह्रस्व हो जाता है। व्याख्या—ह्रस्व ।१।१। नपुंसके ।७।१। प्रातिपदिकस्य ।६।१। ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत सदा अच् के स्थान पर ही हुआ करते हैं। जहां इन का विधान होता है वहां 'अच' (अच् के स्थान पर) यह षष्ठ्यन्त पद उपस्थित हो जाता है [यह अचश्च (१ २ २८) परिभाषा का तात्पर्य है]। यहां भी 'अच' पद उपस्थित हो कर 'प्राति- पदिकस्य' का विशेषण बन येन विधिरतदन्तस्य द्वारा तदन्तविधि के कारण—'अजन्त- स्य प्रातिपदिकस्य' बन जाता है। अर्थ —(नपुंसके) नपुंसकलिङ्ग में (अच) अजन्त (प्रातिपदिकस्य) प्रातिपदिक के स्थान पर (ह्रस्व ) ह्रस्व हो जाता है। अलोऽन्त्य- परिभाषा से अन्त्य अच् के स्थान पर ही ह्रस्व होता है। 'श्रीपा' यहां अन्त्य आकार को ह्रस्व हो कर 'श्रीप'। अब इस में स्वादिप्रत्यय उत्पन्न हो कर सम्पूर्ण प्रक्रिया 'ज्ञान' शब्दवत् होती है। रूपमाला यथा— प्र० श्रीपम् श्रीपे श्रीपाणि | प० श्रीपात् श्रीपाभ्याम् श्रीपेभ्यः द्वि० ,, ,, ,, | ष० श्रीपस्य श्रीपयोः श्रीपाणाम् तृ० श्रीपेन श्रीपाभ्याम् श्रीपैः | स० श्रीपे ,, श्रीपेषु च० श्रीपाय , श्रीपेभ्यः | सं० हे श्रीप ! हे श्रीपे ! हे श्रीपाणि! नोट—'श्रीपाणि' आदि प्रयोगों में एकाजुत्तरपदे न (२८६) से ही णत्व होता है। भिन्न पद होने के कारण अट्कुप्वाङ्० (१३८) से णत्व नहीं हो सकता। इसी प्रकार विशेष्य के नपुंसक होने पर—विश्वपा, गोपा, कीलालपा, सोमपा आदि धात्वन्त आकारान्त शब्दों के उच्चारण होते हैं। (यहां आकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) ० [लघु०] द्वे २ ॥ व्याख्या—'द्वि' (दो) शब्द त्रिलिङ्गी है। विशेष्य के नपुंसक होने पर यह भी नपुंसक हो जाता है। 'द्वि+औ' यहां त्यदादीनाम (१६३) से इकार को अकार, नपुंसकाच्च (२३५) से 'औ' को 'शी' आदेश, अनुबन्धलोप तथा आद् गुण (२७) से गुण एका- देश करने स 'द्वे' प्रयोग सिद्ध होता है। 'द्वि+भ्याम्'। त्यदाद्यत्व और सुपि च (१४१) से दीर्घ हो 'द्वाभ्याम्'। 'द्वि+ओस्'। त्यदाद्यत्व, ओसि च (१४७) से अकार को एकार तथा एचो- ऽयवायाव (२२) में अय् आदेश करने पर सकार को रुत्व और रेफ को विसर्ग हो कर 'द्वयोः' प्रयोग सिद्ध होता है। सम्पूर्ण रूपमाला यथा—
अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३३३ प्र० ० द्वे ० | प० ० द्वाभ्याम् ० द्वि० ० ,, ० | ष० ० द्वयोः ० तृ० ० द्वाभ्याम् ० | स० ० ,, ० च० ० ,, ० सम्बोधन नहीं होता । नोट — ध्यान रहे कि स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग में ‘द्वि’ शब्द के एक समान रूप होते हैं परन्तु इन दोनों की प्रक्रिया में बड़ा अन्तर है । [लघु०] त्रीणि २ ॥ व्याख्या — त्रि (तीन) शब्द भी विशेष्यलिङ्ग के आश्रित होने से त्रिलिङ्गी होता है । यह सदा बहुवचनान्त होता है । नपुंसकलिङ्ग में इस की प्रक्रिया यथा— ‘त्रि + अस्’ (जस् व शस्) इस स्थिति में शि आदेश, सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा, नुम् आगम और सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) ने उपधादीर्घ हो कर अट्कुप्वाङ्० (१३८) से नकार को णकार आदेश करने में ‘त्रीणि’ प्रयोग सिद्ध होता है । त्रि + भिस् = त्रिभिः । त्रि + भ्यस् = त्रिभ्यः । त्रि + सु (सुप्) = त्रिषु । षष्ठी के बहुवचन में ‘त्रि + आम्’ इस दशा में त्रेस्त्रयः (१६२) से त्रय आदेश, ह्रस्वमूलक नुट् आगम तथा नामि (१४६) से दीर्घ हो कर नकार को णकार करने से ‘त्रयाणाम्’ प्रयोग सिद्ध होता है । रूपमाला यथा— प्र० ० ० त्रीणि | प० ० ० त्रिभ्यः द्वि० ० ० ,, | ष० ० ० त्रयाणाम् तृ० ० ० त्रिभिः | स० ० ० त्रिषु च० ० ० त्रिभ्यः सम्बोधन नहीं होता । अब सुप्रसिद्ध इदन्त नपुंसक ‘वारि’ (जल) शब्द का विवेचन करते हैं । णि- जन्त वृञ् वरणे धातु से वसि-वपि-यजि० (उणा० ५६४) इस औणादिक सूत्रद्वारा इन् प्रत्यय करने पर ‘वारि’ शब्द निष्पन्न होता है । वारयति उष्णतादिकमिति वारि । आपः स्त्री भूमिन् वार्वारि सलिलं कमलं जलम् — इत्यमरः । गजबन्धनी (हाथी बान्धने की भूमि), सरस्वती आदि अर्थों में वारिशब्द स्त्रीलिङ्ग होता है, परन्तु यहां जल अर्थ में नित्यनपुंसक ही है । वारि + सु (सुँ) । यहां अदन्त न होने से अतोऽम् (१३४) द्वारा सकार को अम् आदेश नहीं होता । अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है — [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२४४) स्वमोर्नपुंसकात् ।७।१।२३॥ लुक् स्यात् । वारि ॥ अर्थः—नपुंसकलिङ्ग से परे सुँ और अम् का लुक् हो । व्याख्या—स्वमोः ।६।२। नपुंसकात् ।५।१। लुक् ।१।१। (षड्भ्यो लुक् से) । समासः—सुँश्च अम् च = स्वमौ, तयोः । इतरेतरद्वन्द्वः । अर्थः—(नपुंसकात्) नपुंसक से परे (स्वमोः) सुँ और अम् का (लुक्) लुक् हो जाता है । यह उत्सर्गसूत्र है इस
३३४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् का अपवाद अतोऽम् (२३४) सूत्र और उस का भी अपवाद अद्ड्डतरादिभ्यः पञ्चभ्यः (२४१) सूत्र पीछे लिख चुके हैं। यह लुक् सुँ और अम् के सम्पूर्ण स्थान पर प्रवृत्त होता है। प्रश्न-आदेः परस्य (७२) परिभाषा द्वारा यह लुक् अम् के आदि अकार के स्थान पर क्यो प्रवृत्त न हो जाये ? उत्तर-प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः (१८६) सूत्र मे बताया जा चुका है कि लुक् प्रत्यय के अदर्शन को कहते हैं। यहां अम् का लुक् करना है। अम् का अकार या मकार प्रत्यय नहीं, किन्तु सम्पूर्ण समुदाय 'अम्' ही प्रत्यय है। अतः यदि सम्पूर्ण अम् का अदर्शन करेंगे तो तभी लुक् सार्थक होगा, अन्यथा नही। इस से सम्पूर्ण अम् का लुक् होता है, केवल आदि अकार का नहीं। वारि + सु । प्रकृतसूत्र से सकार का लुक् हो 'वारि' प्रयोग बना। प्रथमा के द्विवचन 'वारि+औ' मे नपुंसकाच्च (२३५) मे 'औ' को 'शी' हो अनुबन्धलोप करने से 'वारि+ई'। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है- [लघु०] विधि-सूत्रम्- (२४५) इकोऽचि विभक्तौ । ७।१।७३॥ इगन्तस्य क्लीवस्य नुम् अचि विभक्तौ । वारिणी । वारीणि ॥ अर्थः-अजादि विभक्ति परे हो तो इगन्त नपुंसक को नुँम् का आगम हो। व्याख्या इक् ।६।१। नपुंसकस्य ।६।१। (नपुंसकस्य झलच से)। नुम् ।१।१। (इदितो नुम् धातोः से) । अचि ।७।१। विभक्तौ ।७।१। 'नपुंसकस्य' का विशेषण होने से 'इक्' से तदन्तविधि हो कर 'इगन्तस्य नपुंसकस्य' बन जाता है। 'अचि' मे तदादि- विधि हो कर 'अजादौ विभक्तौ' बन जाता है। अर्थ-(अचि = अजादौ) अजादि (विभक्तौ) विभक्ति परे होने पर (इक् = इगन्तस्य) इगन्त (नपुंसकस्य) नपुंसक का अवयव (नुँम्) नुँम् हो जाता है। मित् होने से नुँम् अन्त्य अच् से परे होता है। 'वारि+ई' यहा 'वारि' यह इगन्त नपुंसक है। इस से परे 'ई' यह अजादि विभक्ति वर्तमान है। अतः प्रकृतसूत्र से इगन्त को नुँम् का आगम हो कर अनुबन्धलोप और नकार को णकार करने मे 'वारिणी' प्रयोग सिद्ध होता है। प्रथमा के बहुवचन मे 'वारि+अस्' (जस्) इस स्थिति मे पूर्ववत् शि आदेश, उस की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा, नुँम् आगम, अनुबन्धलोप, उपधादीर्घ तथा नकार को णकार आदेश हो कर 'वारीणि' प्रयोग सिद्ध होता है२। १. 'इकोऽचि सुंपि' इत्येव सुवचम् इति नागेशो मन्यते । २ वारि+इ (शि) मे नपुंसकस्य झलच (२३६) ओर इकोऽचि विभक्तौ (२४५) दोनों से नुँम् हो सकता है, किस से नुँम् किया जाये ? इस विषय मे वैयाकरण एकमत नही। कुछ वैयाकरणो का कहना है कि यहा परत्व के कारण इकोऽचि विभक्तौ से ही नुँम् करना चाहिये। परन्तु अन्य वैयाकरणो का कथन है कि इको- ऽचि विभक्तौ तो अन्य सब अजादि विभक्तियो में चरितार्थ है यहा शि (इ) मे नपुंसकस्य झलच की ही प्रवृत्ति होनी चाहिये। किञ्च 'झलन्त' न कह कर
अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३३५ हे वारि + स् । यहां स्वमोर्नपुंसकात् (२२४) से सुं का लुक् हो कर 'हे वारि !' हुआ। अब यहां प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् (१६०) से सम्बुद्धि को निमित्त मान कर ह्रस्वस्य गुणः (१६६) से गुण प्राप्त होता है। परन्तु न लुमताङ्गस्य (१६१) के निषेध के कारण प्रत्ययलक्षण नहीं हो सकता। हमें यहां पाक्षिक गुण करना अभीष्ट है। अतः न लुमताङ्गस्य (१६१) निषेध की अनित्यता सिद्ध करते हैं— [लघु०] न लुमता० (१६१) इत्यस्याऽनित्यत्वात् पक्षे सम्बुद्धिनिमित्तो गुणः —हे वारे !, हे वारि !। आङो ना० (१७१)—वारिणा। घेर्डिति (१७२) इति गुणे प्राप्ते— अर्थः—न लुमताङ्गस्य (१६१) यह निषेध अनित्य है। अतः पक्ष में ह्रस्वस्य गुणः (१६६) से सम्बुद्धिनिमित्तक गुण भी हो जाता है। गुणपक्ष में—हे वारे ! और गुणाभाव में—हे वारि ! । व्याख्या—न लुमताङ्गस्य (१६१) सूत्र अनित्य है। इस में ज्ञापक इकोऽचि विभक्तौ (२४५) सूत्र में 'अचि' पद का ग्रहण है। हम इसे समझाने के लिये पक्षात्मक ढंग से विचार करते हैं। तथाहि— पूर्वपक्षी—इकोऽचि विभक्तौ सूत्र में 'अचि' पद के ग्रहण का क्या प्रयोजन है ? उत्तरपक्षी—'वारि + भ्याम्' इत्यादि रूपों में भ्याम् आदि हलादि विभक्तियों में नुँम् न हो जाये, इसलिये सूत्र में 'अचि' पद का ग्रहण किया गया है। पूर्वपक्षी—'वारिभ्याम्' आदि में यदि नुँम् हो भी जाये तो न लोपः० (१८०) द्वारा लोप हो जाने से कोई दोष नहीं आता। अतः 'अचि' पद का ग्रहण व्यर्थ है। उत्तरपक्षी—तो 'हे वारि!' यहां लुक् हुए सम्बुद्धि को निमित्त मान कर नुँम् न हो जाये, इसलिये 'अचि' पद का ग्रहण किया है। पूर्वपक्षी—सम्बुद्धि में भी न लोपः० (१८०) से नकार का लोप हो जायेगा। उत्तरपक्षी—ऐसा नहीं हो सकता; क्योंकि सम्बुद्धि में न ङिसम्बुद्ध्योः (२८१) सूत्र नकार का लोप नहीं करने देगा। अतः 'हे वारिन्!' आदि अनिष्ट प्रयोगों की निवृत्ति के लिये 'अचि' पद का ग्रहण करना आवश्यक है। पूर्वपक्षी—ओहो! सम्बुद्धि में तो नुँम् प्राप्त ही नहीं हो सकता; क्योंकि विभक्ति का लुक् होने से न लुमताङ्गस्य (१६१) से प्रत्ययलक्षण का निषेध हो जाता है। अतः 'अचि' पद का ग्रहण व्यर्थ है। उत्तरपक्षी—आप का कथन सत्य है। इस प्रकार 'अचि' पद के बिना भी 'झलचः' कथन में अच्प्रत्याहार का ग्रहण भी यही प्रमाणित करता है कि यहां नपुंसकस्य झलचः द्वारा ही नुँम् होना चाहिये। हमारे विचार में दोनों सूत्रों से एक ही कार्य प्राप्त है अतः विरोध या विप्रतिषेध कुछ भी नहीं, इस तरह इन के बलावल का विचार निष्प्रयोजन ही है।
३३६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्
‘वारिभ्याम्, हे वारि’ आदि प्रयोगों के सिद्ध हो जाने पर आचार्य के पुनः ‘अचि’ पद के ग्रहण से न लुमताङ्गस्य (१६१) सूत्र की अनित्यता स्पष्ट प्रतीत होती है। पूर्वपक्षी—‘अचि’ पद के ग्रहण से भला आप कैसे न लुमताङ्गस्य (१६१) सूत्र की अनित्यता का अनुमान करते हैं ? उत्तरपक्षी—यदि न लुमताङ्गस्य (१६१) निषेध नित्य होता, तो सम्बुद्धि में उस का आश्रय कर के नुँम् प्राप्त ही न हो सकता। पुनः उस के निषेध के लिये ‘अचि’ पद की कोई आवश्यकता ही न होती। परन्तु आचार्य का उस के निषेध के लिये यत्न करना सिद्ध करता है कि आचार्य न लुमताङ्गस्य (१६१) निषेध को नित्य नहीं मानते। ‘हे वारि’ यहां सम्बुद्धि में न लुमताङ्गस्य (१६१) निषेध के अनित्य होने से अनित्यपक्ष में ह्रस्वस्य गुण (१६६) से गुण हो कर—‘हे वारे’ और नित्यपक्ष में गुण न होने से—‘हे वारि’ इस प्रकार दो रूप सिद्ध होते हैं। द्वितीया विभक्ति में भी प्रथमावत् प्रक्रिया होती है। तृतीया के एकवचन ‘वारि+आ’ (टा) में शेषो घ्यसखि (१७०) से घिसञ्ज्ञा हो इकोऽचि० (७।१।७३) की अपेक्षा पर होने के कारण आङो नाऽस्त्रियाम् (७।३। १२०) से टा को ना आदेश हो कर नकार को णकार करने से ‘वारिणा’ प्रयोग सिद्ध होता है। वारि+भ्याम् = वारिभ्याम्। वारिभिः। हलादि विभक्ति में नुँम् न होगा। चतुर्थी के एकवचन में ‘वारि+ए’ इस अवस्था में घिसञ्ज्ञा हो कर नुँम् की अपेक्षा पर होने के कारण घेर्ङिति (१७२) द्वारा गुण प्राप्त होता है। परन्तु यहां नुँम् करना ही अभीष्ट है। अतः अग्रिम वार्त्तिक से पूर्वविप्रतिषेध का विधान करते हैं— [लघु०] वा०—(२४) वृद्धधौत्वतृज्वद्भावगुणेभ्यो नुँम् पूर्वविप्रतिषेधेन ॥ वारिणे। वारिणः २। वारिणोः २। नुमचिर० (वा० १६) इति नुँट् —वारीणाम्। वारिणि। हलादौ हरिवत् ॥ अर्थ—वृद्धि, औत्व, तृज्वद्भाव और गुण—इन के साथ विप्रतिषेध होने पर, पूर्व भी नुँम् प्रवृत्त हो जाता है। व्याख्या—अचो ञ्णिति (७।२।११५) में प्राप्त वृद्धि, अच्च घे (७।३।११९)
१ यद्यपि इकोऽचि विभक्तौ (७।१।७२) के भाष्य में ‘हे त्रपो!’ और एङ्ह्रस्वात् सम्बुद्धेः (६।१।६७) के भाष्य में ‘हे त्रपु!’ ऐसे दो प्रयोग पाये जाते हैं, तथापि हमारा मन प्रत्येक इगन्त नपुंसक के सम्बुद्धि में दो दो—रूप बनाना स्वीकार नहीं करता । न लुमताङ्गस्य (१।१।६२) निषेध के अनित्य होने से केवल कहीं कहीं ‘त्रपो!’ आदि पूर्वमहानुभावों के लिखे रूपों में ही गुण का समाधान करना चाहिये, न कि सर्वत्र विकल्प, नहीं तो फिर अव्यवस्था हो जायगी । कैयट ने इकोऽचि विभक्तौ (७।१।७२) सूत्र के प्रदीप में इस का उल्लेख भी किया है।