लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२० | भैमीव्याख्योपेताया लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् प्र० नौ नावौ नाव | प० नाव नौभ्याम् नौभ्य द्वि० नावम् ,, ,, | ष० ,, नावो नावाम् तृ० नावा नौभ्याम् नौभि | स० नावि ,, नौषु च० नावे ,, नौभ्य | स० हे नौ ! हे नावौ ! हे नाव ! अजादिविभक्तियों में एचोऽयवायाव (२२) से आव् आदेश हो जाता है। (यहाँ औकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) [लघु०] इत्यजन्ता स्त्रीलिङ्गा [शब्दा ] ॥ अर्थ—यहाँ 'अजन्तस्त्रीलिङ्ग' शब्द समाप्त होते हैं। अभ्यास (३५) (१) क्या कारण है कि इयङ्स्थानी होने पर भी 'स्त्री' शब्द में नदीसञ्ज्ञा का निषेध नहीं होता ? (२) 'रमायै' में आटश्च सूत्र क्यों प्रवृत्त नहीं होता ? (३) क्या कारण है कि अजन्त स्त्रीलिङ्ग प्रकरण में ह्रस्व अकारान्त शब्दों का वर्णन नहीं किया गया ? (४) 'औङ्' किसे कहते हैं, उस का किस सूत्र में उल्लेख आया है ? (५) मत्याम्, धेन्वाम् आदि में ङि को आम् करने के लिये डेराम्० के विद्यमान रहते इदुद्भ्याम् क्यों बनाना पड़ा ? स्पष्ट करें। (६) लिङ्गविशिष्टपरिभाषा का सोदाहरण विवेचन करें। (७) गुणदीर्घौत्वानांमपवाद का तात्पर्य उदाहरणप्रदर्शनपूर्वक व्यक्त करें। (८) निम्नस्थ रूपों की ससूत्र सिद्धि करते हुए वैकल्पिक रूप भी लिखें— १ तिस्र । २ मातृ । ३ द्यौ । ४ अवक् । ५ रमयो । ६ स्त्रियम् । ७ श्रीणाम् । ८ मतौ । ६ द्वे । १० स्त्रिय । ११ मत्यै । १२ उत्तरपूर्वायाम् । १३ श्री । १४ रमायाम् । १५ स्त्रियौ । १६ द्यो । १७ रमे । १८ स्वसारौ । १६ भ्रुवाम् । २० क्रोष्ट्री । (६) 'हे श्री' में इयङ् आदेश न होने पर भी कैसे नेयैङुवँ० प्रवृत्त होता है? (१०) स्त्रीलिङ्गी उन ईदन्तशब्दों का निर्देश करें जिन में सुंलोप नहीं होता । (११) स्त्री, भ्रू, धेनु लक्ष्मी, स्वसृ, श्री—शब्दों की रूपमाला लिखें। (१२) सूत्रों की व्याख्या करें— अचि र ऋत , नेयैङुवँस्थान्०, ङिति ह्रस्वश्च, वाऽमि, इदुद्भ्याम् । ————— ० ————— इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु-सिद्धान्त- कौमुद्यामजन्त-स्त्रीलिङ्ग- प्रकरणं समाप्तम् ॥