भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 336, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 336

अथाऽजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम्

अब क्रमप्राप्त अजन्तनपुंसक शब्दों का विवेचन करते हैं। सर्वप्रथम अदन्त शब्दों का वर्णन प्रारम्भ होता है— ज्ञा अवबोधने (क्रया० प०) धातु से ल्युट् प्रत्यय कर यु को अन आदेश करने से 'ज्ञान' (जानना) शब्द निष्पन्न होता है। कृदन्तत्वात् प्रातिपदिकसञ्ज्ञा हो कर इस से स्वादिप्रत्ययों की उत्पत्ति होती है। प्रथमा के एकवचन 'ज्ञान + स्' (सुँ) में अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२३४) अतोऽम् ७।१।२४॥ अतोऽङ्गात् क्लीबात् स्वमोborderम्। अमि पूर्वः (१३५)—ज्ञानम्। एङ्- ह्रस्वाद्० (१३४) इति हल्लोपः—हे ज्ञान!॥ अर्थः—अदन्त नपुंसक अङ्ग से परे सुँ और अम् को अम् आदेश हो। व्याख्या—अतः ।५।१। अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य इस अधिकृत का वचनविपरि- णाम द्वारा)। नपुंसकात् ।५।१। स्वमोः ।६।२। (स्वमोर्नपुंसकात् से)। अम् ।१।१। समासः—सुश्च अम् च = स्वमौ, तयोः = स्वमोः, इतरेतरद्वन्द्वः। 'अङ्गात्' का विशेषण होने से 'अतः' से तदन्तविधि हो कर 'अदन्ताद् अङ्गात्' बन जाता है। अर्थः—(अतः = अदन्तात्) अदन्त (नपुंसकात्) नपुंसक (अङ्गात्) अङ्ग से परे (स्वमोः) सुँ और अम् के स्थान पर (अम्) अम् आदेश हो। अनेकाल् होने से अम् आदेश अनेकाल्र्शित् सर्वस्य (४५) द्वारा सर्वादेश होगा। स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) सूत्र से नपुंसक में सुँ और अम् का लुक् प्राप्त था; ह्रस्व अकारान्त शब्दों में यह सूत्र उस का बाध करता है। अम् को अम् इसीलिये विधान किया गया है। द्विर्बद्धं सुबद्धं भवति। १. कई लोग अतोम् सूत्र का 'अतः ।६।१। म् ।१।१।' इस प्रकार पदच्छेद करते हुए —अदन्त नपुंसक अङ्ग से परे सुँ और अम् को 'म्' आदेश हो—ऐसा अर्थ करते हैं। इस प्रकार सुँ में सकार को 'म्' आदेश हो कर—'ज्ञानम्' प्रयोग ठीक सिद्ध हो जाता है। अम् के विषय में आदेः परस्य (७२) परिभाषा द्वारा अम् के आदि अकार को मकार हो कर 'संयोगान्तलोप करने से 'ज्ञानम्' भी सिद्ध हो जाता है। किञ्च सम्बुद्धि में प्रक्रिया अतीव सरल हो जाती है अर्थात् ज्योंही सम्बुद्धि के सकार को मकार करते हैं त्योंही एङ्ह्रस्वात् सम्बुद्धेः (१३४) से उस का लोप हो जाता है, अन्तादिवच्च (४१) से पूर्वान्तवद्भाव की कल्पना का कष्ट नहीं उठाना पड़ता। परन्तु शेखरकार आदियों ने इस मत की खूब आलोचना की है। उन का कथन है कि 'म्' आदेश मानने पर 'ज्ञानम्' आदियों में सुंपि च (१४१) से दीर्घ प्राप्त होगा जो अनिष्ट है। किञ्च एङ्ह्रस्वात्० (१३४) के भाष्य से स्पष्ट प्रतीत होता है कि भाष्यकार 'अम्' आदेश ही मानते हैं 'म्' आदेश नहीं। ल० प्र० (२१)