भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 337, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 337

३२२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् 'ज्ञान+सु' यहां प्रकृतसूत्र से सुं को अम् आदेश हो कर अमि पूर्व (१३५) से पूर्वरूप करने पर—ज्ञान् अ म् = 'ज्ञानम्' प्रयोग सिद्ध होता है । ध्यान रहे कि 'सुं' विभक्तिमञ्ज्ञक है अतः इस के स्थान पर आदेश होने वाला अम् भी विभक्तिमञ्ज्ञक होगा । अत एव हलन्त्यम् (१) द्वारा प्राप्त अम् के मकार की इत्सञ्ज्ञा का न विभक्तौ तुस्मा (१३१) से निषेध हो जायेगा । सम्बुद्धि में 'हे ज्ञान+स्' इस स्थिति में परत्व के कारण सम्बुद्धिलोप का बाध कर प्रकृतसूत्र से सुं को अम् आदेश हो कर अमि पूर्व (१३५) से पूर्वरूप करने पर 'ज्ञानम' हुआ। पुनः एङ्ह्रस्वात्सम्बुद्धे (१३४) से सम्बुद्धि के हल्—मकार का लोप करने पर 'हे ज्ञान' प्रयोग सिद्ध होता है¹ । प्रथमा के द्विवचन में 'ज्ञान+औ' इस स्थिति में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२३५) नपुंसकाच्च ॥७।१।१९॥ क्लीबाद् औडः शी स्यात् । भसञ्ज्ञायाम्— अर्थ—नपुंसक अङ्ग से परे 'औ' को 'शी' आदेश हो जाता है । भसञ्ज्ञा करने पर (अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है ।) व्याख्या—नपुंसकात् ।५।१। च इत्यव्ययपदम् । अङ्गात् ।५।१। (अङ्गस्य इस अधिकृत का वचनविपरिणाम हो जाता है) । औङः ।६।१। (औङ आपः से) । शी ।१।१। (जसः शी से) । अर्थ—(नपुंसकात्) नपुंसक (अङ्गात्) अङ्ग से परे (औङः) औङ् के स्थान पर (शी) शी आदेश हो । प्रथमा तथा द्वितीया के द्विवचन की औङ् सञ्ज्ञा है—यह पीछे औङ आपः (२१६) सूत्र पर लिख चुके हैं । 'ज्ञान+औ' यहां शी आदेश हो अनुबन्धलोप करने से 'ज्ञान+ई' हुआ । अत्र 'ई' यह 'औ' के स्थान पर आदेश होने के कारण स्थानिवद्भावेन स्वादि है । सुडनपुंस- कस्य (१६३) से नपुंसक का वर्जन होने से सर्वनामस्थान भी नहीं । किञ्च यह अजादि भी है अतः इस के परे होने पर यचि भम् (१६५) से ज्ञानशब्द की भसञ्ज्ञा हो अग्रिमसूत्र द्वारा नकारोत्तर अकार का लोप प्राप्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२३६) यस्येति च ॥६।४।१४८॥ ईकारे तद्धिते च परे भस्येवर्णावर्णयोर्लोपः । इत्यल्लोपे प्राप्ते— अर्थ—ईकार या तद्धित परे होने पर भसञ्ज्ञक इवर्ण अवर्ण का लोप हो । व्याख्या—यस्य ।६।१। भस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । ईति ।७।१। च इत्य- व्ययपदम् । तद्धिते ।७।१। (भस्तद्धिते से) । लोपः ।१।१। (अल्लोपोऽनः से) । समास —इश्च अश्च = यम्, तस्य = यस्य, समाहारद्वन्द्वः । अर्थ—(ईति) ईकार (च) अथवा (तद्धिते) तद्धित परे होने पर (भस्य) भसञ्ज्ञक (यस्य) इवर्ण अवर्ण का १. हे ज्ञान्+म् = हे ज्ञान्+अम् = हे ज्ञान्+म् । यहां पूर्वरूप अकार को अन्तादि- वच्च (८१) से पूर्व का अन्त मान लेने से 'ज्ञान' यह ह्रस्वान्त अङ्ग हो जाता है । तब इस से परे सम्बुद्धि के हल् मकार का लोप हो जाता है ।