भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 338

अजन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ३२३ (लोपः) लोप हो जाता है। इस सूत्र के उदाहरण आगे यथास्थान बहुत आएंगे। 'ज्ञान + ई' यहां ईकार परे है अतः भसञ्ज्ञक अकार का लोप प्राप्त होता है, पर यह अनिष्ट है। अतः इस के निषेध के लिये अग्रिम वार्त्तिक प्रवृत्त होता है— [लघु०] वा०—(२२) औङः श्यां प्रतिषेधो वाच्यः ॥ ज्ञाने ॥ अर्थः—औङ् के स्थान पर आदेश हुए 'शी' के परे होने पर यस्येति च (२३६) सूत्र की प्रवृत्ति नहीं होती। व्याख्या—यह वार्त्तिक यस्येति च सूत्र पर महाभाष्य में पढ़ा गया है। अतः इस से उसी का निषेध होता है। औङः ।६।१। श्याम् ।७।१। प्रतिषेधः ।१।१। अर्थः— (औङः) औङ् के स्थान पर हुए (श्याम्) शी के परे होने पर (प्रतिषेधः) यस्येति च सूत्र की प्रवृत्ति का निषेध हो जाता है। 'ज्ञान + ई' यहां इस वार्त्तिक से यस्येति च (२३६) से प्राप्त अकारलोप का निषेध हो आद् गुणः (२७) से एकार गुण कर 'ज्ञाने' प्रयोग सिद्ध होता है। प्रथमा के बहुवचन में 'ज्ञान + जस्' इस स्थिति में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२३७) जश्शसोः शिः ।७।१।२०॥ क्लीवाद् अनयोः शिः स्यात् ॥ अर्थः—नपुंसकलिङ्ग से परे जस् और शस् को 'शि' आदेश हो। व्याख्या—नपुंसकात् ।५।१। (स्वमोर्नपुंसकात् से)। जश्शसोः ।६।२। शिः ।१।१। समासः—जश्च शश्च = जश्शसौ, तयोः = जश्शसोः, इतरेतरद्वन्द्वः। अर्थः— (नपुंसकात्) नपुंसक से परे (जश्शसोः) जस् और शस् के स्थान पर (शिः) शि आदेश हो। जस् और शस् प्रत्यय हैं अतः स्थानिवद्भाव से 'शि' भी प्रत्यय है। प्रत्यय होने से इस के शकार की लशक्वतद्धिते (१३६) से इत्सञ्ज्ञा हो कर 'इ' ही शेष रहता है—ज्ञान + शि = ज्ञान + इ। अब अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है - [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(२३८) शि सर्वनामस्थानम् ।१।१।४१॥ 'शि' इत्येतद् उक्तसञ्ज्ञं स्यात् ॥ अर्थः—'शि' यह सर्वनामस्थानसञ्ज्ञक हो। व्याख्या—शि ।१।१। सर्वनामस्थानम् ।१।१। अर्थः—(शि) शि (सर्वनाम- स्थानम्) सर्वनामस्थानसञ्ज्ञक हो। नपुंसकलिङ्ग में जस् की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा नहीं होती—यह पीछे सुडनपुंस- कस्य (१६३) सूत्र में बताया जा चुका है। और शस् की तो सुँट् न होने से किसी भी लिङ्ग में सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा नहीं होती। तो यहां नपुंसक में जस् और शस् के स्थान पर होने वाला 'शि' आदेश स्थानिवद्भाव से किसी भी प्रकार सर्वनामस्थान-