लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् संज्ञक नहीं हो सकता था, परन्तु इस की सर्वनामस्थानसंज्ञा करनी इष्ट है । अतः इस सूत्र से उस का विधान किया गया है । 'ज्ञान + इ' यहां शि की सर्वनामस्थान-संज्ञा हो अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(२३६) नपुंसकस्य झलचः ।७।१।७२॥ झलन्तस्याजन्तस्य च क्लीवस्य नुम् स्यात् सर्वनामस्थाने ॥ अर्थः—सर्वनामस्थान परे हो तो झलन्त और अजन्त नपुंसक को नुँम् आगम हो । व्याख्या—नपुंसकस्य ।६।१। झलच ।६।१। नुम् ।१।१। (इदितो नुम् धातो से)। सर्वनामस्थाने ।७।१। (उगिदचां सर्वनामस्थाने० से) । समास —झल् च अच् च = झलचौ, समासान्तविधेरनित्यत्वाद् द्वन्द्वाच्चुद० (५८६) इति न टच् । तस्य = झलचः, समाहारद्वन्द्व । 'नपुंसकस्य' का विशेषण होने से 'झलच' से तदन्तविधि हो जाती है । अर्थ —(सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे होने पर (झलच ) झलन्त और अजन्त (नपुंसकस्य) नपुंसकलिङ्ग का अवयव (नुँम्) नुँम् हो जाता है १। 'ज्ञान + इ' यहां 'ज्ञान' यह अजन्तनपुंसक है, इस से परे 'इ' (शि) यह सर्व- नामस्थान विद्यमान है । अतः प्रकृत नपुंसकस्य झलचः से 'ज्ञान' को नुँम् का आगम प्राप्त होता है । परन्तु प्रश्न उत्पन्न होता है कि नुँम् का आगम नपुंसक का कौन सा अवयव हो ? क्या आद्य अवयव हो या अन्त अवयव ? अथवा और ही कुछ ? इस का अग्रिम परिभाषा से निर्णय करते हैं— [लघु०] परिभाषा सूत्रम्—(२४०) मिदचोऽन्त्यात् परः ।१।१।४६॥ अचां मध्ये योऽन्त्य , तस्मात्परस्तस्यैवान्तावयवो मित् स्यात् । उपधा- दीर्घ —ज्ञानानि । पुनस्तद्वत् । शेषं पुंवत् ॥ अर्थ —समुदाय के अचों में जो अन्त्य अच्, उस से परे मित् का आगम होता है । किञ्च वह उस समुदाय का अन्तावयव माना जाता है । व्याख्या—मित् ।१।१। अच ।६।१। अन्त्यात् ।५।१। पर ।१।१। अन्त ।१।१। (आद्यन्तौ टकितौ से) । समास —म् इत् यस्य स मित्, बहुव्रीहिसमास । अच इति निर्धारणे षष्ठी, सौत्रमेकवचन जात्यभिप्रायेण । यस्य समुदायस्य मिद् विहित तस्य समुदायस्य अचांमध्य इत्यर्थः । अर्थ —(मित्) मित् आगम (अच ) जिस समुदाय को विधान किया गया हो उस समुदाय के अचों के मध्य में (अन्त्यात्) जो अन्त्य अच्, १ यहां झलन्तलक्षण नुँम् में यह बात विशेष ज्ञातव्य है कि यदि झल् किसी अच् से परे होगा तो तभी नुँम् का आगम होगा, अन्यथा नहीं । अच परस्यैव झलो नुम्वि- धानम्—इति भाष्ये । अत एव 'मांस + जस्=मास्+इ=मांसि, (प्रजायाम्) गवाञ्च + जस्=गवाञ्च्+इ=गवाञ्चि' इत्यादिप्रयोगों में झलन्तलक्षण नुँम् की प्रवृत्ति नहीं होती ।